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73 साल की उम्र में गांधी का 21 दिनों का अनशन, अंग्रेजों ने अंतिम संस्कार की भी कर ली थी तैयारी
- Author, उर्वीश कोठारी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी गुजराती के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
दिल्ली में चल रहे अनशन और आंदोलन के कारण महात्मा गांधी के अनशन एक बार फिर चर्चा में हैं.
सोनम वांगचुक के अनशन की आलोचना करने वाले कुछ लोगों ने गांधी के अनशन को भी 'ज़िद या ब्लैकमेल' कहा.
वहीं कुछ लोगों ने इतिहास को नज़रअंदाज़ करते हुए यह राय दी कि गांधी का अनशन इसलिए सफल हुआ क्योंकि उनके सामने ब्रिटिश सरकार थी.
लेकिन सच्चाई इससे अलग है. गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे. उसके बाद 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या होने तक उन्होंने लगभग 30 बार अनशन किए.
चंदुलाल दलाल ने अपनी किताब 'गांधीजी की दिनवारी' में गांधी के सभी अनशनों का ब्योरा दर्ज किया है. उन्होंने ये भी बताया है कि ऐसा भी हो सकता है कि गांधी के सभी अनशनों की घोषणा भी न हुई हो.
गांधी के अनशन की अवधि एक दिन से लेकर 21 दिन तक रही. और अहम बात ये है कि गांधी के सिर्फ चार अनशन ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ थे.
गांधी अनशन को किसी सरकार या व्यवस्था के ख़िलाफ़ सत्याग्रह का आख़िरी क़दम मानते थे.
उन्होंने अनशन अपने ही साथियों या करीबी लोगों की किसी ग़लती या कमी की वजह से किए थे.
क्योंकि अपने साथियों के ऐसे व्यवहार के लिए गांधी खुद को भी ज़िम्मेदार मानते थे. उनके अनशन का दूसरा बड़ा मक़सद हिंदू-मुस्लिम एकता बनाए रखना और जो लोग हिंसा कर रहे थे, उसका विरोध करना था.
हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए गांधी ने पहली बार 1924 में 21 दिनों का अनशन किया था. अपनी हत्या से करीब दो हफ्ते पहले भी उन्होंने इसी मक़सद से आमरण अनशन शुरू किया था.
अनशन और पूना पैक्ट
यरवडा जेल में साल 1932 में गांधी का किया गया अनशन सबसे ज़्यादा विवादित माना जाता है.
इसकी वजह यह थी कि यह अनशन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री द्वारा दलितों के लिए घोषित अलग निर्वाचन व्यवस्था के विरोध में था. गांधी की जान बचाने के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर ने समझौता किया और हिंदू नेताओं के साथ पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए.
इस समझौते के बाद दलितों को अलग निर्वाचन क्षेत्र नहीं मिला, बल्कि संयुक्त निर्वाचन व्यवस्था में उनके लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था की गई.
हालांकि यह अनशन ब्रिटिश प्रधानमंत्री के फ़ैसले के ख़िलाफ़ था, लेकिन इसका असली मुद्दा दलितों के अधिकार और हित से जुड़ा था. इसलिए इसे सीधे अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ किया गया अनशन नहीं माना जाता.
छह दिन के इस अनशन के बाद, उसी साल दिसंबर में सत्याग्रही और समाज सुधारक अप्पासाहेब पटवर्धन ने जेल में सफाई करने वाली टोली में शामिल होने की अनुमति मांगी.
सरकार ने इजाज़त नहीं दी, तो अप्पासाहेब ने खाना लगभग छोड़ दिया. उनके समर्थन में गांधी ने भी 3 दिसंबर 1932 को अनशन शुरू किया. गांधी का मानना था कि एक गैर-दलित व्यक्ति का सफाई का काम करना छुआछूत मिटाने की मुहिम का हिस्सा है. लेकिन सरकार ने उसी दिन मामले की जांच कर समाधान का भरोसा दिया, इसलिए गांधी ने एक ही दिन बाद अपना अनशन रोक दिया.
इसके बाद 1933 में गांधी ने अनशन किए और ये भी छुआछूत खत्म करने और दलित समाज की सेवा से जुड़े थे.
पहले जब वे जेल में थे, तब सरकार ने उन्हें इस विषय पर काम करने की अनुमति दी थी, क्योंकि उस समय उन्हें राजनीतिक कैदी का दर्जा मिला हुआ था.
लेकिन 1933 की जेल यात्रा के दौरान सरकार ने ऐसी अनुमति देने से इनकार कर दिया.
तब गांधी ने मुंबई सरकार के गृह सचिव को पत्र लिखकर कहा, "यरवडा समझौते (पूना पैक्ट) के तहत मैंने जो प्रतिज्ञा ली है, उसके पालन के लिए छुआछूत खत्म करने का काम करना मेरे जीवन का एक ज़रूरी हिस्सा है. मेरे प्राण लिए बिना इस काम को नहीं रोका जा सकता."
उन्होंने कई बार अपील की लेकिन सरकार नहीं मानी, इसलिए गांधी ने 16 अगस्त 1933 से अनशन शुरू कर दिया.
इस अनशन के दौरान उनकी तबीयत लगातार बिगड़ने लगी. 20 अगस्त को उन्हें पुणे के ससून अस्पताल ले जाना पड़ा.
इसके बाद भी उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ. खुद गांधी को भी लगने लगा था कि शायद अब वे नहीं बचेंगे.
21 अगस्त को कस्तूरबा गांधी भी अस्पताल पहुंच गईं. जब सबको लगा कि गांधी का अंत करीब है, तो उनकी रोज़मर्रा की इस्तेमाल की चीज़ें अस्पताल में उनकी देखभाल कर रहे लोगों में बांट दी गईं. लेकिन गांधी की तबीयत धीरे-धीरे संभल गई.
23 अगस्त को सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया. इसके बाद उन्होंने अस्पताल में संतरे का जूस पीकर अपना अनशन समाप्त किया.
झूठे आरोप और जानलेवा स्थिति
दिसंबर 1933 के अनशन के बाद गांधी ने लिखा था, "मैं चाहूं या न चाहूं, अनशन मेरे लिए रोज़मर्रा की बात बन गया है. इसमें दुःख की क्या बात है? अनशन को मेरे जीवन से जुड़ी हुई चीज़ समझना चाहिए, और इसलिए मुझे अपने शरीर के प्रति मोह छोड़ देना चाहिए." (गांधीजीनो अक्षरदेह, भाग 55, पृष्ठ 393)
यह लिखने के करीब दस साल बाद, एक और अनशन के दौरान गांधी फिर मौत के बेहद करीब पहुंच गए.
अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के बाद अंग्रेज़ सरकार ने कांग्रेस के लगभग सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और आंदोलन को दबाने की कोशिश की. इस दौरान कई जगह हिंसा भी हुई.
सरकार ने इस हिंसा और अशांति के लिए गांधी और कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया.
तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की तरह, गांधी के प्रति बहुत निगेटिव सोच रखते थे.
उनका मानना था कि देश में फैली अशांति के लिए गांधी ही ज़िम्मेदार हैं. इस मुद्दे पर गांधी और वायसराय के बीच लंबा पत्राचार हुआ.
गांधी ने लिखा कि अगर वायसराय अपने आरोप साबित कर दें, तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी गलती मान लेंगे. लेकिन अगर आरोप साबित नहीं होते, तो उन्हें वापस लेना चाहिए.
जब वायसराय अपने रुख पर अड़े रहे, तब 73 साल की उम्र में गांधी ने पुणे के आगा ख़ान महल में 21 दिनों का अनशन शुरू कर दिया, ये जगह उस समय जेल के रूप में इस्तेमाल हो रहा था.
उस समय उनकी सेहत पहले से ही बहुत कमज़ोर थी. डॉक्टरों को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि वे पूरे 21 दिन का अनशन सुरक्षित पूरा कर पाएंगे.
दूसरी जेल में बंद कांग्रेस के डॉक्टर, डॉ. गिल्डर को गांधी की देखभाल के लिए बुलाया गया. डॉ. सुशीला नायर पहले से ही उनके साथ थीं. अंग्रेज़ डॉक्टर मेजर जनरल कैंडी भी गांधी की हालत को लेकर बहुत चिंतित थे.
10 फरवरी से शुरू हुए इस अनशन के दौरान गांधी की तबीयत लगातार बिगड़ती गई. मेजर जनरल कैंडी ने गांधी के साथियों से बार-बार कहा कि उन्हें दिए जाने वाले पानी में थोड़ा-सा फलों का रस मिला देना चाहिए, नहीं तो उनकी जान बचाना मुश्किल होगा.
लेकिन गांधी की इजाज़त के बिना ऐसा करने के लिए कोई तैयार नहीं था. उन्हें पानी पीने में भी कठिनाई हो रही थी.
उनकी सांस से एसीटोन की गंध आ रही थी और शरीर में यूरेमिया के लक्षण दिखाई दे रहे थे, जो किडनी पर गंभीर असर का संकेत थे.
आख़िरकार 21 फरवरी की शाम गांधी ने डॉ. सुशीला नायर की सलाह मान ली.
डॉ. सुशीला नायर ने लिखा है,"गांधी पहले ही कह चुके थे कि अगर वे सादा पानी न पी सकें, तो उसे पीने योग्य बनाने के लिए उसमें बहुत थोड़ी मात्रा में मौसंबी का रस मिलाया जा सकता है." (बापू के कारावास की कहानी, पृष्ठ 278–279)
इसके बाद उनकी तबीयत में कुछ सुधार हुआ. लेकिन डॉक्टरों की सलाह के बावजूद गांधी ने फिर रस की मात्रा कम कर दी.
इससे उनकी हालत पूरी तरह ठीक नहीं हो सकी और डॉक्टर लगातार चिंतित रहे. हालांकि, इसके बाद फिर कोई गंभीर संकट पैदा नहीं हुआ.
ब्रिटिश सरकार ने गांधी के अंतिम संस्कार की तैयारी कर ली थी
इस अनशन के दौरान केवल वायसराय ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन की सरकार ने भी गांधी की मृत्यु की आशंका को देखते हुए पूरी तैयारी कर ली थी.
गांधी की करीबी सहयोगी मीराबेन ने अपनी यादों में लिखा है, "बाद में पता चला कि सरकार ने अंतिम संस्कार के लिए चंदन और दूसरी लकड़ियां भी मंगवा ली थीं. यहां तक कि शवयात्रा किस रास्ते से निकलेगी, इसकी भी योजना बना ली गई थी."
उन्होंने आगे लिखा, "साथ ही, पूरे देश के सरकारी अधिकारियों को सतर्क रहने और गांधी की मृत्यु के बाद यदि कहीं दंगे या अशांति फैले, तो उसे तुरंत दबाने के निर्देश भी दिए गए थे." (एक साधिका की जीवनयात्रा, पृष्ठ 234–235)
सरकार के खिलाफ अनशन के बारे में गांधी ने लिखा था, "जब कोई सत्याग्रही पराधीन स्थिति में हो, सत्याग्रह का कोई दूसरा रास्ता उसके लिए संभव न हो, और सत्ता द्वारा किया जा रहा अन्याय उसे इतना असहनीय लगे कि उसे सहते हुए जीना नैतिक रूप से खोखला जीवन बन जाए, तब वह जीवन दांव पर लगाने की तैयारी के साथ अनशन शुरू करता है."
गांधी ने अपने लेखों और पत्रों में अनशन के सिद्धांत पर विस्तार से लिखा है. लेकिन उनके किसी भी लेख का इस्तेमाल आज के समय में होने वाले किसी अनशन का समर्थन या विरोध करने के लिए सीधे-सीधे करना उचित नहीं होगा.
उन लेखों को गांधी के विचारों, उनके नैतिक दृष्टिकोण और उनके फैसलों को समझने के लिए ही पढ़ा जाना चाहिए.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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