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विक्रम वन: भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च के लिए तैयार, क्या हैं इसकी खूबियां?
- Author, अमरेंद्र यारलगड्डा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
भारत का पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट अंतरिक्ष में उड़ान भरने के लिए तैयार है. स्काईरूट एयरोस्पेस कंपनी ने बताया है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के श्रीहरिकोटा लॉन्च पैड पर 18 जुलाई को सुबह 11:30 बजे इसके लॉन्च के लिए सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं.
इस रॉकेट (लॉन्च व्हीकल) को हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस कंपनी ने बनाया है.
करीब चार साल पहले इसी कंपनी ने विक्रम-एस नामक एक सबऑर्बिटल रॉकेट का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था.
अब विक्रम-1 नामक ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च के लिए तैयार है.
स्काईरूट एयरोस्पेस कंपनी के सह-संस्थापक पवन कुमार चंदना ने बीबीसी को बताया, "पहले हमने 'विक्रम-एस' को 'मिशन सर्वम' नाम दिया था. अब हमने 'विक्रम-1' के लॉन्च को 'मिशन आगमन' नाम दिया है."
विक्रम-1 की विशेष विशेषताएं क्या हैं?
विक्रम-1 लॉन्च व्हीकल को पहली बार स्काईरूट एयरोस्पेस ने नवंबर 2025 में दिखाया था. कंपनी के सह-संस्थापक पवन कुमार चंदना ने बीबीसी को बताया कि यह भारत का पहला कमर्शियल लॉन्च व्हीकल है.
उन्होंने कहा, "हमने इस रॉकेट का नाम भारतीय अंतरिक्ष प्रोग्राम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर विक्रम-1 रखा है."
स्काईरूट एयरोस्पेस कंपनी की बीबीसी को दी गई जानकारी के अनुसार, विक्रम-1 सैटेलाइट को 'लो अर्थ ऑर्बिट' में ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया है.
इसकी पेलोड क्षमता कम है. मतलब यह छोटे साइज के सैटेलाइट को ले जाने में सक्षम है.
फ़िलहाल इसकी पेलोड क्षमता 350 किलोग्राम है
पवन कुमार चंदना ने बीबीसी को बताया, "विक्रम-1 की अंतिम पेलोड क्षमता 500 किलोग्राम होगी लेकिन फ़िलहाल हम 350 किलोग्राम के पेलोड के साथ इसे लॉन्च कर रहे हैं."
उन्होंने बताया कि यह 350 किलोग्राम वजन वाले सैटेलाइट को 'लो अर्थ ऑर्बिट' में और 260 किलोग्राम वजन वाले सैटेलाइट को 'सन सिंक्रोनस ऑर्बिट' में ले जा सकता है.
ऐसा दावा है कि यह सैटेलाइट को पृथ्वी की सतह से 500 किलोमीटर की ऊंचाई तक अंतरिक्ष में ले जा सकता है.
पवन कुमार चंदना ने कहा, "इस रॉकेट का वजन 40 टन है और यह 20 मीटर यानी लगभग सात मंज़िला इमारत की ऊंचाई के बराबर है. इसकी क्षमता 8 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से सैटेलाइट ले जाने की है."
स्काईरूट ने बताया कि इस लॉन्च व्हीकल का डायमीटर 1.7 मीटर है और इसकी इसकी थ्रस्ट क्षमता 1200 किलोन्यूटन है. इसका 3डी-प्रिंटेड लिक्विड इंजन पारंपरिक इंजन से 50 प्रतिशत हल्का है.
कंपनी का कहना है कि इसके सॉलिड फ्यूल बूस्टर कार्बन कंपोजिट स्ट्रक्चर के (कार्बन फाइबर से बने) हैं.
छह तरह के पेलोड
पवन कुमार चंदना ने बीबीसी को बताया कि विक्रम-1 के जरिए छह तरह के पेलोड चांद पर भेजे जा रहे हैं.
उन्होंने कहा, "हम भारत में निर्मित पांच पेलोड और जर्मन कंपनी डीक्यूबीईडी जीएमबीएच का बनाया एक पेलोड निंगबो भेज रहे हैं."
स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना 2018 में इसरो के पूर्व इंजीनियर पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी.
नवंबर 2025 में कंपनी ने हैदराबाद में 2 लाख वर्ग फुट के क्षेत्र में फैले 'इनफिनिटी कैंपस' नामक एक वर्कशॉप बनाया.
स्काईरूट इस साल मई में स्पेस टेक्नोलॉजी सेक्टर में यूनिकॉर्न का दर्जा हासिल करने वाली भारत की पहली निजी कंपनी बन गई.
2022 'टेस्ट रॉकेट' लॉन्च
स्काईरूट एयरोस्पेस कंपनी ने 18 नवंबर, 2022 को विक्रम-एस नामक एक सबऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया. यह भारत में किसी निजी कंपनी का लॉन्च किया गया पहला रॉकेट था.
इसने पृथ्वी की सतह से 301.4 सेकंड की दूरी तय की और 88.8 किलोमीटर की ऊंचाई पर 'लो अर्थ ऑर्बिट' में पहुंच गया.
पवन कुमार चंदना ने बीबीसी को बताया, "विक्रम-एस एक तरह से टेस्ट रॉकेट था. इसकी सफलता के बाद हमने तीन साल में ही विक्रम-1 का निर्माण किया."
विक्रम-एस कुल तीन पेलोड लेकर गया: बीएजेडओओएमक्यू आर्मेनिया, स्पेस किड्ज़ इंडिया और एन-स्पेस टेक इंडिया.
पीएसएलवी और जीएसएलवी में क्या अंतर हैं?
वर्तमान में इसरो तीन प्रकार के लॉन्च व्हीकल या रॉकेट का उपयोग करके सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेज रहा है.
वे हैं:
- पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी)
- जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी)
- जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल मार्क-3 (एलवीएम3)
इसमें पीएसएलवी 1750 किलोग्राम का पेलोड लेकर 600 किलोमीटर की ऊंचाई पर सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट में पहुंच सकता है .
जीएसएलवी एक लॉन्च व्हीकल है जो कुछ सबसे भारी सैटेलाइट को ले जाता है. इसरो आमतौर पर इस लॉन्च व्हीकल का इस्तेमाल आईएनएसएटी सिरीज के कम्युनिकेशन सैटेलाइट को लॉन्च करने के लिए करता है.
इसरो का कहना है कि यह लगभग 2,250 किलोग्राम का पेलोड जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (जीटीओ) में और लगभग 6,000 किलोग्राम का पेलोड लो अर्थ ऑर्बिट में ले जा सकता है.
इसरो भारी सैटेलाइट को ले जाने के लिए एलवीएम3 का उपयोग करता है. यह चार टन वजनी सैटेलाइट को जीटीओ तक ले जा सकता है. इसरो का कहना है कि यह 8,000 किलोग्राम वजनी सैटेलाइट को भी लो अर्थ ऑर्बिट तक ले जा सकता है.
इन तीनों लॉन्च व्हीकल की तुलना में, विक्रम-1 केवल छोटे सैटेलाइट को ले जाएगा जिनकी पेलोड क्षमता काफी कम होगी.
साल 2027 में लॉन्च होगा विक्रम-2
स्काईरूट ने घोषणा की है कि विक्रम-1 के लॉन्च के बाद विक्रम-2 का लॉन्च किया जाएगा. इसे 2027 में लॉन्च किया जाएगा.
स्काईरूट कंपनी ने घोषणा की है कि इसकी पेलोड क्षमता लो अर्थ ऑर्बिट में 900 किलोग्राम और सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में 600 किलोग्राम है.
कंपनी का कहना है कि वह विक्रम-1 की तरह ही इसमें कार्बन कंपोजिट स्ट्रक्चर होगा और एडवांस क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल किया जाएगा.
अंतरिक्ष क्षेत्र में स्टार्टअप्स की शुरुआत
केंद्र सरकार ने 2023 में भारतीय अंतरिक्ष नीति जारी की.
2015 से 2024 के बीच इसरो ने 393 विदेशी और तीन स्वदेशी कमर्शियल सैटेलाइट लॉन्च किए. इससे 439 मिलियन अमेरिकी डॉलर का रेवेन्यू हासिल हुआ.
केंद्र सरकार ने 2024 से भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में 100 प्रतिशत फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (एफडीआई) की अनुमति दी है.
केंद्र सरकार का कहना है कि पिछले एक दशक में अंतरिक्ष क्षेत्र में 300 से अधिक स्टार्टअप शुरू हुए हैं.
इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर के आंकड़ों के अनुसार, 30 सितंबर, 2025 तक केंद्र में 376 स्टार्टअप ने आवेदन किया था.
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने घोषणा की है कि जहां 2022 में केवल एक स्टार्टअप था, वहीं 2024 तक यह संख्या 200 कंपनियों तक पहुंच गई है.
2021 में ग्लोबल स्पेस इंडस्ट्री में भारत की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत (8.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर) थी.
भारतीय सरकार का अनुमान है कि 2033 तक यह आंकड़ा 44 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा, जिसमें निर्यात 11 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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