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पतंजलि विज्ञापन मामला: रामदेव और बालकृष्ण ने दायर किया 'झूठा हलफनामा', सुप्रीम कोर्ट ने कहा- हम फ़ैसला करेंगे
- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को योग गुरु रामदेव और पतंजलि आयुर्वेद के प्रबंध निदेशक बालकृष्ण की बिना शर्त माफी वाले हलफनामों को ये कहते हुए स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि दोनों ने 'ग़लती पकड़े जाने पर' क्षमा मांगी है.
रामदेव और बालकृष्ण ने ये माफीनामा 'गुमराह करने वाले' विज्ञापनों को जारी करने के मुद्दे पर दायर किया था.
अदालत ने इस मुद्दे पर कोई कदम नहीं उठाने के लिए उत्तराखंड स्टेट लाइसेंसिंग अथॉरिटी को भी सख़्त फटकार लगाई और कहा कि वो इसे हल्के में नहीं लेने जा रहे हैं.
जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने कहा, "हम आपसे इसका हिसाब लेंगे."
सुप्रीम कोर्ट का इतनी सख़्ती से नाराज़गी जताने को विश्लेषक सामान्य घटना नहीं बता रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कारण बताओ नोटिस जारी करने और अदालत के समक्ष हाजिर होने के निर्देश के बाद रामदेव और बालकृष्ण ने हालात से बच निकलने की कोशिश की जहां उनका उपस्थित होना ज़रूरी था. अदालत ने कहा कि ये किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.
अदालत ने कहा कि इस मामले में शामिल सभी लोगों को सज़ा देने पर वो विचार कर रही है. हालांकि इस संबंध में कोई आदेश तो नहीं जारी किया गया लेकिन पतंजलि और उत्तराखंड की राज्य सरकार के ख़िलाफ़ सख़्त टिप्पणियां ज़रूर की गईं.
रामदेव का हलफ़नामा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के हलफनामों को लेकर अदालत का ये मानना है कि वे अपनी पेशी से बचने की कोशिश कर रहे थे.
शीर्ष अदालत से किए गए वादे के बावजूद पतंजलि ने अपने विज्ञापन जारी रखे हुए थे जिसके लिए दोनों ने बिना शर्त माफी मांगते हुए नए हलफनामे दायर किए थे.
इससे पहले के हलफनामे में दोनों ने अदालत से सुनवाई के दौरान निजी उपस्थिति से छूट मांगी थी.
रामदेव और बालकृष्ण ने ये कहते हुए अदालत से रियायत मांगी थी कि सुनवाई के दौरान उनकी यात्रा का कार्यक्रम है.
अदालत ने कहा, "तथ्य तो ये है कि जब हलफ़नामे पर शपथ लिया गया तो ऐसा कोई टिकट अस्तित्व में नहीं था. उन्होंने बाद में हलफनामे के साथ टिकट नत्थी किया."
सुनवाई के दौरान जस्टिस हिमा कोहली ने कहा, "हम इस माफी से संतुष्ट नहीं हैं. शपथ लेकर झूठ बोलने का अपराध हुआ है. हम अब इस पर फ़ैसला करेंगे."
पतंजलि के विज्ञापनों और उसके बाद दायर किए गए माफीनामे पर जस्टिस कोहली ने कहा, "हम माफीनामा कबूल करने से इनकार करते हैं. ये अदालत के आदेश की मर्जी से की गई अवहेलना है."
इस केस में रामदेव और बालकृष्ण का पक्ष रख रहे सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने कहा कि उनके मुवक्किल जनता से भी माफी मांगने के लिए तैयार हैं.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्होंने पतंजलि को बिना शर्त माफी मांगने की सलाह दी थी.
लेकिन अदालत ने इन दलीलों पर गौर नहीं किया. कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई की अगली तारीख़ 16 अप्रैल तय की है.
उत्तरखंड स्टेट लाइसेंसिंग अथॉरिटी
आख़िरी सुनवाई में अदालत ने उत्तराखंड स्टेट लाइसेंसिंग अथॉरिटी से इस मुद्दे पर जवाब दाखिल करने के लिए कहा था कि पतंजलि के भ्रामक विज्ञापनों की जानकारी मिलने पर उसने कंपनी के ख़िलाफ़ क्या कदम उठाए थे.
अदालत ने अपने आदेश में कहा, "हमने हलफनामा (लाइसेंसिंग अथॉरिटी का) देखा है. हम इस बात से हैरत में हैं कि फाइल आगे बढ़ाने के अलावा स्टेट लाइसेंसिंग अथॉरिटी के सक्षम प्राधिकार ने कुछ नहीं किया."
"हलफनामे में जो पत्रकार संलग्न किया गया है, उससे ये दिखता है कि प्रशासन टालमटोल करने और मामले को लटकाने की कोशिश कर रहा था जबकि साल 2018-19 में ही पहली बार उसे इन भ्रामक विज्ञापनों के बारे में सूचित कर दिया गया था."
"इन चार सालों में स्टेट लाइसेंसिंग अथॉरिटी गहरी नींद में सोया हुआ था. स्टेट लाइसेंसिंग अथॉरिटी ने क़ानून के तहत कार्रवाई करने के बजाय केंद्र सरकार को ये बताया कि उसने दिव्य फार्मेसी को चेतावनी जारी की है."
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्टेट लाइसेंसिंग अथॉरिटी के ज्वॉयंट डायरेक्टर से भी सवाल-जवाब किए. अदालत ने उन्हें निलंबन की भी चेतावनी दी. जब उनसे पूछा गया कि पतंजलि के ख़िलाफ़ कोई कदम क्यों नहीं उठाया गया तो ज्वॉयंट डायरेक्टर ने कहा कि उन्हें इस पद पर आए केवल नौ महीने ही हुए हैं.
इसके बाद ज्वॉयंट डायरेक्टर ने कहा कि वो पतंजलि के ख़िलाफ़ कदम उठाएंगे. जस्टिस कोहली ने कहा, "आपके आश्वासन का मूल्य इस काग़ज़ से ज़्यादा नहीं है जिस पर ये लिखा हुआ है."
राज्य सरकार की लाइसेंसिंग अथॉरिटी का कहना है कि उन्हें ये लग रहा था कि बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश ने उन्हें कोई कार्रवाई करने से रोक दिया था.
इस पर बेंच ने कहा, "आप पोस्ट ऑफिस की तरह बर्ताव कर रहे हैं. क्या आपके पास कोई लीगल डिपार्टमेंट है? क्या आपने उनसे क़ानूनी सलाह ली थी?"
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लाइसेंसिंग अथॉरिटी क़ानून के तहत कदम उठाने को लेकर बाध्य थे और बॉम्बे हाई कोर्ट ने उन्हें कोई कदम उठाने से रोका नहीं था.
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा, "हम इस अपराध में आपको सहअपराधी बनाएंगे. ये तो केवल शुरुआत है. हरेक व्यक्ति ने लापरवाही बरती है. ये कोई लैप्स नहीं है, ये असंवेदनशील बर्ताव है."
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)
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