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'जेन ज़ी ने सरकार के प्रति जो डर था, उसे ख़त्म कर दिया': स्टूडेंट प्रोटेस्ट को कैसे देख रहे हैं एक्सपर्ट
- Author, प्रवीण
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
बीते कुछ वर्षों में साउथ एशिया में एक शब्द जिसकी गूंज काफ़ी सुनने को मिली है, तो वह है: जेन ज़ी.
जेन ज़ी वह पीढ़ी है, जिसने श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में सत्ता को बदलकर रख दिया.
पिछले दो महीनों में जेन ज़ी भारत की राजनीति में भी चर्चा का केंद्र बनकर उभरी. नीट-यूजी का पेपर लीक होने के बाद भारत के जेन ज़ी ने एक आंदोलन की शुरुआत की.
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की अगुवाई में जेन ज़ी का आंदोलन शुरू हुआ. चूंकि इस आंदोलन की अगुवाई सीजेपी कर रही थी, इसलिए शुरुआत में विपक्षी दलों ने भी इससे दूरी बनाए रखी.
लेकिन बीते एक हफ़्ते में जेन ज़ी का यह आंदोलन इतना बड़ा हो गया कि तमाम विपक्षी दलों को इसका साथ देना पड़ा. यह इंटरनेशनल मीडिया में भी चर्चा का विषय बन गया.
बीते 12 वर्षों में मोदी सरकार एक बात को अपनी मजबूती की तरह दिखाती थी. उसके कई मंत्री यह कहते हुए नज़र आते थे, 'हमारी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते.'
लेकिन जेन ज़ी ने मोदी सरकार की इस यूएसपी को ब्रेक कर दिया है. जेन ज़ी के आंदोलन की मुख्य मांगों को मोदी सरकार ने स्वीकार किया. कैबिनेट से केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा हो गया.
इस इस्तीफ़े के साथ ही कॉकरोच जनता पार्टी ने अपने आंदोलन को ख़त्म कर दिया. लेकिन जिस कामयाबी के साथ जेन ज़ी का यह आंदोलन ख़त्म हुआ, उसके बाद यह सवाल निकलना लाज़िमी है कि यहां से भारत की राजनीति किस ओर रुख करेगी और उसमें जेन ज़ी की क्या भूमिका होगी.
आंदोलन पर नज़र रखने वाले और उसे कवर करने वाले एक्सपर्ट्स और पत्रकारों के ज़रिए हमने इस सवाल का जवाब जानने की कोशिश की है कि कैसे इस आंदोलन ने भारत की राजनीति में एक लकीर खींच दी है.
एक्सपर्ट्स का मानना है कि जेन ज़ी के इस आंदोलन की छाप आने वाले कई वर्षों तक भारत की राजनीति पर देखने को मिलेगी.
'कोर्स करेक्शन'
पिछले कुछ दिनों में इस बारे में बात हो चुकी है कि कैसे जेन ज़ी ने विरोध का एक नया तरीका दिखाया है. 20 जुलाई के बाद से ही जंतर-मंतर पर जो कुछ देखने को मिला, वह कई मायनों में भारत में पहले हुए आंदोलनों से अलग था.
जेन ज़ी के विरोध प्रदर्शन में बेबाक नारे, पोस्टर, गाने, डांस, धूप या बारिश में डटे रहने का हौसला तो था ही. साथ ही, डिलीवरी ऐप्स का जिस तरह इस्तेमाल देखने को मिला, वह अपने आप में ऐसी जगह पर संसाधन जुटाने का नया तरीका दे गया, जहां टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधाओं का न होना डटे रहने को बेहद मुश्किल बनाता है.
आंदोलन के पहले दिन से इसकी गवाह रहीं स्वतंत्र पत्रकार स्मिता शर्मा कहती हैं, "जो आज हुआ है, यह भारत के लोकतंत्र के लिए बहुत अहम क्षण है, क्योंकि इसमें एक बहुत ज़रूरी कोर्स करेक्शन हुआ है. किस तरीके से शांतिपूर्ण आंदोलन करके धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा लिया गया है."
"जो सरकार अब तक इस बात पर सीना ठोककर कहती थी कि हमारी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते, उन्हें भी समझ में आ गया कि चेक एंड बैलेंस के बगैर तो लोकतंत्र मुमकिन नहीं है. मुझे लगता है कि वही लोकतंत्र आज फिर से क़ायम हुआ है. उसमें लोगों का विश्वास भी क़ायम हुआ है."
भारत के सोशल स्ट्रक्चर से अलग, इस आंदोलन ने शिक्षा के मुद्दे पर जेन ज़ी को एकजुट किया. इस आंदोलन में जिसकी भागीदारी सबसे ज़्यादा थी, वे थे स्कूल-कॉलेज के छात्र और अलग-अलग परीक्षाओं की तैयारी में जुटे लड़के-लड़कियां.
वरिष्ठ पत्रकार और राष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषक विजय त्रिवेदी कहते हैं, "जो हमारे पॉलिटिकल और सोशल बॉक्सेस हैं, जाति और धर्म से अलग होकर यह आंदोलन था और बिना किसी राजनीतिक दल के मोटे तौर पर सहयोग के, यह अपने आप खड़ा हो गया. बिना किसी के कॉल किए, वे लोग अपने आप आकर खड़े हो गए."
"और सब राजनीतिक दलों को जगा भी दिया और दबाव में भी ला दिया. सत्तापक्ष तो, ज़ाहिर है, दबाव में आ ही गया कि मंत्री का इस्तीफ़ा हो गया और विपक्ष को भी दबाव में ला दिया कि सभी लोग एकजुट होकर क़रीब-क़रीब उनके साथ आ गए."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल कहते हैं कि हमें यह नहीं कहना चाहिए कि धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दिया है, बल्कि हमें यह कहना चाहिए कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफ़ा लिया गया है.
उन्होंने कहा, "जेन ज़ी का आंदोलन ऐसा सवाल था, जो सरकार के लिए आउट ऑफ सिलेबस का सवाल बनकर आ गया. उसे हल्के में लिया गया. लेकिन यह सरकार पर उल्टा पड़ गया. मैं इसको ऐसे देखता हूं कि धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा नहीं दिया है. छात्रों ने उनका इस्तीफ़ा लिया है."
राजनीतिक दलों के लिए क्या मैसेज है?
इंस्टाग्राम वह प्लेटफॉर्म है, जिसे जेन ज़ी का सबसे पसंदीदा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कहा जा सकता है. इस आंदोलन का भी सबसे ज़्यादा प्रभाव इसी प्लेटफॉर्म पर देखने को मिला.
बीते एक हफ़्ते में इंस्टाग्राम पर जंतर-मंतर से जुड़ी रील्स की बाढ़ आ गई थी. इंस्टाग्राम चलाने वाले अधिकतर यूज़र्स आंदोलन से जुड़ी रील्स के बारे में ही बातें करने लगे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले गुरुवार और फिर शुक्रवार को इंस्टाग्राम पर रील्स पोस्ट कीं.
इस आंदोलन से राजनीतिक दलों को क्या सबक मिलता है, इस बारे में बात करते हुए स्मिता शर्मा कहती हैं, "बीजेपी एक ऐसी पार्टी रही है, जिसने 2013 से, प्रधानमंत्री मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले से ही, अपनी कैंपेन के नैरेटिव बिल्डिंग के लिए सोशल मीडिया का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल किया."
"लेकिन एक बात स्थापित हो गई कि आप सोशल मीडिया पर दिनभर अगर एकतरफ़ा नैरेटिव देंगे, तो एक वक़्त ऐसा आता है, जब पानी सिर से ऊपर चला जाता है और वही हुआ."
वहीं आदेश रावल कहते हैं, "इस आंदोलन में छात्रों ने मोदी सरकार को इंस्टाग्राम पर हरा दिया. यानी सरकार छात्रों से डरी. हर रोज़ की जो फ़ीड थी, उससे भी वह घबराई. जेन ज़ी ने सरकार को झुकाकर दिखाया."
स्मिता शर्मा मानती हैं कि विपक्ष के लिए भी मैसेज है कि लड़ाई सोशल मीडिया से आगे सड़क पर लड़ी जाती है.
स्मिता शर्मा कहती हैं, "दूसरी बात है, मुझे लगता है कि जो विपक्षी पार्टियां हैं, कांग्रेस, एनएसयूआई, ये लोग छात्रों के तमाम मुद्दों को लेकर सड़कों पर ज़रूर थे. लेकिन एक कंसिस्टेंसी की कमी नज़र आ रही थी. एक यंग जनरेशन के इमेजिनेशन को कैप्चर करने में कमी रह जा रही थी."
अब आगे क्या?
हालांकि, यह सवाल भी है कि अब जेन ज़ी की भारत के राजनीतिक भविष्य में क्या भूमिका होगी?
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "अभी तक, अगर हम पिछले चुनावों का रिकॉर्ड देखें, तो उसमें दो-तीन तरह के वोट बैंक रहे हैं. एक वोट बैंक पिछड़ों और ग़रीबों का था. राजनीतिक दल उन्हें चीज़ें दे रहे थे, लैपटॉप दे रहे थे. फिर दूसरा दौर आया, जिसमें महिलाओं को राजनीतिक दलों ने वोट बैंक बनाया. जिसका फ़ायदा भारतीय जनता पार्टी, अरविंद केजरीवाल जैसी पार्टियों और कुछ अन्य लोगों को भी मिला."
"अब इस आंदोलन ने यह फ़ोकस तय कर दिया है कि अगले चुनावों का वोट बैंक युवा होंगे. राजनीतिक दलों को उन पर ध्यान देना होगा. हो सकता है, आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों की योजनाओं का फ़ोकस युवाओं पर दिखाई दे."
आदेश रावल जेन ज़ी के आंदोलन को भारतीय राजनीति में एक नई शुरुआत की तरह देखते हैं.
उन्होंने कहा, "मोदी सरकार के इस दौर में, जहां इतना डर था, वहीं जेन ज़ी के इन युवाओं ने पिछले पांच दिन में मोदी सरकार का इक़बाल ख़त्म कर दिया. कैसे-कैसे स्लोगन्स, कैसे-कैसे नारे और मीम्स चलाए गए, दिखाए गए और बताए गए. वो भी पुलिस के सामने. तो मुझे लगता है कि यह एक नई शुरुआत है."
क्या इस आंदोलन का कोई पॉलिटिकल आउटकम भी होगा, इस सवाल के जवाब में स्मिता शर्मा कहती हैं, "इस आंदोलन का इलेक्टोरल आउटकम सुनिश्चित नहीं कहा जा सकता. लेकिन उम्मीद बस यही की जा सकती है कि कम से कम जो युवा पॉलिटिकली जागरूक नज़र आए हैं, वे आगे चलकर यह न कहें कि मैं तो पॉलिटिक्स में इंटरेस्टेड नहीं हूं. क्योंकि अगर नीतियों को बदलना होगा, तो राजनीति पर नज़र रखनी होगी."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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