चलते हुए या सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना किन बीमारियों का लक्षण हो सकता है?

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इमेज कैप्शन, शारीरिक गतिविधि के दौरान सांस फूलना कई तरह की बीमारियों का लक्षण हो सकता है (सांकेतिक तस्वीर)
    • Author, ओंकार करम्बेलकर
    • पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

सीढ़ियां चढ़ते समय या थोड़ी तेज़ गति से चलते समय सांस फूलना कई लोगों के लिए आम बात है. उम्र बढ़ने, वजन बढ़ने, व्यायाम की कमी या शारीरिक फ़िटनेस की कमी के कारण भी कुछ हद तक सांस फूलना सामान्य माना जाता है.

हालांकि, अगर अचानक उन कामों को करते समय सांस फूलने लगे जो पहले आसानी से हो जाते थे, या थोड़ी सी मेहनत करने पर भी सांस फूलने लगे, या अगर यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ती जाए तो इसे केवल थकान या उम्र का असर मानकर नज़रअंदाज़ करना ख़तरनाक हो सकता है.

मेडिकल एक्सपर्ट्स के अनुसार, शारीरिक श्रम के दौरान सांस फूलना हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी, एनीमिया, थायरॉइड डिसऑर्डर या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का शुरुआती लक्षण हो सकता है.

विशेष रूप से महिलाओं, बुज़ुर्गों और डायबिटीज़ के मरीजों में परिश्रम के दौरान सांस फूलना, सीने में दर्द से पहले के हृदय रोग का प्रारंभिक संकेत हो सकता है.

इसके अलावा डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल, मोटापा या धूम्रपान करने वाले लोगों को इस लक्षण को अधिक गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.

अगर किसी व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ़ के साथ-साथ सीने में जकड़न, चक्कर आना, दिल की धड़कन में अनियमितता, पसीना आना या पैरों में सूजन जैसे लक्षण महसूस हों, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेना ज़रूरी है.

सांस फूलने का कारण कैसे पता लगाया जाता है?

विशेषज्ञों का कहना है कि अचानक सांस फूलना, तेज़ी से इसका बढ़ना या आराम करने के बाद भी इसका ठीक न होना एक गंभीर चेतावनी का संकेत हो सकता है (सांकेतिक तस्वीर)

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इमेज कैप्शन, विशेषज्ञों का कहना है कि अचानक सांस फूलना, तेज़ी से इसका बढ़ना या आराम करने के बाद भी इसका ठीक न होना एक गंभीर चेतावनी का संकेत हो सकता है (सांकेतिक तस्वीर)

सीढ़ियां चढ़ते समय या चलते समय सांस फूलने का सही कारण केवल लक्षणों के आधार पर तय नहीं किया जा सकता.

हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी, एनीमिया, थायरॉइड डिसऑर्डर, मोटापा, किडनी की बीमारी या कभी-कभी मानसिक तनाव भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं. इसलिए, सही डायग्नोसिस के लिए मरीज की विस्तृत मेडिकल जानकारी और ज़रूरी टेस्ट अहम हैं.

आमतौर पर प्रारंभिक अवस्था में ब्लड प्रेशर की जांच, ईसीजी, छाती का एक्स-रे और अलग-अलग ब्लड टेस्ट किए जाते हैं. ब्लड में हीमोग्लोबिन का स्तर, ब्लड शुगर, थायरॉइड फंक्शन, किडनी और लीवर के फंक्शन की भी जांच की जा सकती है.

अगर हृदय संबंधी समस्या का संदेह हो तो इकोकार्डियोग्राफी, ट्रेडमिल स्ट्रेस टेस्ट या सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी जैसे टेस्ट कराने की सलाह दी जा सकती है. कुछ मामलों में फेफड़ों की कार्यक्षमता की जांच की भी ज़रूरत हो सकती है.

विशेषज्ञों के अनुसार, अचानक सांस फूलना, तेज़ी से इसका बढ़ना या आराम करने के बाद भी इसका ठीक न होना एक गंभीर चेतावनी का संकेत हो सकता है. ऐसे मामलों में जल्द से जल्द डायग्नोसिस और इलाज मिलने से हार्ट डिज़ीज़, हार्ट फेलियर या अन्य गंभीर जटिलताओं को रोकने में मदद मिल सकती है.

डायग्नोसिस की अहमियत

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इमेज कैप्शन, सांस फूलने का पता लगाने के लिए डायग्नोसिस कराना सही तरीक़ा है (सांकेतिक तस्वीर)
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अगर आपको सांस लेने में तकलीफ़ होने लगी है, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें. लेकिन ख़ुद से इसका निदान भी न करें. इसके लिए जांच करवाना बहुत ज़रूरी है.

व्यायाम के दौरान, उदाहरण के लिए सीढ़ियाँ चढ़ते समय, सांस फूलने (घबराहट) के कारण का पता लगाने में सही डायग्नोसिस पहला कदम है. अगर समस्या नई है, धीरे-धीरे बढ़ रही है, या किए जा रहे परिश्रम की मात्रा से अधिक गंभीर है, तो इसका डायग्नोसिस विशेष तौर पर ज़रूरी है.

हमने मुंबई स्थित न्यूबर्ग अजय शाह लेबोरेटरी के मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. अजय शाह से टेस्ट की ज़रूरतों के बारे में पूछा.

उन्होंने बताया, "बीमारी को डायग्नोस करते समय हम सबसे पहले मरीज की डीटेल्ड मेडिकल हिस्ट्री देखते हैं. इसमें सांस लेने में तकलीफ की प्रकृति, समय और गंभीरता के बारे में जानकारी शामिल होती है. साथ ही, सीने में दर्द, धड़कन, खांसी, घरघराहट, कमज़ोरी और पैरों में सूजन जैसे संबंधित लक्षणों के बारे में भी पूछताछ की जाती है. इसके अलावा मरीज की जीवनशैली से जुड़ी आदतें और अन्य बीमारियों को भी ध्यान में रखा जाता है."

"शारीरिक परीक्षण से समस्या के कारण के बारे में अहम सुराग भी मिल सकते हैं. डायग्नोसिस करते हुए हमारा काम डॉक्टरों को समस्या का सटीक कारण पता लगाने में मदद करना और उन्हें निदान तक पहुंचने में मदद करने के लिए सही टेस्ट की सिफारिश करना है, न कि केवल लक्षणों का इलाज करना."

सीने का एक्स-रे

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इमेज कैप्शन, डॉक्टर बताते हैं कि छाती का एक्स-रे फेफड़ों या हृदय में किसी भी प्रकार की ख़राबी का पता लगाने में मददगार होता है

शुरुआती अवस्था में किए जाने वाले टेस्ट के बारे में पूछे जाने पर डॉ. अजय शाह कहते हैं, "टेस्ट का चयन मरीज के लक्षणों के आधार पर किया जाता है. हालांकि, कुछ डायग्नोस्टिक टेस्ट लगभग हर बार ज़रूरी होते हैं."

वह बताते हैं, "ब्लड टेस्टों में सीबीसी (कंप्लीट ब्लड काउंट) महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन समस्याओं के बारे में जानकारी देता है जो सांस लेने में तकलीफ़ का कारण बन सकती हैं. जैसे एनीमिया या संक्रमण. इसके अलावा, ब्लड शुगर लेवल की जांच, लीवर फंक्शन टेस्ट, किडनी फंक्शन टेस्ट, थायरॉइड प्रोफ़ाइल और शरीर में सूजन की जांच भी की जा सकती है. अगर मरीज में हृदय रोग की आशंका हो तो कार्डियक बायोमार्कर टेस्ट कराने की सलाह दी जा सकती है."

डॉ. शाह बताते हैं, "छाती का एक्स-रे फेफड़ों या हृदय में किसी भी प्रकार की ख़राबी का पता लगाने में उपयोगी होता है. ईसीजी टेस्ट से हृदय की लय सही है या नहीं और हृदय पर कोई अतिरिक्त दबाव है या नहीं, यह जानने में भी मदद मिलती है."

जल्दी डायग्नोसिस क्यों ज़रूरी है?

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इमेज कैप्शन, जल्दी डायग्नोसिस कराने से बीमारी का पता शुरुआती समय में ही लग सकता है

चलते समय सांस फूलने या अचानक थकान महसूस होने पर जल्द से जल्द जांच और डायग्नोसिस करवाना बहुत ज़रूरी है. सांस फूलना किसी समस्या का लक्षण हो सकता है. इसलिए, डायग्नोसिस में देरी होने पर शरीर के अंदर मौजूद समस्या का पता नहीं चल पाएगा और उसकी गंभीरता बढ़ सकती है.

हार्ट फेलियर, कोरोनरी हार्ट डिज़ीज़, क्रोनिक लंग डिज़ीज़, पल्मोनरी एम्बोलिज़्म (फेफड़ों की ब्लड वेसेल में ब्लड क्लॉट), एनीमिया और अलग-अलग मेटाबॉलिक डिज़ीज़ जैसी स्थितियों में जल्दी डायग्नोसिस से इलाज के परिणामों में सुधार देखा गया है.

जांचों की मदद से डॉक्टर समय रहते मरीज की समस्या का पता लगा सकते हैं और तुरंत इलाज शुरू कर सकते हैं. इससे भविष्य में होने वाली जटिलताओं, बार-बार अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरतों और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है. इससे मरीज के जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है.

इसके अलावा कई मरीज़ सांस फूलने के कारण को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और इसका दोष अपनी उम्र या अपनी कमज़ोर शारीरिक क्षमता पर डाल देते हैं. इससे डायग्नोसिस में देरी होती है. शुरुआती जांच और सही डायग्नोसिस से इस देरी को रोका जा सकता है और समय पर ज़रूरी इलाज मिल सकता है.

हृदय रोग की आशंका

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इमेज कैप्शन, सीने में जकड़न, दर्द, चक्कर आना या पसीना आने जैसे लक्षण, हृदय रोग के लक्षण हो सकते हैं

अगर आपको थोड़ी सी भी मेहनत करने पर या रोज़मर्रा के काम करते समय भी सांस फूलने की समस्या आती है और यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ती जाए, आराम करने के बाद भी आराम न मिले, या इसके साथ-साथ सीने में जकड़न, दर्द, चक्कर आना या पसीना आने जैसे लक्षण दिखाई दें तो ये हृदय रोग के लक्षण हो सकते हैं. ऐसी स्थिति में आपको बिना समय बर्बाद किए हृदय रोग के विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए.

इस संबंध में हमने पुणे के बानेर स्थित मणिपाल हॉस्पिटल्स में कंसल्टेंट और कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. अभिजीत जोशी से कुछ सवाल पूछे.

सवाल: हृदय रोग में सांस फूलना और सांस लेने में तकलीफ़ जैसे लक्षण कितने आम हैं?

डॉ. अभिजीत जोशी: कई मरीजों में, ख़ासकर महिलाओं, बुज़ुर्गों और डायबिटीज़ के मरीजों में, परिश्रम के दौरान सांस फूलना हृदय रोग का शुरुआती लक्षण हो सकता है, यहां तक ​​कि सीने में दर्द से पहले भी. इसलिए, इस लक्षण को नज़रअंदाज करना सही नहीं है.

सवाल: क्या सीने में दर्द न होने पर भी हृदय रोग की संभावना हो सकती है?

डॉ. अभिजीत जोशी: हार्ट से जुड़ी सभी बीमारियों में सीने में दर्द नहीं होता. कुछ मरीजों में सांस लेने में तकलीफ़, जल्दी थकान, हृदय गति बढ़ना, चक्कर आना या कमज़ोरी मुख्य लक्षण हो सकते हैं. डायबिटीज़ के मरीज़ों में विशेष रूप से 'साइलेंट' हार्ट डिज़ीज़ का ख़तरा ज़्यादा होता है.

सवाल: हार्ट की ब्लड पंप करने की क्षमता में कमी के क्या प्रभाव होते हैं?

डॉ. अभिजीत जोशी: अगर हार्ट की ब्लड पंप करने की क्षमता कम हो जाती है, तो शरीर के विभिन्न अंगों को पर्याप्त ब्लड और ऑक्सीजन नहीं मिल पाते. इससे थकान, सांस फूलना, पैरों में सूजन और फेफड़ों में पानी जमा होने की आशंका बढ़ जाती है. इससे रोज़मर्रा गतिविधियों के दौरान भी सांस लेने में कठिनाई हो सकती है.

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इमेज कैप्शन, सांस लेने में तकलीफ़, सीने में दर्द या दबाव, बेहोशी, गंभीर चक्कर आना, धड़कन तेज़ होना, होंठ नीले पड़ना, पैरों में सूजन, खून की उल्टी होना या आराम करते समय भी सांस लेने में कठिनाई जैसे लक्षण महसूस होने पर मेडिकल सहायता लें

सांस फूलने की बात करें तो, उम्र बढ़ने के साथ शरीर की कार्यक्षमता स्वाभाविक रूप से कुछ हद तक कम हो जाती है. मांसपेशियों की ताकत कम हो जाती है और हृदय और फेफड़ों की कार्यक्षमता भी घट सकती है. इसलिए, पहले की तुलना में थोड़ी अधिक सांस फूलना स्वाभाविक है. हालांकि, यह मान लेना सही नहीं है कि अचानक सांस फूलना या सामान्य से अधिक होना सिर्फ उम्र के कारण है. डायबिटीज़ और ब्लड प्रेशर के मरीजों को इस पर विशेष तौर पर ध्यान देने की ज़रूरत है.

परेल के ग्लेनेगल्स अस्पताल के हृदय रोग विशेषज्ञ और निदेशक डॉ. राहुल गुप्ता ने बीबीसी मराठी से बात की.

वह कहते हैं., "डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रॉल हृदय रोग के जोखिम के प्रमुख कारक हैं. इसलिए ऐसे व्यक्तियों में सांस फूलना, हृदय रोग का लक्षण होने की ज़्यादा आशंका है."

"अगर इन कारकों में से किसी से भी प्रभावित व्यक्ति को व्यायाम करने की क्षमता में कमी महसूस हो या पहले आसानी से किए जाने वाले परिश्रम के दौरान सांस फूलने लगे, तो उन्हें डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए. जल्दी डायग्नोसिस और इलाज मिलने से हार्ट अटैक या हार्ट फ़ेल जैसी गंभीर जटिलताओं को रोका जा सकता है."

हमने डॉ. राहुल गुप्ता से पूछा कि क्या ऐसे कोई आसान संकेत हैं जिनसे पता चल सके कि किसी व्यक्ति की कार्डियोवैस्कुलर फ़िटनेस (हृदय से जुड़ी फिटनेस) में सुधार हो रहा है.

उन्होंने कहा, "कार्डियोवैस्कुलर फ़िटनेस का एक व्यावहारिक संकेतक यह है कि क्या कोई व्यक्ति बहुत ज़्यादा थकान या सांस फूलने का अनुभव किए बिना अपनी दैनिक गतिविधियां कर सकता है. उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति बिना किसी लक्षण के एक या दो मंजिल की सीढ़ियां चढ़ सकता है या लगभग 30 मिनट तक तेज़ गति से चल सकता है, तो उसे अच्छी शारीरिक स्थिति में माना जाता है. हालांकि, स्मार्टवॉच या ख़ुद से मूल्यांकन करने जैसी चीज़ें चिकित्सा जांच का विकल्प नहीं हो सकते. अगर सांस फूलना जारी रहता है या स्थिति अधिक गंभीर हो जाती है, तो डॉक्टर से परामर्श करना ज़रूरी है."

अगर आपको सांस लेने में तकलीफ़, सीने में दर्द या दबाव, बेहोशी, गंभीर चक्कर आना, धड़कन तेज़ होना, होंठ नीले पड़ना, पैरों में सूजन, खून की उल्टी होना या आराम करते समय भी सांस लेने में कठिनाई जैसे लक्षण महसूस हों तो तुरंत मेडिकल सहायता लें.

ये लक्षण हृदय या फेफड़ों से जुड़ी किसी गंभीर आपात स्थिति के संकेत हो सकते हैं. इसलिए समय पर इलाज जीवन बचा सकता है और लंबे समय तक के लिए स्वास्थ्य परिणामों को बेहतर बना सकता है.

अगर आप अपनी जीवनशैली में कोई महत्वपूर्ण बदलाव करना चाहते हैं, अपने भोजन में बदलाव करना चाहते हैं, दवा लेना चाहते हैं या शारीरिक व्यायाम शुरू करना चाहते हैं, तो डॉक्टर और एक योग्य प्रशिक्षक की मदद लेना महत्वपूर्ण है.

बेहतर यही होगा कि आप अपने शरीर और लक्षणों की डॉक्टर से ठीक से जांच करवाएं और उनकी सलाह पर ही जीवनशैली में बदलाव करें. डॉक्टर से परामर्श किए बिना ख़ुद से इलाज करना ख़तरनाक हो सकता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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