प्रशांत किशोर की जीत का तेजस्वी यादव और सम्राट चौधरी की राजनीति पर क्या कोई फ़र्क़ पड़ेगा?

इमेज स्रोत, ANI
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, पटना
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 9 मिनट
पटना के अनुग्रह नारायण कॉलेज (एएन कॉलेज) के सामने नालंदा से आए 23 साल के राजीव कुमार बीती 3 अगस्त को भावनाओं के सैलाब में डूबे हुए थे.
वो ख़ुश थे और उम्मीदों से लबरेज़ थे. ख़ुशी की वजह थी पीके यानी प्रशांत किशोर की जीत और उम्मीद उनके किए वादों से.
एक बांकीपुर जीतकर क्या होगा? और आप तो नालंदा के रहने वाले हैं. मेरे इस सवाल पर राजीव कहते हैं, "जो ये कहते हैं कि एक बांकीपुर जीतकर क्या होगा, वो ये भूल जाते हैं कि 1 पीके 242 पर भारी पड़ेगा. वो सदन (विधानसभा) में डेटा सहित अपनी बात रखेंगे."
राजीव के बगल में नौजवान दीपक कुमार खड़े है. हाथ में गुलाब का एक फूल लिए वो पीके का कांउटिंग सेंटर यानी एएन कॉलेज आने का इंतज़ार कर रहे हैं. पीले और हरे गुलाल ने उनकी ऑफ व्हाइट शर्ट को रंगों से भर दिया है.
दीपक प्रशांत कुमार के साथ साल 2022 से हैं. वो उनके साथ एक कार्यकर्ता के तौर पर हैं.
दीपक बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, "बिहार की राजनीति अब नई होगी. लालू और लालू के भय के ख़िलाफ़ होने वाली राजनीति ख़त्म. अब मुद्दों की राजनीति यानी प्रशांत की राजनीति होगी."
बांकीपुर उपचुनाव के कांउटिंग सेंटर के काले बड़े लोहे के गेट के बाहर खड़े लोग जो ज़्यादातर जन सुराज के समर्थक या कार्यकर्ता हैं, वो पीके की जीत को सिर्फ़ बांकीपुर विधानसभा की जीत ही नहीं मान रहे.
यही वजह है कि थोड़े-थोड़े समय के अंतराल में नारे लगते हैं – "राजतिलक की करो तैयारी, आ रहे हैं पीतांबरधारी."
ऐसे में पीके की जीत के मायने क्या हैं? बिहार की राजनीति किस दिशा में जाएगी और क्या राज्य में विपक्ष की रीस्ट्रक्चरिंग होगी? बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के राजनीतिक कद पर भी पीके की जीत का असर पड़ेगा?
नई विपक्षी पॉलिटिक्स का लॉन्चिग पैड बांकीपुर?

इमेज स्रोत, ANI
बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर ने बीजेपी का क़िला ढहा दिया है.
इस चुनाव में अपने नामांकन और कैंपेनिंग की शुरुआत से ही पीके कहते रहे कि ये चुनाव सिर्फ़ एक विधानसभा क्षेत्र का नहीं है बल्कि ये मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कामकाज पर जनमत है.
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा कहते हैं, "ये सही है पीके ने जिस तरह से सम्राट चौधरी को लक्ष्य करके ये पूरा चुनाव लड़ा है, उससे तय है कि बीजेपी को सीएम पर सोचना पड़ेगा कि उन्हें कंटीन्यू किया जाए या नहीं. लेकिन इस जीत का सबसे बड़ा असर विपक्ष पर पड़ेगा."
"बतौर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव उदासीन रहते हैं. ऐसे में राज्य में एंटी-बीजेपी वोटर्स को प्रशांत किशोर के तौर पर नया विकल्प मिलेगा. यानी बांकीपुर बिहार में नई विपक्षी पॉलिटिक्स का लॉन्चिंग पैड बनेगा."
वरिष्ठ पत्रकार और संघ को क़रीब से जानने वाले प्रवीण बागी भी तेजस्वी यादव को 'मौसमी पॉलिटिशियन' बताते हैं.
वो कहते हैं, "तेजस्वी से इतर प्रशांत 24*7 पॉलिटिशियन हैं. ठीक वैसे ही जैसे बीजेपी पॉलिटिक्स करती है. प्रशांत की विधानसभा में एंट्री से अब तक सत्ता पक्ष से जूझ रहे तेजस्वी को विपक्ष की राजनीति के प्रमुख चेहरे के तौर पर अपनी जगह के लिए भी स्ट्रगल करना होगा."
"उनके लिए मुश्किलें और ज़्यादा हैं क्योंकि आरजेडी बिखराव की तरफ़ बढ़ रही है और प्रशांत किशोर बोलने, तथ्यों को रखने, पढ़ाई-लिखाई सहित कई मापदंडों में उनसे कहीं ज़्यादा परिपक्व हैं."
आरजेडी की बेचैनी

इमेज स्रोत, ANI
पीके की इस जीत ने आरजेडी की बेचैनी बढ़ा दी है. आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी और तेजस्वी यादव की बहन रोहिणी आचार्या ने पीके की जीत पर बधाई देते हुए कहा, "जीत उसी की होती है जो जनता के निरंतर संपर्क में रहता है और कार्यकर्ताओं का सम्मान करता है."
सिर्फ़ रोहिणी ही नहीं बल्कि आरजेडी के वरिष्ठ नेताओं में तेजस्वी यादव के रवैये को लेकर बेचैनी है. हाल ही में पार्टी की स्थापना दिवस के कार्यक्रम में आरजेडी के वरिष्ठ नेता उदय नारायण चौधरी ने मंच से कहा था कि तेजस्वी यादव को लालू यादव जैसे ही कार्यकर्ताओं के संपर्क में रहना चाहिए.
बता दें पार्टी की स्थापना 5 जुलाई 1997 को हुई थी. तेजस्वी यादव के यूरोप में छुट्टी मनाने के कार्यक्रम के चलते इस साल स्थापना दिवस 1 जुलाई को ही आयोजित कर लिया गया. 5 जुलाई को तेजस्वी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया था. इसको लेकर पार्टी के भीतर भी तेजस्वी की दबे स्वर में आलोचना हुई थी.
इस जीत के बाद आरजेडी के अंदर क्या चल रहा है?
बीबीसी के इस सवाल पर आरजेडी के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "पार्टी इस तरह से अलग थलग पड़ जाएगी. तेजस्वी जो पॉलिटिकल लाइन ले रहे हैं उसमें मैच्योरिटी का अभाव है."
"आरजेडी का कोर वोटर पीके के साथ गया है, अगर वो नहीं जाता तो सीट बीजेपी जीतती. पीके की जीत से आरजेडी विपक्ष की भूमिका में सदन में तो रहेगी लेकिन पब्लिक परसेप्शन में मुख्य विपक्षी पीके ही होगा. पार्टी एक बार ढलान पर गई तो सभांलने की स्थिति नहीं रहेगी."
क्या नितिन नबीन और सम्राट चौधरी के लिए भी ख़तरे की घंटी है?

इमेज स्रोत, ANI
सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद ये पहला सीधा चुनाव था यानी जिसमें जनता को अपना प्रतिनिधि चुनना था. वहीं बांकीपुर सीट नितिन नबीन की सीट थी जो उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बाद ख़ाली हुई थी.
ऐसे में बांकीपुर जो बीजेपी का गढ़ कहलाता था, उसमें जीत-हार का असर सम्राट चौधरी और नितिन नबीन की भविष्य के राजनीतिक क़द पर पड़ना तय माना जा रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी कहते हैं, "ये सवाल तो बीजेपी और खासतौर पर नितिन नबीन को पूछना होगा कि प्रशांत किशोर के सामने नीरज कुमार सिन्हा जैसा कमज़ोर कैंडीडेट क्यों दिया गया? क्या बीजेपी में इतना अहंकार था कि वो कोई भी उम्मीदवार खड़ा कर देगी और वोटर उसको जिता देंगे."
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक पुष्यमित्र इसे बीजेपी की अंदरूनी गुटबाज़ी और पार्टी के अपने ही कोर वोटर की बग़ावत के तौर पर देखते हैं.
वो कहते हैं, "ज़ाहिर तौर पर बीजेपी का राष्ट्रीय नेतृत्व अब सम्राट चौधरी के बारे में विचार करेगा. क्योंकि इस पूरे इलेक्शन में लोगों से ये सुनने को मिलता रहा कि हमने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री चुना था, सम्राट चौधरी को नहीं. ये चुनाव अपने आप में ख़ास इसलिए भी है क्योंकि इसमें बीजेपी के लॉयल वोटर्स ने ही पार्टी से बग़ावत कर दी है."
उम्मीदवार कोई और होता तो क्या जीतती बीजेपी?

इमेज स्रोत, ANI
साल 2015 में सत्ता से हटने को छोड़कर ऐसा कोई चुनावी मौक़ा नहीं रहा जब बीजेपी दफ़्तर में जश्न का माहौल न हो.
बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों के बाद पटना के वीरचंद पटेल स्थित बीजेपी दफ़्तर में सन्नाटा छाया रहा. ऐसे में ये सवाल बहुत अहम है कि क्या कोई और उम्मीदवार होता तो बीजेपी जीत जाती?
बीजेपी ने नीरज कुमार सिन्हा जैसे बूथ लेवल कार्यकर्ता को प्रशांत किशोर के ख़िलाफ़ चुनावी मैदान में उतारा था. उससे पहले अभिषेक कुमार को पार्टी ने उतारा था लेकिन उनका नामांकन वापस ले लिया गया था.
ये दोनों ही नितिन नबीन की पसंद थे. बांकीपुर से चुनाव लड़ने के लिए अजय आलोक, ऋतुराज सिन्हा समेत कई नाम ख़बरों में थे.
पूरे कैंपेन के दौरान नीरज कुमार सिन्हा एक कमज़ोर उम्मीदवार लगे. वो विधानसभा की नागरिक सुविधाओं के अभाव के सवाल में ये कहते रहे कि ये विधायक का काम नहीं होता.
तो क्या उम्मीदवार बदलने से बीजेपी जीत सकती थी?
इस सवाल पर पत्रकार अरविंद शर्मा कहते हैं, "मेरा मानना है कि मज़बूत कैंडीडेट होता तो भी यही परिणाम होता. ज़्यादा से ज़्यादा जीत का मार्जिन घट जाता. साथ ही पीके अब लोकसभा चुनाव पटना से लड़ने की तैयारी करेंगे. अगर वो लड़ते हैं तो वो चुनाव भी नितिन नबीन के लिए बड़ी चुनौती होगा. ये चुनाव परिणाम सम्राट और नितिन दोनों की राजनीति पर बड़ा असर डालने वाला होगा."
क्या ये चुनाव पूरे देश की राजनीति पर भी असर डालने वाला होगा?
इस पर विश्लेषकों की राय बंटी हुई है. अरविंद शर्मा फ़िलहाल इस चुनाव परिणाम को देश की राजनीति पर असर डालने वाला नहीं मानते.
लेकिन समाजविज्ञानी विद्यार्थी विकास कहते हैं, "प्रशांत किशोर की जीत का तात्कालिक कारण छात्र आंदोलन है. साथ ही बीजेपी के ख़िलाफ़ जो लंबे समय तक एंटी इनकम्बेंसी इस इलाके में रही और महंगाई, रोज़गार जैसे मुद्दों के चलते पीके जीते."
"मेरी कुछ दिन पहले ही बीजेपी के एक नेता से बात हुई थी. उन्होनें कहा था कि बीजेपी ही बीजेपी को हराएगी. जैसा कांग्रेस ने ही कभी कांग्रेस को हराया था. बीजेपी का एक धड़ा है जो ऊपर यानी मोदी-शाह से लेकर नीचे यानी सम्राट-नितिन से नाख़ुश है. और यही धड़े बीजेपी को ढलान पर ले जाएंगे."
पत्रकार पुष्यमित्र भी कहते हैं, "ये परिणाम राजनीति के कई आयामों को प्रभावित करेगा. राज्य और देश दोनों ही स्तर पर बीजेपी के लिए ये सबक है."
प्रशांत किशोर की आगे की राह

इमेज स्रोत, ANI
जन सुराज ने चुनावी राजनीति में अपना खाता खोल दिया है. साल 2025 के विधानसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट जीत नहीं पाई थी और पार्टी को महज़ 3.4 फ़ीसदी वोट राज्य भर में मिले थे.
विधानसभा में जन सुराज का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रशांत किशोर क्या कर पाएंगे?
वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह कहते हैं, "विधानसभा के अंदर तो उन्हें एक मिनट का वक़्त बोलने के लिए मिलेगा. लेकिन विधानसभा के बाहर वो मीडिया से रूबरू होंगे और नैरेटिव सेट करेंगे. वो मीडिया के हीरो थे और रहेंगे."
"पटना की शहरी सीट जिन पर बीजेपी का लंबे समय तक दबदबा रहा है वो भी ख़तरे में आएगी और पटना नगर निगम भी जिसमें लंबे समय से बीजेपी का मेयर रहा है. सब पर असर पड़ेगा."
वहीं लेखक पुष्यमित्र कहते हैं, "प्रशांत किशोर अब तक रणनीतिकार थे लेकिन इस चुनाव में उन्होंने चुनाव लड़ना सीख लिया है. वो गांधी को मानते हैं लेकिन उनकी कोई वैचारिक ज़मीन नहीं है."
"प्रशांत मुद्दों की बात कर रहे हैं और जब वो विधानसभा में अपनी बात रखेंगे तो जनसुराज को बतौर पार्टी ठीक वैसे ही फ़ायदा हो सकता है जैसा मोदी के नाम पर बीजेपी को हाल के सालों में हुआ है."
लेकिन क्या जनसुराज पार्टी के तौर पर कभी सत्ता में भी आ सकता है?
पत्रकार अरविंद शर्मा कहते हैं, "प्रशांत किशोर को समझौता करना होगा. उन्हें एक वृहद गठबंधन बनाना होगा जिसमें कांग्रेस, लेफ्ट और कई जातीय क्षत्रप शामिल हो सकते हैं. प्रशांत किशोर को समझना होगा कि बिहार में जाति की राजनीति होती है और इसको ख़ारिज करके वो आगे नहीं बढ़ सकते."
प्रशांत किशोर अक्खड़ स्वभाव के हैं जो उनके एक सफल नेता बनने में सबसे बड़ी बाधा मानी जाती है.
क्या प्रशांत इससे उभर पाएंगे? इस सवाल पर प्रशांत के एक करीबी कहते हैं, "उनका स्वभाव पहले से थोड़ा नरम हुआ है. अब जब वो विधानसभा जाएंगे तो शायद ज़्यादा अच्छे नेता जिसका एक गुण विनम्रता भी मानी जाती है, वैसे बन जाएंगे. हम लोग ख़ुद भी एक मज़बूत जन सुराज के लिए टकटकी लगाए इंतज़ार कर रहे हैं."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.



























