जर्मनी में फँसी 27 महीने की भारतीय बच्ची कब मिलेगी अपने माता-पिता से

प्रकाशित

सुशीला सिंह

बीबीसी संवाददाता

गुजराती मूल के और जर्मनी में रहने वाले धरा और भावेश शाह की बेटी अरिहा शाह की कस्टडी का मामला फिर तूल पकड़ता जा रहा है.

धरा और भावेश शाह साल 2018 में जर्मनी गए थे. उनकी बेटी अरिहा शाह पिछले 20 महीने से जर्मनी के फ़ोस्टर केयर में रह रही है.

भारत सरकार के राजनयिक दबाव के बाद अब अरिहा शाह के समर्थन में 59 सांसदों ने जर्मनी के राजदूत को चिट्ठी लिखी है.

अरिहा शाह के माता-पिता ने उम्मीद जताई है कि भारत के लोगों, सांसदों की चिट्ठी और सरकार की कोशिशों के कारण उन्हें अपनी बच्ची जल्द ही मिल जाएगी.

क्या है पूरा मामला?

  • साल 2021 के सितंबर महीने में धरा शाह ने अपनी बेटी के डायपर में ख़ून देखा
  • डॉक्टर ने प्रारंभिक जाँच में कहा कि कुछ गंभीर नहीं है.
  • फ़ॉलो अप के लिए जब धरा शाह अपनी बेटी को लेकर गईं तो उन्हें बड़े अस्पताल में दिखाने की सलाह दी गई
  • साढ़े सात महीने की अरिहा शाह को जर्मन चाइल्ड लाइन सर्विस भेज दिया गया.
  • अरिहा के माता-पिता गुजरात के रहने वाले हैं.
  • डॉक्टरों ने अरिहा शाह के साथ कथित यौन उत्पीड़न मामला होने की बात कही
  • इसके बाद अरिहा शाह को फोस्टर केयर में डाल दिया गया
  • जाँच के बाद डॉक्टरों ने कहा कि बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न नहीं हुआ है.
  • साल 2022 में पुलिस ने केस बंद कर दिया
  • लेकिन चाइल्ड लाइन सर्विस ने कोर्ट में पैरेंटिंग राइट्स टर्मिनेट का केस बरक़रार रखा यानी बच्ची, भावेश और धरा शाह को नहीं दी जा सकती थी
  • कोर्ट ने अरिहा शाह के अभिभावकों की मनौवैज्ञानिक जाँच कराने की बात कही

अरिहा की माँ क्या कहती हैं?

जर्मनी से फ़ोन पर बातचीत में धरा शाह कहती हैं, ''हमारा ये टेस्ट इसलिए करवाया गया ताकि ये जाना जा सके कि हम बच्चे की देखभाल ठीक से कर सकते हैं या नहीं. इस बारे में एक्सपर्ट ने 12 महीने बाद रिपोर्ट दी है.''

साथ ही उनका कहना था कि बच्ची को चाइल्ड फैसिलिटी में डालने की बात कही गई जिसमें माँ या पिता में से एक बच्ची के साथ रह सकता है. और दूसरा पैरेंट बच्ची से आकर मिल सकता है. हम इसके लिए भी तैयार हैं.

वे कहती हैं, ''हालाँकि आप ये सोचिए कि क्या ये व्यावहारिक तौर पर संभव है? बच्ची को दोनों का प्यार मिलना चाहिए. साथ ही ये तो पति और पत्नी दोनों को अलग करने की कोशिश है.''

उनके अनुसार, ''कोर्ट में चल रही सुनवाई में केवल पैरेंटिग स्किल्स पर ही बहस होती रही. हालाँकि अभी तक कोई आर्डर नहीं आया है और अरिहा को स्पेशल नीड्स फैसिलिटी में डाल दिया गया है. बताइए मेरी सामान्य बच्ची को क्यों वहाँ डाला गया है.''

अरिहा शाह स्पेशल नीड्स चाइल्ड यानी विशेष ज़रूरतों वाली बच्ची नहीं है.

धरा शाह रुआँसी होते हुए कहती हैं कि एक माँ की अपने बच्चे को पलते बढ़ते देखने की ख़्वाहिश होती है लेकिन वो इन सबसे महरूम हो रही हैं.

रूंधे हुए गले से वे कहती हैं, ''मेरी बेटी दो साल की हो चुकी है. ना मैंने उसके मुँह से निकला पहला शब्द सुना, चलना सीखने से पहले ना पहला क़दम देखा और ना उसके दाँत निकलना देखा.''

साथ ही धरा शाह कहती हैं कि जब वो अपनी बेटी से मिलने जाते हैं, तो वो हम से बहुत प्यार से मिलती है लेकिन इस पर जर्मनी के प्रशासन कहते हैं कि उसे स्ट्रैंजर एटेचमेंट डिसऑर्डर है.

हमने इस बारे में डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक पूजा शिवम बात की.

उनके अनुसार कई डिसऑर्डर होते हैं लेकिन जो बताया जा रहा है उसे डिसइन्हेबिटीड सोशल इनगेजमेंट डिसआर्डर कहते हैं.

इसमें बच्चा किसी के साथ भावनात्मक तौर पर नहीं जुड़ता लेकिन अजनबियों से तुरंत घुल मिल जाता है.

लेकिन धरा शाह अपनी बेटी को ऐसे किसी भी डिसऑर्डर होने से इनकार करती हैं.

राजनैतिक पार्टियों की चिट्ठी

अरिहा शाह को लेकर 19 राजनीतिक पार्टियों के 59 सांसदों ने जर्मनी के राजदूत फ़िलिप एकरमैन को एक चिट्ठी भी लिखी है.

इस चिट्ठी में इन सांसदों ने जर्मनी प्रशासन से अरिहा शाह को मां-बाप को सौंपे जाने की हरसंभव कोशिश करने की अपील की है.

लोकसभा और राज्यसभा के इन सांसदों ने राजदूत को लिखा है कि बच्ची की उसके देश में वापसी होनी चाहिए और अगर इसमें देरी होती है इससे बच्ची का नुक़सान होगा.

चिट्ठी लिखने वालो में बीजेपी, कांग्रेस, वामपंथी दलों और अन्य पार्टी के सांसद शामिल हैं.

इस चिट्ठी में इन नेताओं ने लिखा है, ''भारत अपने बच्चे की ख़ुद देखभाल कर सकता है.अगर आपके देश के बच्चे को जबरन भारत के फ़ोस्टर केयर में रखा जाएगा तो सोचिए आपको कैसा महसूस होगा.''

भारत सरकार औपचारिक तौर पर जर्मनी की सरकार से बच्ची को चाइल्ड वेलफ़ेयर ऑथरिटी को देने बात कर चुकी है.

धरा शाह भी कहती है, ''हमने ये अपील की थी कि अरिहा का ये अधिकार है कि उसे उसकी मातृ भाषा सिखाई जाए, समुदाय के लोगों से मिलवाया जाए, मंदिर ले जाया जाए लेकिन ऐसा कुछ नहीं सिखाया जा रहा है. वो 27 महीने की हो गई है उसके बावजूद उसे भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ नहीं बताया गया और केवल जर्मन भाषा सिखाई जा रही है.''

इन सांसदों ने लिखा है, ''अरिहा को एक केयर सेंटर से दूसरे सेंटर भेजने से उस पर गहरा और हानिकारक प्रभाव पड़ेगा. अभिभावकों को दो हफ़्ते में एक बार मिलने दिया जाता है और इन मीटिंग के वीडियो बताते हैं कि बच्ची का अपने माता-पिता साथ गहरा जुड़ाव है और दूर रहने का दर्द भी दिखाई देता है.

साथ ही इस चिट्ठी में ये भी कहा गया है, ''हम आपके देश की किसी एजेंसी पर आक्षेप नहीं कर रहे हैं और मानते हैं कि बच्चे के हित में जो था वो आपने किया. हम आपके वैधानिक प्रक्रिया का आदर करते है लेकिन परिवार के किसी सदस्य पर कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है इसलिए अब बच्ची को घर वापस भेजा जाना चाहिए.''

भारत का पक्ष

इससे पहले भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि विदेश मंत्रालय और बर्लिन में भारतीय दूतावास अरिहा शाह की वापसी को लेकर लागातार कोशिशें कर रहे हैं.

अरिंदम बागची ने कहा था, ''वो बच्ची एक भारतीय नागरिक है और 23 सितंबर, 2021 से जर्मनी के यूथ वेलफ़ेयर ऑफ़िस की कस्टडी में है. वो पिछले 20 महीने से फ़ोस्टर में है.''

उनका कहना था, ''हम जर्मनी से बच्ची को लौटने की अपील करते रहे हैं. भारतीय दूतावास लगातार जर्मन प्रशासन से ये अपील करता रहा है कि वे इस बात को सुनिश्चित करे कि अरिहा का उसकी संस्कृति, धर्म और भाषा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए.''

साथ ही बच्ची को काउंसलर का एक्सेस मिले और बच्ची को बर्लिन में भारतीय सांस्कृतिक सेंटर में संस्कृति में क़रीब आने का मौक़ा दिया जाए.

उनका कहना था, ''हम ये दोहराना चाहते हैं कि अरिहा शाह एक भारतीय नागरिक हैं और उसकी नागरिकता और सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि इस बात को निर्धारित करने के लिए अहम हो जाती है कि उसे फ़ोस्टर केयर कहाँ मिलनी चाहिए. हम जर्मन प्रशासन से अपील करते हैं कि वे जल्द अरिहा को भेजे क्योंकि एक भारतीय नागरिक होने के नाते ये उसका अधिकार है, जिससे उसे अलग नहीं किया जा सकता.'''

धरा शाह कहती है कि उनके पति आईटी में काम करते हैं और वीज़ा भी इस महीने ख़त्म हो रहा है.

उनका कहना है, ''भारत सरकार का कहना है कि अरिहा को उनकी चाइल्ड वेलफ़ेयर कमेटी के पास दे देना चाहिए और उनकी निगरानी में बच्ची रहेगी उसके बावजूद जर्मनी का प्रशासन कुछ नहीं कर रहा है.''

उनके अनुसार, 'भारत सरकार ने एक जैन गुजराती परिवार को भी अरिहा को रखने के लिए तय कर दिया है.''

धरा शाह एक ओर इस मामले में जर्मनी की ज़िला कोर्ट के फ़ैसले का इंतजार कर रही हैं जो जून के महीने में आ जाएगा.

उन्हें उम्मीद है कि केंद्र सरकार की कोशिशों का कुछ सकारात्मक नतीजा निकलेगा.

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