'उनका क्या अपराध था': बीबीसी पहुंचा ईरान के उस स्कूल, जहां हमले में मारे गए 120 बच्चे

- Author, नवल अल-मग़ाफ़ी
- पदनाम, सीनियर इंटरनेशनल कॉरस्पॉडेंट
- ........से, मीनाब, दक्षिणी ईरान
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
(इस रिपोर्ट में बच्चों की मौत से जुड़ी दर्दनाक घटनाओं का वर्णन है)
टीचर अमाइने नदेमी अपने पुराने स्कूल के बचे हुए हिस्से में खुद को संभालते हुए क़दम रखती हैं. ऊपर की टूटी हुई मंजिल से कंक्रीट के बड़े टुकड़े लटक रहे हैं. कुछ कक्षाओं के भवन अब भी खड़े हैं, जिनकी रंग-बिरंगी दीवारों पर गुब्बारों और फूलों के चित्र बने हुए हैं.
33 वर्षीय शिक्षिका अमाइने नदेमी को आज भी ठीक-ठीक पता है कि स्कूल में कौन-सी जगह कहां थी. ऊपर की मंज़िल पर लड़कियों की क्लासेज थीं, नीचे लड़कों की. इसके अलावा हेडटीचर का कमरा और प्रेयर रूम (प्रार्थना कक्ष) भी था.
दक्षिणी ईरान के छोटे शहर मिनाब स्थित शाजेरह तैय्यबा प्राथमिक स्कूल में नदेमी प्राइमरी स्कूल में पहली कक्षा की लड़कियों को पढ़ाती थीं. अब उनकी कक्षा की जगह सिर्फ़ मलबा बचा है.
28 फ़रवरी को ईरान के साथ अमेरिका-इसराइल युद्ध शुरू होने के शुरुआती घंटों में स्कूल पर हमला हुआ. इस हमले ने एक सामान्य शनिवार की सुबह को संघर्ष की सबसे दर्दनाक घटनाओं में बदल दिया. यह हमला आम नागरिकों के लिए युद्ध की सबसे घातक घटनाओं में से एक थी.
मिनाब के प्रॉसिक्यूटर ऑफ़िस के अनुसार, इस हमले में कुल 156 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है. मरने वालों में 120 बच्चे शामिल हैं. इसके अलावा एक गर्भवती महिला और उसके अजन्मे बच्चे की भी मौत हुई है.
विशेषज्ञों का कहना है कि मिले सबूतों से संकेत मिलता है कि अमेरिकी सेना ने स्कूल पर हमला किया था. यह स्कूल इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के एक परिसर के पास स्थित है. सैटेलाइट तस्वीरों के अनुसार, इस पर कई बार हमला किया गया था.
अमेरिका ने अब तक इस हमले की ज़िम्मेदारी स्वीकार नहीं की है. हालांकि, अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार,मिलिट्री इंवेस्टिगेटर्स का मानना है कि यह संभव है कि अमेरिकी सेना ने अनजाने में हमला किया हो.

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यहां जो कुछ हुआ, उसका दर्द आज भी ताज़ा है. शिक्षक बताते हैं कि वे रोज यहां प्रेयर करते हैं. बचावकर्मी अभी भी यहां मारे गए लोगों के अवशेषों की तलाश कर रहे हैं.
ऊपरी मंजिल का अधिकांश हिस्सा नीचे वाली मंजिल पर गिर गया. टीचर अमाइने नदेमी कहती हैं, "आप इसे स्कूल नहीं कह सकते- बस दीवारें हैं जिनसे मौत, दुख और यहां बहाए गए खून की गंध आती है."
ईरानी अधिकारी चाहते थे कि हम इस स्कूल का दौरा करें. उनका दावा है कि यह स्कूल इस बात का सबूत है कि अमेरिका जिस अभियान को ईरान के सैन्य और सुरक्षा ढांचे को निशाना बनाने वाली कार्रवाई के रूप में पेश कर रहा है, उसका असर आम नागरिकों पर भी विनाशकारी रूप से पड़ा है.
एक आम दिन ऐसे बन गया भयावह
हमले वाले दिन को याद करते हुए अमाइने नदेमी कहती हैं कि स्कूल में दिन की शुरुआत आम दिनों की तरह ही हुई थी.
रमज़ान के पवित्र महीने के कारण बच्चे प्रार्थना कक्ष में इकट्ठे हुए थे, जहां उन्होंने क़ुरान पढ़ी. इससे पहले कि अमाइने ने अपनी कक्षा के छात्रों को फ़ारसी वर्णमाला का एक नया अक्षर पढ़ाना शुरू करतीं, हेडटीचर ने स्कूल बंद करने की घोषणा कर दी. ऐसा इसलिए, क्योंकि ईरान पर हमले शुरू हो गए थे.
शिक्षकों ने अभिभावकों से संपर्क कर बच्चों को घर ले जाने के लिए कहा.
अमाइने का कहना है कि जब उन्होंने स्कूल से कुछ ही दूरी पर धमाके की आवाज़ सुनी, तब ऊपरी मंजिल पर पहली क्लास के पांकग बच्चे रह गए थे. उनका कहना है कि वह गलियारे में थीं और बच्चों को बचाने के लिए तुरंत वापस भागीं.
अमाइने ने कहा, "जैसे ही मैं बाहर निकलने वाली थी, एक मिसाइल स्कूल पर आ गिरी. मेरे और स्टूडेंट्स के सिर से कुछ टकराया और हम सभी दूर जा गिरे."
उन्होंने बताया कि इसके बाद कक्षा में घना काला धुआं भर गया. उन्होंने बताया, "मैं अपनी बांहों में पकड़े बच्चों को भी नहीं देख पा रही थी. हम सांस नहीं ले पा रहे थे."
उन्होंने आगे बताया कि उन्हें एक और धमाके की आवाज़ सुनाई दी. इसके बाद चीख-पुकार, बच्चों के रोने की आवाज़ें और फिर पूरे स्कूल के ढहने की आवाज़ आई. अमाइनेह ने कहा कि स्कूल "एक ही पल में पूरी तरह तबाह हो गया."
अमाइने ने बताया, "मेरे और बच्चों के शरीर से ख़ून बह रहा था."

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धुआं कुछ देर के लिए छंटा तो अमाइने ने घायल बच्चों को इमारत के नीचे खड़े लोगों तक पहुंचाना शुरू किया. इसके बाद वह आग और मलबे के बीच से गुज़रते हुए स्कूल के गेट तक पहुंची, जहां बड़ी संख्या में अभिभावकों की भीड़ जमा थी.
अमाइने के मुताबिक़, कई माता-पिता बिना जूते पहने ही अपने बच्चों को बचाने के लिए घटनास्थल पर पहुंच गए थे.
अमाइने ने बताया कि उस समय वह सदमे और भ्रम की स्थिति में थीं. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि लोग स्कूल की ओर क्यों भाग रहे हैं. उन्हें लगा कि इमारत से बाक़ी सभी लोग पहले ही बाहर निकल चुके हैं. उन्होंने कहा, "मुझे नहीं पता था कि वे सभी मलबे के नीचे दबे हुए हैं."
अमाइने पिछले छह वर्षों से इस स्कूल में पहली कक्षा की टीचर थीं. उन्होंने उस हादसे में मारे गए अपने छात्रों और सहकर्मियों के नाम याद किए. इनमें उनकी कक्षा की छात्रा अड्रीना भी शामिल थी, जिसकी मौत सीढ़ियों पर अपनी मां के साथ हो गई थी. इसके अलावा, दूसरी कक्षा की छात्रा फातिमा और छठी कक्षा के कई छात्र भी मारे गए, जिन्हें उन्होंने कभी अल्फ़ाबेट सिखाए थे. हादसे में स्कूल के हेडटीचर, डिप्टी हेड, फ़िजिकल एजुकेशन और क़ुरान पढ़ाने वाले टीचर की भी मौत हो गई.
'किसी के हाथ मिले, किसी के पैर'
हादसे के कुछ ही मिनटों बाद राहत और बचाव दल मौके पर पहुंचने लगे. ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी के कार्यकर्ता रज़ा बेशारती ने बताया कि वह घटनास्थल पर पहुंचने वाले शुरुआती बचावकर्मियों में शामिल थे.
रज़ा के अनुसार, स्कूल के आसपास की सड़कें लोगों से भर गई थीं. बड़ी संख्या में परिवार अपने बच्चों की तलाश में वहां पहुंच गए थे.
उन्होंने बताया कि मिनाब एक छोटा शहर है, इसलिए मलबे के बीच जाते समय उन्हें कई परिचित लोग दिखाई दिए, जिनमें उनके कुछ रिश्तेदार भी शामिल थे.
रज़ा ने कहा, "हमने लोगों को ढूंढना शुरू किया. हमें उम्मीद थी कि शायद कोई ज़िंदा मिल जाए. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ."

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रज़ा बताते हैं कि मलबे से निकाले गए शवों की हालत बेहद भयावह थी. उन्होंने कहा, "शायद किसी का सिर्फ़ हाथ मिला, किसी का सिर्फ़ पैर... किसी का भी पूरा शरीर नहीं था."
उनके मुताबिक़, कई परिवारों ने अपने बच्चों की पहचान उनके जूतों या कपड़ों से की.
रज़ा ने बताया कि उनकी एक रिश्तेदार भी अपने बच्चे की तलाश में घटनास्थल पर पहुंची थीं. वह बार-बार गुहार लगा रही थीं, "बस मेरे बच्चे को ढूंढ दो, मेरे बेटे ढूंढ ढूँढ दो."
उन्होंने कहा, "मैं उन्हें यह नहीं बता सकता था कि उनका बेटा नहीं रहा. हम सब बस रो रहे थे."
रज़ा के मुताबिक़, ढही हुई इमारत में तलाशी अभियान के दौरान देखे गए भयावह दृश्य आज भी उनका पीछा नहीं छोड़ते.
उन्होंने कहा, "मैं कई दिनों तक सो नहीं सका. जब भी मैं अपनी आंखें बंद करता हूं... मुझे यहां देखी हुई वही सारी चीज़ें याद आने लगती हैं."
स्कूल पर हुए हमले पर अमेरिका ने ये कहा
स्कूल पर हुए हमले की जानकारी सामने आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बिना कोई सबूत पेश किए ईरान को ही इसके लिए दोषी ठहराया था.
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा था कि सेना इस मामले की जाँच कर रही है और अमेरिकी सेना कभी भी नागरिक ठिकानों को निशाना नहीं बनाती.
बाद में उन्होंने जाँच को उच्च स्तर पर कराने का एलान किया, जिसकी अगुवाई यूएस सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) से बाहर के एक अधिकारी को सौंपी गई. हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने अब तक जाँच की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की है.
अमेरिकी मीडिया की कुछ रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती जाँच में पता चला कि पुरानी खुफ़िया जानकारी की वजह से शायद स्कूल को गलती से सैन्य ठिकाना समझ लिया गया.
विशेषज्ञों की वीडियो जांच में सामने आया है कि स्कूल के पास स्थित ईरान के आईआरजीसी परिसर को सटीक निशाना लगाने वाली टॉमहॉक क्रूज़ मिसाइल से हमला किया गया. रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह की मिसाइल न तो इज़रायल और न ही ईरान के पास होने की जानकारी है.
सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि स्कूल और परिसर की कई इमारतें हमले में क्षतिग्रस्त हुईं. सत्यापित वीडियो में भी इस इलाक़े में कई बार हमले होने के संकेत मिले हैं. अमेरिकी सैन्य नक्शों में भी उस समय दक्षिणी ईरान में अमेरिकी सैन्य अभियानों की पुष्टि होती है, जिसमें मिनाब क्षेत्र शामिल है,
पुरानी सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि स्कूल वाला इलाक़ा पहले आईआरजीसी परिसर का हिस्सा था. हालांकि, 2016 से दोनों क्षेत्रों के बीच दीवार बनाई गई थी और स्कूल का अपना अलग प्रवेश द्वार और परिसर था.
इसके अलावा, उस जगह के स्कूल होने की जानकारी इंटरनेट पर पहले से मौजूद थी. हमले से कुछ महीने पहले स्कूल के लड़कों और लड़कियों के सेक्शन की वेबसाइटों पर पुरानी तस्वीरों (आर्काइव) में भी उस जगह का पता साफ तौर पर दिया गया था.
सेंटकॉम प्रमुख ने मई में अमेरिकी कांग्रेस की एक समिति के सामने बिना विस्तृत जानकारी दिए कहा था कि जाँच "जटिल" है, क्योंकि स्कूल "आईआरजीसी के सक्रिय क्रूज़ मिसाइल ठिकाने" पर स्थित था.
हालांकि, ईरान के विदेश मंत्रालय ने इस दावे को खारिज करते हुए इसे 'बेबुनियाद मनगढ़ंत कहानी' बताया.
आईआरजीसी अपने सैन्य, सुरक्षा और आर्थिक कार्यों के अलावा कुछ सामुदायिक और चिकित्सा सुविधाएँ भी संचालित करता है. स्थानीय लोगों ने बीबीसी फ़ारसी को बताया कि यह स्थान पहले आईआरजीसी की नौसैनिक ब्रिगेड का अड्डा था, लेकिन उनका मानना था कि कई साल पहले इसका सैन्य इस्तेमाल बंद हो चुका था.
तस्वीरों में परिसर के अंदर एक क्लिनिक और कार वॉश जैसी सुविधाएँ भी दिखाई देती हैं.
बीबीसी ने इस मामले पर टिप्पणी के लिए रक्षा विभाग और अमेरिकी सेना से संपर्क किया. अधिकारियों ने बताया कि जांच जारी है और इस संबंध में कोई और जानकारी उपलब्ध नहीं है.
'मोजों के रंग से हुई बेटी के शव की पहचान'
खंडहर हो चुके स्कूल से कुछ दूरी पर वह कब्रिस्तान है, जहां इस हादसे में मारे गए कई छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को दफ़नाया गया है.
हर शाम, परिवार कब्रों के पास इकट्ठा होते हैं. माताएं अपने बच्चों की तस्वीरों से धूल साफ करती हैं. माता-पिता अंधेरा होने के काफी देर बाद तक बैठकर प्रार्थना करते हैं.
इन कब्रों के बीच कई भाई-बहन उन बच्चों की कब्रों के आसपास खेलते नज़र आते हैं, जिनकी ज़िंदगी हादसे में समय से पहले ख़त्म हो गई.

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मसोमा मेहरन शेख़ाबादी हर दिन अपनी नौ साल की बेटी सेतायश की कब्र पर आती हैं और अक्सर देर रात तक वहीं बैठी रहती हैं.
मसोमा उन अभिभावकों में शामिल थीं, जो हमले के बाद अपने बच्चों को खोजने के लिए स्कूल पहुंचे थे. वह उस भयावह मंजर को याद करते हुए कहती हैं, "वहाँ कोई स्कूल नहीं बचा था. सिर्फ़ धुआं था, बच्चों के बाल थे, एक तरफ़ हाथ था और दूसरी तरफ़ पैर. सब कुछ तहस-नहस हो चुका था."
मसोमा आगे कहती हैं, "मैं न केवल सितायेश को, बल्कि सभी बच्चों को पुकारती रही, बच्चों, तुम कहाँ हो?"
मसोमा के मुताबिक़, सेतायश की मौत की पुष्टि उनके परिवार को अगली सुबह तड़के हुई. उन्होंने बताया कि उनसे बार-बार पूछा गया कि बच्ची ने किस रंग के मोज़े पहने थे. उन्होंने जवाब दिया कि वे क्रीम रंग के थे और बाद में उन्हीं मोज़ों के आधार पर सेतायश की पहचान की गई.
मसोमा बताती हैं कि उनकी नौ साल की बेटी का सपना टीचर बनने का था.
वह कहती हैं, "मेरी बेटी सोफे पर अपनी गुड़ियों को बैठाती और कहती मैं तुम्हारी टीचर हूं. मैं अब प्राइमरी स्कूल में हूं, इसलिए मैं एक टीचर हूं.'"
यहां के कई माता-पिता की तरह उनके मन में भी दुख और गुस्सा दोनों हैं.
मसोमा कहती हैं, "ट्रंप का अंत हो जाए, ताकि इन बच्चों की मौत बेकार न जाए."

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'बच्चों के पास हथियार नहीं, किताबें और पेंसिल थीं'
ईरान की सरकार ने मिनाब हमले का बार-बार अपने भाषणों, अंतरराष्ट्रीय मंचों और सरकारी मीडिया कवरेज में जिक्र किया है. अमेरिका से बातचीत के लिए जा रहे वार्ताकारों ने अपने विमान का नाम भी "मिनाब-168" रखा था.
यह हमला ईरान के लिए अमेरिका के दावों के खिलाफ अपनी बात रखने का एक बड़ा मौका बन गया.
ईरान ने इसे अमेरिकी सैन्य अभियान की कहानी को चुनौती देने के लिए इस्तेमाल किया.

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इस युद्ध ने ईरान के लोगों को भी विभाजित दिया है. जब हवाई हमले शुरू हुए तो कुछ लोगों ने उनका स्वागत किया. ये लोग सरकार की ओर से असहमति रखने वालों को हिरासत में लेने और विरोध प्रदर्शनों के दौरान बल प्रयोग से नाराज़ थे. उन्हें उम्मीद थी कि बाहरी सैन्य दबाव से शायद ईरानी शासन कमज़ोर हो सकता है या सत्ता परिवर्तन हो सकता है.
हालांकि, सरकार के कुछ विरोधियों ने बीबीसी से कहा कि मिनाब पर हुआ हमला उनके लिए बड़ा झटका था. उनके अनुसार, इस घटना ने "साफ़-सुथरे और सीमित युद्ध" के दावे को कमज़ोर कर दिया और ईरानी अधिकारियों को खुद को विदेशी हमले से जनता की रक्षा करने वाले के रूप में पेश करने का मौका मिल गया.
मिनाब में टीचर अमाइने नदेमी अब भी कब्रिस्तान जाती हैं और अपने उन छात्रों की कब्रों के बीच घूमती हैं, जिन्हें उन्होंने कभी पढ़ाया था.
पास ही बने एक स्मारक पर उन बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों की तस्वीरें लगाई गई हैं, जो उस शनिवार सुबह घर से निकले थे, लेकिन वापस नहीं लौट सके.
सितायश की मां आज भी अपनी नन्ही बेटी की कब्र के पास बैठती हॉन.
वह कहती हैं, "इन बच्चों का अपराध क्या था? क्या उनके पास हथियार थे? एक पेंसिल, एक किताब, एक नोटबुक और एक स्कूल बैग. उनके पास कोई हथियार नहीं थे... वे पढ़ने गए थे."
इस रिपोर्ट में जैस्मिन डायर ने अतिरिक्त रिपोर्टिंग के ज़रिए सहयोग किया.
नवल अल-मग़ाफ़ी ईरान से रिपोर्टिंग कर रही हैं. ईरान में काम कर रहे सभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों पर लागू नियमों के तहत यह शर्त रखी गई है कि उनकी किसी भी रिपोर्टिंग सामग्री का इस्तेमाल बीबीसी की फ़ारसी सेवा में नहीं किया जाएगा.
हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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