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मानवाधिकार पर दूसरे देशों ने भारत को क्या दी सलाह, भारत का जवाब और इसके मायने
- Author, शुभम किशोर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
ह्यूमन राइट्स काउंसिल सेशन में भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड का रिव्यू किया गया. कई देशों ने भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड को बेहतर करने को लेकर सुझाव दिए जिसका भारत ने जवाब दिया.
भारत की तरफ़ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भारत के प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया. भारत के 'यूनिवर्सल पीरिऑडिक रिव्यू' के चौथे साइकिल में ग्रीस, नीदरलैंड और वैटिकन सिटी ने गुरुवार को भारत सरकार से धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और मानवाधिकार संगठनों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के ख़िलाफ़ भेदभाव पर रोक लगाने की मांग की.
हालांकि भारत ने कहा कि संविधान के तहत सभी समुदायों को बराबर अधिकार मिले हैं, किसी के साथ भेदभाव नहीं हो रहा है और जिन संगठनों पर कार्रवाई की गई है, वो संविधान के मुताबिक क़ानून का पालन नहीं करने के कारण की गई है.
इससे अलावा कई देशों ने भारत को लेकर कड़ी टिप्पणियां की थीं.
लग्ज़मबर्ग ने कहा, “भारत को सभी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को तुरंत रिहा करना चाहिए.”
ग्रीस ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत को “धार्मिक स्वतंत्रता को पूरी तरह सुनिश्चित करनी चाहिए.”
उनका कहना था कि, "हम अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर चिंतित है, ख़ासतौर पर धार्मिक अल्पसंख्यक, महिलाएं और लड़कियों को लेकर.”
उन्होंने ये भी कहा कि फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्यूलेशन एक्ट का इस्तेमाल “एसोसिएशन की स्वतंत्रता” को “रोकने” के लिए नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारत में मानवाधिकार संगठनों को मज़बूत बनाना होगा और दलितों के ख़िलाफ़ भेदभाव को भी ख़त्म करना होगा.
किस देश ने क्या कहा?
आयरलैंड और दक्षिण कोरिया ने भी एफ़सीआरए का मुद्दा उठाया. इटली ने कहा कि भारत को “अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा रोकने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए.”
लिथुआनिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की मांग की. बेल्जियम ने पहले ही सवाल भेजकर सिविल लिबर्टी की वकालत करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की बात कही थी
वहीं भारत के वसुधैव कुटुंबकम की भावना को लेकर मॉरिशस ने उसकी तारीफ़ की.
मालदीव ने भारत को कोविड -19 के दौरान मदद के लिए शुक्रिया कहा, साथ की जाति आधारित हिंसा को ख़त्म करने की बात कही.
मेक्सिको ने नेशनल रजिस्टर फ़ॉर सिटिज़नशिप का मुद्दा उठाया और इसे लेकर ज़रूरी कदम उठाने के लिए कहा ताकि किसी के स्टेटलेस होने की संभावना कम हो सके.
नेपाल ने महिलाओं के प्रति हिंसा को कम करने, बाल विवाह रोकने और ट्रांसजेंडर लोगों के लिए माकूल माहौल बनाने की ज़रूरत पर ध्यान दिलाया.
अमेरिका ने भारत से एफसीआरए से संबंधित लाइसेंस संबंधी निर्णयों की पारदर्शिता में सुधार करने और मानवाधिकारों के हनन के लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ अभियोग सुनिश्चित करने का आह्वान किया.
इसराइल ने भी महिलाओं से जुड़ी हिंसा पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने की बात कही.
रूस ने कहा कि भारत को ग़रीबी हटाने के लिए लाई गई पॉलिसी को जारी रखने की सलाह दी. साथ ही रूस ने रूस ने “ज़िम्मेदार कॉरपोरेट बिहेवियर” पर ज़ोर दिया.
भारत ने क्या कहा?
भारत की ओर से प्रतिनिधित्व कर रहे तुषार मेहता ने कहा कि भारत ने मानवाधिकार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने लीगर फ़्रेमवर्क में बदलाव किए हैं, साथ ही पुराने औपनिवेशक क़ानूनों को ख़त्म किया है.
उन्होंने कहा कि कोविड-19 के पैदा हुई स्थितियों के निबटने के लए भारत ने 80 करोड़ लोगों की मुफ़्त वैक्सीन दी, 44.5 करोड़ लोगों की आर्थिक मदद की और 27 करोड़ वैक्सीन दूसरे देशों को भेजी.
उन्होंने कहा कि भारत ने तीन तलाक़ क़ानून को हटाया है साथ ही रेप, और शारीरिक शोषण और ट्रैफ़िकिंग का दायरा बड़ा किया और कड़े और कड़ी सज़ा का प्रावधान किया.
इसके अलावा उन्होंने कहा कि भारत में महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों के लिए क़ानून में बदलाव किए जा रहे हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि भारत शिक्षा, हेल्थ समेत कई मुद्दों पर बेहतरी के लिए लगातार कदम उठा रहा है.
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर उठे इस सवाल पर भारत ने कहा कि 'संविधान सभी नागरिकों को इसे लेकर समान अधिकार देता है. लेकिन ये पूर्ण स्वतंत्रता नहीं है और संप्रभुता, एकता और देश की सुरक्षा के मद्देनज़र इन्हें कुछ बंदिशे हैं.'
तुषार मेहता ने ये भी कहा कि ये बंदिश हेट स्पीच को रोकने में मदद करती हैं. उन्होंने कहा कि बंदिशों का पैमाना बहुत ऊंचा है.
कई संगठनों के ख़िलाफ़ उठाए गए कदम पर मेहता ने भारत का पक्ष रखते हुए कहा, “कुछ संगठनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई क्योंकि उन्होंने ग़ैर कानूनी तरीकों का इस्तेमाल कर पैसे को ग़लत रास्ते से भेजा और जानबूझ कर विदेशी मुद्रा एक्सचेंज मैनेजमेंट और टैक्स से जुड़े नियमों का बार-बार उल्लंघन किया है.”
हालांकि कुछ मुस्लिम संगठनों ने इन बयानों को ग़लत बताया है. इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल ने लिखा, “हम भारत के सॉलिटर जनरल के भाषण का की निंदा करते हैं."उन्होंने भाषण को “झूठ से भरा हुआ” बताया.
उन्होंने कहा कि मेहता के बचाव करने वाले भाषण से ये साफ़ है कि “नरेंद्र मोदी की सरकार सदस्य देशों के सुझाव को नज़र अंदाज़ करेगी और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करती रहेगी."
सीएएए पर भारत ने क्या कहा
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक कुछ देशों ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के बारे में भी चिंता व्यक्त की, जो बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के छह ग़ैर-मुस्लिम धार्मिक समुदायों के शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करता है.
मेहता ने कहा कि ये क़ानूनी तौर पर अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए भारत की प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है और "ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान ज़मीनी वास्तविकताओं" को ध्यान में रखता है.
मेहता ने कहा कि ये स्टेटलेस लोगों को कम करने में मदद करेगा. साथ ही उन्होंने ज़ोर दिया कि ये भारत के किसी भी नागरिक की नागरिकता छीनता नहीं है, न ही उसमें किसी तरह का बदलाव लाता है.
जम्मू-कश्मीर भारत की पाकिस्तान को खरी-खरी
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक भारत ने कहा कि पूरा केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर और लद्दाख हमेशा उसका अभिन्न और अविभाजित हिस्सा था और रहेगा. साथ ही भारत ने कहा कि 2019 में संवैधानिक बदलाव के बाद क्षेत्र के लोग अब देश के अन्य हिस्सों की तरह अपनी पूरी क्षमता का एहसास करने में सक्षम हैं.
तुषार मेहता ने यूएनएचआरसी में कहा, "समूचा केंद्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर और लद्दाख हमेशा भारत का अभिन्न और अविभाजित हिस्सा था और रहेगा."
तुषार मेहता की प्रतिक्रिया पाकिस्तान के प्रतिनिधि द्वारा समीक्षा प्रक्रिया में अपनी टिप्पणी के दौरान जम्मू कश्मीर का मुद्दा उठाए जाने के बाद आई है.
क्या है इसके मायने
जाने माने स्तंभकार और एमनेस्टी इंटरनेशनल के पूर्व कार्यकारी निदेशक आकार पटेल कहते हैं, “अगर आप ये मानकर चल रहे हैं कि इन बातों का कोई असर नहीं होगा, तो ये ग़लत है, लेकिन ये भी नहीं मान लेना चाहिए कि सरकार तुरंत कड़े कदम उठाएगी तो ये भी सही नहीं है.”
उनका कहना है कि मित्र देशों के सुझावों का असर होता है. वो कहते हैं, “अगर दुश्मन देश सुझाव दें, तो शायद फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन जब मित्र देश कहते हैं, तो दबाव ज़रूर पड़ता है.”
उन्होंने कहा अगर हम दूसरे देशों की अच्छाई अपनाना चाहते हैं, या फिर कुछ क्षेत्रों में उनकी तरह काम करना चाहते हैं, तो हमें उनसे सीखना होगा और उनकी बात माननी पड़ेगी.
हालांकि सामाजिक कार्यकर्ता जॉन दयाल कहते हैं कि इन आलोचनाओं का भारत पर बहुत ज़्यादा असर नहीं होता. वो कहते हैं, इन मुद्दों को सिरे से ख़ारिज कर देना भारत की आदत है.
"अगर आप प्रताड़ना की ही बात करें तो हमारा लॉ एंड ऑर्डर सिस्टम प्रताड़ना पर आधारित है, फोरेंसिक पर नहीं."
उन्होंने कहा, "कल रात देशों ने खुलकर इन मुद्दों पर बात की लेकिन ये भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत बहुत बड़ा ख़रीदार है चाहे वो हथियारों का हो, सबमरीन हो या तेल हो. इसलिए दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था को इससे बहुत मदद मिलती है. साथ ही भारत टेक्निकल लेबर को एक्सपोर्ट करता है जैसे की कंप्यूटर इंजीनियर, आईटी से जुड़े लोग. अगर आप मैनवापर एक्सपोर्ट करते हैं, और हथियार और तेल आयात करते हैं तो आपकी जल्दी कोई आलोचना नहीं करता."