राम माधव की वापसी का पीएम मोदी और अमित शाह के लिए क्या मतलब है?

अमित शाह

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इमेज कैप्शन, राम माधव अमित शाह के अध्यक्ष रहते ही बीजेपी के महासचिव बने थे
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

नितिन नबीन इसी साल जनवरी महीने में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बने थे. अध्यक्ष बनने के क़रीब सात महीने बाद उन्होंने अपनी नई टीम की घोषणा की है.

बीजेपी ने 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्षों की घोषणा की है, जिनमें छह महिलाएं हैं. पूर्व राष्ट्रीय महासचिव राम माधव की वापसी इस बार राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के तौर पर हुई है. राम माधव 2014 में बीजेपी में राष्ट्रीय महासचिव बनकर आए थे लेकिन 2020 में उन्हें इस पद से हटा दिया गया था.

नितिन नबीन की टीम की घोषणा कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद हुई है. कहा जा रहा है कि अगर इस टीम की घोषणा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के ठीक बाद होती तो तस्वीर कुछ और होती.

राम माधव और स्मृति इरानी को पार्टी में हाशिए पर माना जा रहा था लेकिन उनकी वापसी को कैसे देखा जाना चाहिए?

वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, ''राम माधव को राष्ट्रीय महासचिव से हटाया गया था और स्मृति इरानी भी चुनाव हारने के बाद हाशिए पर थीं. इन दोनों की वापसी हुई है. अमित मालवीय को भी अमित शाह के क़रीबी के रूप में ही देखा जाता है और उन्हें सोशल मीडिया की ज़िम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया है. अगर इन तीन बदलाव के आधार पर देखें तो यही लगता है कि यह टीम पूरी तरह से अमित शाह की नहीं है.''

लेकिन एक तथ्य यह भी है कि जब अमित शाह जुलाई 2014 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तब राम माधव को महासचिव बनाकर पार्टी में लाया गया था और जेपी नड्डा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते सितंबर 2020 में उन्हें महासचिव से हटाया गया था.

हालांकि, नीरजा चौधरी मानती हैं कि जेपी नड्डा इतने शक्तिशाली बीजेपी प्रमुख नहीं थे कि अमित शाह के प्रभाव से मुक्त थे.

पीयूष गोयल को बीजेपी का राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया गया है. बहुत संभव है कि मोदी कैबिनेट के अगले फ़ेरबदल में पीयूष गोयल सरकार से विदा हो जाएं क्योंकि बीजेपी में एक व्यक्ति एक पद के नियम के पालन की बात कही जाती है. ऐसे में पीयूष गोयल के लिए कोई अपवाद शायद ही हो.

अमित शाह ने भी 2019 में गृह मंत्री बनने के कुछ महीने बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

राम माधव

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इमेज कैप्शन, जेपी नड्डा ने जब 2020 में बीजेपी की कमान संभाली थी तभी राम माधव को राष्ट्रीय महसचिव के पद से हटाया गया था

बीजेपी की नई टीम किसकी है?

नीरजा चौधरी कहती हैं, ''मैं दो तथ्यों के आधार पर कह सकती हूँ इस टीम में अमित शाह की छाप थोड़ी कम दिख रही है. पीयूष गोयल अमित शाह के क़रीबी हैं. अगर वो वित्त मंत्री बनते तो हम ये कहते कि अमित शाह की चली है. पीयूष गोयल को कोषाध्यक्ष बनाकर सीमित कर दिया गया है.''

सुनील बंसल राष्ट्रीय महासचिव के पद पर बरक़रार हैं. साल 2013 में अमित शाह जब उत्तर प्रदेश के प्रभारी बने थे तो सुनील बंसल ने उनके साथ बहुत क़रीब से काम किया था. इन दोनों की जोड़ी ने यूपी से नतीजे भी डिलिवर किए.

सुनील बंसल के प्रभारी रहते हुए बीजेपी को पश्चिम बंगाल में जीत मिली. ऐसे में कहा जा रहा था कि बंसल संगठन महासचिव बीएल संतोष की जगह ले सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बीजेपी में संगठन महासचिव को अध्यक्ष के बाद सबसे शक्तिशाली पद माना जाता है.

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं कि बीजेपी में कहने के लिए तो राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद अध्यक्ष के ठीक बाद वाला है लेकिन मुझे लगता है कि व्यवहार में यह पद बिना ताक़त वाला है.

नीलांजन मुखोपाध्याय राम माधव की वापसी को किसी बड़े संकेत या संदेश के रूप में नहीं देखते हैं.

वह कहते हैं, ''व्यवहार में उपाध्यक्ष से ज़्यादा शक्तिशाली पद महासचिव का है. इस बार राम माधव उपाध्यक्ष बनकर आए हैं. पद देखकर लग सकता है कि उनका प्रमोशन हुआ है लेकिन उन्हें क्या ज़िम्मेदारी मिलती है, ये ज़्यादा अहम बात है. मेरा मानना है कि बीजेपी में अब भी वह स्थिति है, जहाँ नरेंद्र मोदी और अमित शाह ही आख़िरी फ़ैसले लेते हैं. अभी मुझे कुछ भी बदलाव होता नहीं दिख रहा है.''

आरएसएस से बीजेपी में आकर जो हैसियत बीएल संतोष और रामलाल ने हासिल की वो राम माधव अब तक हासिल नहीं कर पाए हैं. बीएल संतोष से पहले संगठन महासचिव की ज़िम्मेदारी रामलाल के पास थी.

रामलाल ने 2019 में आरएसएस में लौटने से पहले बीजेपी में 10 साल तक राष्ट्रीय संगठन महासचिव के तौर पर काम किया था. बीएल संतोष आरएसएस के प्रचारक रहे हैं.

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इमेज कैप्शन, स्मृति इरानी चुनाव हारने के बाद हाशिए पर थीं लेकिन नितिन नबीन की टीम में उनकी भी वापसी हुई है

राम माधव और बीजेपी

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बीजेपी में संगठन महासचिव का पद हमेशा से बहुत शक्तिशाली रहा है. जनसंघ से लेकर बीजेपी तक में कई प्रभावशाली हस्तियां राष्ट्रीय संगठन महासचिव के पद पर रह चुकी हैं.

इनमें जनसंघ के दीनदयाल उपाध्याय और सुंदर सिंह भंडारी से लेकर बीजेपी के नरेंद्र मोदी, के.एन. गोविंदाचार्य, संजय जोशी और रामलाल तक शामिल हैं और अभी बीएल संतोष. इस पद पर रहने वाले सभी नेताओं का अपने पद की वजह से पार्टी में काफ़ी प्रभाव रहा है.

राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर संगठन महासचिव आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक होते हैं.

नीरजा चौधरी कहती हैं कि वे औपचारिक तौर पर बीजेपी अध्यक्ष को रिपोर्ट करते हैं, लेकिन व्यवहार में उनकी रिपोर्टिंग सरसंघचालक तक होती है. नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं, ''अगर राम माधव संगठन महासचिव बनते तो कहा जा सकता था कि उनकी हैसियत बढ़ी है. अगर सुनील बंसल संगठन महासचिव बनते तो ये कहा जाता कि अमित शाह की छाप ज़्यादा दिख रही है.''

एक समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं में साथ रहने वाले राम माधव का धीरे-धीरे बीजेपी में अपना प्रभाव कम नज़र आता है.

2014 में न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वेयर, लंदन के वेम्बली और सिडनी में पीएम मोदी के कार्यक्रमों को आयोजित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.

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उस समय माधव का राजनीतिक कद तेज़ी से बढ़ता दिख रहा था. बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर उन्हें पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर में गठबंधन तैयार करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. लेकिन 2018 तक वह धीरे-धीरे राजनीतिक परिदृश्य से दूर होने लगे. सितंबर 2020 में बीजेपी ने उन्हें उमा भारती और पी. मुरलीधर राव समेत कई अन्य नेताओं के साथ राष्ट्रीय महासचिव के पद से हटा दिया. इसे उनके बीजेपी में कमज़ोर होते प्रभाव के रूप में देखा गया था.

आरएसएस का मुखपत्र माने जाने वाली पत्रिका ऑर्गेनाइज़र के संपादक हितेश शंकर ऐसा नहीं मानते हैं.

हितेश ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, ''आरएसएस से बीजेपी में आना जाना लगा रहता है. राम माधव को जो काम मिला था, उसे पूरा कर वह 2020 में वापस आ गए थे. आरएसएस में आने के बाद भी वह थिंक टैंक के ज़रिए पार्टी और संगठन के लिए ही काम करते रहे.''

प्रधानमंत्री के शुरुआती विदेश दौरे में राम माधव की भागीदारी को विदेशों में बसे भारतवंशियों को बीजेपी से जोड़ने के रूप में देखा जाता था लेकिन अचानक से वह पीएम के दौरों से बाहर क्यों हो गए थे?

इस सवाल के जवाब में हितेश शंकर कहते हैं, ''अहम बात यह नहीं है कि आप यात्राओं में शामिल हैं या नहीं. अहम बात यह है कि आप वो काम कर रहे हैं या नहीं. राम माधव अब भी भारतवंशियों को जोड़ने का काम कर रहे हैं. यहाँ पद से ज़्यादा अहम काम है.''

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इमेज कैप्शन, राम माधव ने पूर्वोत्तर भारत में प्रभारी रहते हुए पार्टी को कई अहम जीत दिलाई थी

राम माधव जिसके लिए जाने गए

2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मणिपुर में एक भी सीट नहीं मिली थी. तब मणिपुर में बीजेपी का वोट प्रतिशत भी 2.1 फ़ीसदी था जो 2017 के चुनाव में 36.3 फ़ीसदी पहुँच गया था.

पूर्वोत्तर में बीजेपी की पहुँच बनाने में राम माधव का नाम काफ़ी सुर्खियों में रहा था. आरएसएस में बाल स्वयंसेवक से शुरुआत करने वाले राम माधव की शख़्सियत बीजेपी में उफान पर चढ़ने से पहले ही 2020 में नीचे उतर आई थी.

मूलतः आंध्र प्रदेश के रहने वाले 61 साल के राम माधव 2014 में संघ से बीजेपी की सक्रिय राजनीति में बड़ी ख़ामोशी से आए थे. 2003 में आरएसएस ने उन्हें अपना प्रवक्ता बनाया था.

नीरजा चौधरी मानती हैं कि राम माधव कई बार मीडिया में जाकर अपनी सोच के हिसाब से बयान दे देते थे और यही बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को पसंद नहीं आता था. नीरजा कहती हैं कि 2020 में महासचिव से उनका पत्ता साफ़ होने में इसकी भी बड़ी भूमिका थी.

इसी साल अप्रैल में राम माधव ने वॉशिंगटन स्थित हडसन इंस्टीट्यूट में कहा था, "हम ईरान और रूस से तेल ख़रीदना बंद करने पर सहमत हुए, जबकि इसके लिए हमें विपक्ष की ओर से काफ़ी आलोचना का सामना करना पड़ा. हम 50 फ़ीसदी टैरिफ पर भी सहमत हुए. नए व्यापार समझौते में भी हम 18 फ़ीसदी टैरिफ पर सहमत हुए. ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि भारत अमेरिका के साथ काम करने के लिए बहुत कुछ नहीं कर रहा है."

राम माधव की इस टिप्पणी को भारत में मोदी सरकार की कमज़ोरी के रूप में देखा गया.

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने राम माधव की इस टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, ''राष्ट्रीय सरेंडर संघ. नागपुर में फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद और अमेरिका में विशुद्ध चापलूसी. राम माधव ने आरएसएस के स्वभाव की असली तस्वीर सामने रख दी है.''

इसके बाद राम माधव ने अपनी टिप्पणी पर माफ़ी मांगी थी.

उन्होंने एक्स पर कहा था, ''मैंने जो कहा, वह ग़लत था. भारत कभी भी रूस से तेल आयात बंद करने पर सहमत नहीं हुआ था. इसके अलावा, 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाए जाने का भारत ने पुरज़ोर विरोध किया था. मैं दूसरे पैनलिस्ट की बात का सीमित तौर पर जवाब देने की कोशिश कर रहा था, लेकिन तथ्यात्मक रूप से मेरी बात ग़लत थी. इसके लिए मैं माफ़ी मांगता हूँ.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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