'दिमाग़ी नक्सल' वाले पीएम मोदी के बयान का इशारा किसकी ओर था?

नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, पीएम मोदी की 'दिमाग़ी नक्सल' वाली टिप्पणी पर विपक्षी दलों और आलोचकों ने सवाल उठाए हैं
    • Author, रौनक भैड़ा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 7 मिनट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए 'दिमाग़ी नक्सल' शब्द को लेकर विवाद शुरू हो गया है.

15 अगस्त को लाल क़िले की प्राचीर से दिए अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, "हथियारी नक्सल तो गए, लेकिन दिमाग़ी नक्सल मौके की तलाश में हैं. हिंसा अराजकता के वो रास्ते खोज रहे हैं. इन दिमाग़ी नक्सलियों को पहचानना होगा. इन दिमाग़ी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा."

पीएम मोदी की इस टिप्पणी के बाद विपक्षी दलों और आलोचकों ने पूछा है कि 'दिमाग़ी नक्सल' से उनका मतलब किन लोगों से है.

कुछ आलोचकों का आरोप है कि सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाले युवाओं, बुद्धिजीवियों और विचारकों को इस तरह के शब्दों के ज़रिए निशाना बनाया जा रहा है.

वहीं, बीजेपी ने प्रधानमंत्री के बयान का बचाव करते हुए कहा है कि इसे उसके व्यापक संदर्भ में समझने की ज़रूरत है.

बीजेपी ने 'दिमाग़ी नक्सल' का क्या मतलब बताया?

सुधांशु त्रिवेदी

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इमेज कैप्शन, बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि 'दिमाग़ी नक्सल' शब्द को गहराई से समझने की ज़रूरत है (फ़ाइल फ़ोटो)

पीएम मोदी के भाषण के बाद बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर एक वीडियो साझा किया.

वीडियो के साथ उन्होंने लिखा, "प्रधानमंत्री ने लाल क़िले से अपने उद्बोधन में जो दिमाग़ी नक्सल शब्द कहा है, उसको गहराई से समझने की आवश्यकता है."

वीडियो एक न्यूज़ चैनल के डिबेट का है, जिसमें सुधांशु त्रिवेदी कह रहे हैं, "वह दिमाग़ी नक्सल है, जो कहे कि 'नक्सली गांधीयन्स विद गन है.' वह दिमाग़ी नक्सल है, जिसको सीएए में यह नज़र आता था कि यह नागरिकता छीनने का क़ानून है, जबकि पांच साल में किसी मुसलमान की नागरिकता नहीं गई."

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उन्होंने कहा, "वह दिमाग़ी नक्सल है जिसको जय श्री राम में वॉर क्राइम नज़र आता हो, मगर सर तन से जुदा हो जाने के बाद भी उसमें सेक्युलर संगीत नज़र आता है."

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'दिमाग़ी नक्सली' वाली टिप्पणी का समर्थन किया.

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सही बात कही है. बंदूक़ वाला नक्सलवाद ख़त्म हो चुका है. लेकिन उससे भी ज़्यादा ख़तरनाक, हम ऐसे लोगों में एक तरह का दिमाग़ी नक्सलवाद देख रहे हैं, जिनके दिमाग़ में अराजकता भरी हुई है. दुर्भाग्य से, आज कांग्रेस के कार्यक्रम में भी हमें इसका एक उदाहरण देखने को मिला. 15 अगस्त को पूरा वंदे मातरम बजाने का फ़ैसला देश के संविधान के तहत मिली शक्तियों के दायरे में लिया गया था."

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी अपने एक बयान में इस बात का ज़िक्र किया है कि 'दिमाग़ी नक्सल' कौन हैं.

उन्होंने कहा, "जहां भारत ने एक तरफ़ नक्सलवाद को ख़त्म किया है, वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने 'दिमाग़ी नक्सलियों' का भी ज़िक्र किया. ये वे लोग हैं, जो कहीं न कहीं समाज में अराजकता फैलाने की कोशिश करते हैं. ये वे लोग हैं, जो शायद विकसित भारत के निर्माण को नहीं देख सकते. ये वे लोग हैं, जो शायद विदेशी ताक़तों के साथ मिलकर भारत को सुपरपावर बनने से रोक रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने आज लोगों से ऐसे लोगों से सावधान रहने की अपील की."

विपक्षी दलों ने क्या कहा?

जयराम रमेश और राजीव शुक्ला

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस नेता जयराम रमेश और राजीव शुक्ला ने पीएम मोदी की टिप्पणी की आलोचना की है (फ़ाइल फ़ोटो)

प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर कांग्रेस ने सवाल उठाते हुए उनसे 'दिमाग़ी नक्सल' की स्पष्ट परिभाषा बताने को कहा है.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, "दो-तीन साल पहले उन्होंने (पीएम मोदी) अपने राजनीतिक विरोधियों को 'अर्बन नक्सल' कहा, तब संसद में ये पूछा गया कि 'अर्बन नक्सल' की परिभाषा क्या है? गृह मंत्री से जवाब आता है कि 'अर्बन नक्सल' कोई चीज़ नहीं है, कोई परिभाषा नहीं है. आज प्रधानमंत्री लाल क़िले से 'दिमाग़ी नक्सल' की भाषा, अपने राजनीतिक विरोधियों को लेकर इस्तेमाल करते हैं."

पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने एक्स पर लिखा, "मुझे दिमाग़ी नक्सल होने पर गर्व है."

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला ने इस पर कहा, "पहले तो दिमाग़ी नक्सल की परिभाषा बताई जाए कि ये क्या है? आप किसे दिमाग़ी नक्सल कह रहे हैं? ये उन युवाओं और बुद्धिजीवियों का अपमान है, जो देश और समाज के लिए सोचते हैं. पहले भी उन्होंने अर्बन नक्सल कहा था. अब इन्होंने पढ़े लिखे लोगों को दिमाग़ी नक्सल बता दिया."

राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने एक्स पर पोस्ट किया, "डियर प्राइम मिनिस्टर सर... बहुत छोटे, युवा और हमेशा जिज्ञासु रहने वाले हम लोग 'दिमाग़ी नक्सल' शब्द देने के लिए आपका दिल से धन्यवाद करते हैं. अब वायरल होने वाले मीम्स, रील्स, कार्टून, पैरोडी, कविताओं और गानों के लिए तैयार रहिए. ये अलग-अलग भारतीय भाषाओं और कई तरह के अंदाज़ में होंगे."

तृणमूल कांग्रेस के सांसद कीर्ति आज़ाद ने कहा, "प्रधानमंत्री का कमाल है, जो पढ़ा लिखा है वो नक्सल है और जो अनपढ़ और अज्ञानी है वो देशभक्त है, ये इनकी परिभाषा है. ये पेपर लीक कराते हैं और चाहते हैं कि सब अनपढ़ रहें. जबकि जो पढ़-लिख लेगा वो इनकी नज़रों में दिमाग़ी नक्सल हो जाएगा."

कॉकरोच जनता पार्टी और आलोचकों ने ये कहा

सौरव दास

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इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री मोदी के बयान के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के सह-संयोजक सौरव दास ने कहा कि जागने का समय आ गया है (फ़ाइल फ़ोटो)

कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने भी पीएम मोदी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे युवाओं से जोड़कर देखा है.

सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास ने कहा, "दिमागी नक्सली या ऐसा कुछ भी कहने से काम नहीं चलेगा, प्रधानमंत्री. सिर्फ़ इसलिए कि पढ़े-लिखे युवा आपकी सरकार से सवाल करते हैं, आप उन्हें खुले तौर पर नक्सली आदि कैसे कह सकते हैं? यह घमंड की हद है! उनकी समस्याओं को हल करने में पूरी नाकामी है! ख़तरे की घंटी बज रही है. जागने का समय आ गया है."

सीजेपी के सह-संयोजक आशुतोष रांका ने पीएम मोदी की टिप्पणी के बाद कहा, "ये जंतर मंतर के बाद का भारत है. ये वो भारत नहीं है जहां आप लोगों को डरा-धमका सकते थे. हम लोगों से सवाल पूछेंगे, हम संस्थाओं से सवाल पूछेंगे. हम हर उस व्यक्ति से सवाल पूछेंगे जो 'पावर' में हो, चाहे न्यायालय में हो, इलेक्शन में हो, ईडी और सीबीआई में हो. सवाल पूछना हमारा अधिकार है. अगर आप सोचते हैं कि आप डरा-धमका सकते हैं तो वो समय अब निकल गया."

प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने भी सवाल उठाया.

प्रशांत भूषण ने एक्स पोस्ट में कहा, "मोदी जी किनको दिमाग़ी नक्सल कह रहे हैं? क्या हमारे युवाओं को जो जंतर मंतर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़ा की मांग कर रहे थे? या आज प्रोटेस्ट कर रहे बच्चों को जो स्कूल मैं सुचारु व्यवस्था की मांग कर रहे हैं?"

फ़िल्ममेकर अनुराग कश्यप ने पीएम की टिप्पणी पर तल्ख़ प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "बच्चों को नक्सल क्या होता है वही नहीं पता, पहली किताबों में से जो चैप्टर डिलीट किया है वो वापस डालो."

'ये टिप्पणी केवल जेन ज़ी तक सीमित नहीं'

हेमंत अत्री

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री मानते हैं कि लाल क़िले की प्राचीर से भाषण देना गरिमापूर्ण होता है, पीएम मोदी को ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "लाल क़िले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर भाषण देते हुए देश के भविष्य या उत्थान की बात की जा सकती थी. फिर भी उन्होंने ऐसी भाषा चुनी."

वो कहते हैं, "पीएम मोदी की ये टिप्पणी केवल जेन-ज़ी तक सीमित नहीं है. जो पीएम मोदी या बीजेपी को सवाल करता है, उनकी आलोचना करता है, उन सबके लिए उन्होंने इस शब्द का इस्तेमाल किया है. बीते 13 वर्षों में इस तरह के कई शब्द सामने आए हैं. वो लेबलिंग करके बदनाम करते हैं, ये इसी रणनीति का एक हिस्सा है."

प्रीति सिन्हा

सत्य हिन्दी डॉट कॉम के एडिटर प्रोफ़ेसर मुकेश कुमार मानते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपना 'नया शत्रु' चुन लिया है.

उन्होंने लिखा, "जिस तरह से इस टुकड़े को पूरा संघ परिवार फैला रहा है, उससे साफ़ है कि उसने अपना नया शत्रु चुन लिया है. प्रधानमंत्री ने सबको बता दिया है कि दिमाग़ी नक्सली उर्फ़ जेन-ज़ी और उसके साथ खड़े लोगों के साथ कैसे पेश आना है."

मुकेश कुमार का कहना है, "ऐसा हो सकता है इसमें हथियारी नक्सलियों से निपटने वाला तरीक़ा न हो. शायद इसमें संघ परिवार के संगठन सीधे मैदान में उतारे जाएं और आंदोलन करने वालों से मारपीट करें. सत्ता इन स्वयंसेवकों के संरक्षण के लिए खड़ी होगी. पुलिस और सुरक्षा बलों का सीमित उपयोग भी हो सकता है. ढेर सारे मुक़दमे लादकर भी परेशान किया जा सकता है. कुल मिलाकर ये है कि इसका ख़तरा बढ़ गया है कि फ़ासीवाद अब अपने चरम रूप में हमारे सामने आने वाला है."

'फ़िलहाल' पत्रिका की संपादक और वरिष्ठ पत्रकार प्रीति सिन्हा मानती हैं कि ये पीएम मोदी की ओर से इस्तेमाल किया गया एक जुमला है.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "हाल के स्टूडेंट आंदोलन के बाद पीएम मोदी की इस टिप्पणी का मकसद असहमति और विरोध की आवाज़ों को निशाना बनाना है."

प्रीति सिन्हा के मुताबिक़, इससे पहले 'अर्बन नक्सल' जैसे जुमलों के ज़रिए उन आवाज़ों को दबाने की कोशिश की गई, जो ग़रीबों, वंचितों और शोषितों के अधिकारों के साथ-साथ बेरोज़गारी और महंगाई जैसे मुद्दे उठाती रही हैं.

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि 'दिमाग़ी नक्सल' का नया जुमला आगे और सुनियोजित तरीक़े से दमन की आशंका को दिखाता है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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