You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
पाकिस्तान ने 'मोस्ट वॉन्टेड' मसूद अज़हर पर क्यों बढ़ाई इनामी रकम
पाकिस्तान की फ़ेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (एफ़आईए) ने अपनी वेबसाइट पर 2026 की "रेड बुक- मोस्ट वॉन्डेट हाई प्रोफ़ाइल टेररिस्ट' लिस्ट जारी की है.
इसमें जैश-ए-मोहम्मद प्रमुख मसूद अज़हर का नाम भी है और उसकी गिरफ़्तारी के लिए सूचना देने पर 70 लाख पाकिस्तानी रुपये देने का इनाम भी रखा गया है.
द ट्रिब्यून के मुताबिक़ पहले ये इनामी राशि 50 लाख पाकिस्तानी रुपए थी.
जैश-ए-मोहम्मद का संस्थापक और प्रमुख मसूद अज़हर भारत में कई चरमपंथी हमलों को लेकर वॉन्टेड है, जिसमें साल 2001 में संसद पर हुआ हमला भी शामिल है.
रेड बुक पाकिस्तान की एफ़आईए की ऐसी सूची है, जिसमें देश के मोस्ट वॉन्टेड और हाई-प्रोफ़ाइल आतंकवादियों के बारे में जानकारी दर्ज की जाती है.
इसमें उन लोगों की तस्वीर, पहचान, संगठन से जुड़ाव, मामलों की जानकारी और उनकी गिरफ्तारी में मदद करने वाली जानकारी जैसी चीज़ें दी जाती हैं.
यह क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए एक वॉन्टेड-टेररिस्ट डेटाबेस/रिकॉर्ड की तरह काम करती है. एफ़आईए का काउंटर टेररिज़्म विंग इसे तैयार करता है.
मसूद अज़हर के मामले में इसका क्या मतलब है?
कई विशेषज्ञ मसूद अज़हर का नाम इस लिस्ट में आने को एफ़एटीएफ़ (फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स) रिव्यू से जोड़कर देख रहे हैं. हालांकि पाकिस्तान सरकार ने मसूद अज़हर को इस लिस्ट में शामिल करने के कारणों को लेकर कोई बयान अब तक नहीं दिया है.
मसूद अज़हर साल 2021 में भी इस लिस्ट में शामिल था. पाकिस्तान लगातार दावा करता रहा है कि मसूद अज़हर पाकिस्तान में है ही नहीं.
साल 2025 में बीबीसी को दिए इंटरव्यू में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने दावा किया था कि मसूद अज़हर पाकिस्तान में नहीं है.
मई 2025 में ही भारत के पाकिस्तान पर हमले के बाद चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने कहा था कि इस हमले में संगठन के मुखिया मसूद अज़हर के परिवार के दस सदस्य और चार करीबी सहयोगी मारे गए.
इस बारे में जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) की ओर से एक बयान जारी हुआ था. बीबीसी न्यूज़ उर्दू के मुताबिक मृतकों में मसूद अज़हर की बड़ी बहन और बहनोई, भांजे की पत्नी और भांजी के अलावा पांच बच्चे शामिल थे.
इस बयान के मुताबिक पाकिस्तान के बहावलपुर में सुभान अल्लाह मस्जिद पर हमले में मसूद अज़हर के रिश्तेदारों की मौत हुई थी.
साल 2019 में पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि उनकी जानकारी के अनुसार जैश-ए-मोहम्मद के सबसे बड़े नेता मसूद अज़हर पाकिस्तान में ही हैं.
जब उनसे पूछा गया कि क्या मसूद पाकिस्तान में हैं, तो उन्होंने जवाब दिया, "हाँ, वो पाकिस्तान में ही हैं."
इंटरव्यू कर रहीं नामी पत्रकार क्रिस्टियाना अमनपोर ने पूछा कि पाकिस्तान उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं करता?
इस पर पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने कहा, "वे पाकिस्तान में ही हैं, वे बीमार हैं, वे इतने बीमार हैं कि अपने घर से बाहर भी नहीं निकल सकते. वे बहुत बीमार हैं."
पाकिस्तान ने ऐसा क्यों किया?
ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) और डिफ़ेंस एक्सपर्ट हेमंत महाजन ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा, "पाकिस्तान ने मसूद अज़हर को मोस्ट वॉन्टेड आतंकवादी बताया है और उस पर घोषित इनाम को बढ़ाकर 70 लाख रुपये कर दिया है. इसका विश्लेषण कैसे किया जाना चाहिए? मेरे ख़याल से इसका जवाब काफ़ी सीधा है. बड़े पैमाने पर यह एफ़एटीएफ़ (फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स) की जांच से बचने के लिए पाकिस्तान की ओर से एक दिखावा है. एफ़एटीएफ़ की अक्तूबर में बैठक होने वाली है. इसमें पाकिस्तान से सवाल किया जाएगा कि उसने अपनी ज़मीन से होने वाले आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए क्या कदम उठाए हैं. ख़ास तौर पर यह पूछा जाएगा कि क्या उसने आतंकवाद को मिलने वाली आर्थिक मदद और दूसरे तरह के समर्थन को रोक दिया है."
"इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय, संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका की नज़र में ख़ुद को 'अच्छा' दिखाने के लिए पाकिस्तान ने यह बयान जारी किया है. इसमें दावा किया गया है कि वह जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर पर नज़र रख रहा है. लेकिन जब तक ज़मीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक पाकिस्तान के दावों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. मसलन, सभी आतंकवादी शिविर बंद किए जाएं, आतंकवादियों को मिलने वाली आर्थिक मदद रोकी जाए और जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर को वास्तव में गिरफ़्तार किया जाए."
वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता लिखते हैं, "हर एफ़एटीएफ़ रिव्यू से पहले पाकिस्तान का वही पुराना तमाशा. जैश चीफ़ मसूद अज़हर को मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में डालना और उस पर इनामी राशि को बढ़ाना."
साउथ एशिया प्रेस के पत्रकार ताहा सिद्दीक़ी लिखते हैं, "पाकिस्तान ने मसूद अज़हर पर 70 लाख रुपये का इनाम और उसे मोस्ट-वॉन्टेड सूची में डालने का एलान ऐसे समय किया है, जब एफ़एटीएफ़ की बैठक होने वाली है. यह आतंकवाद के ख़िलाफ़ वास्तविक कार्रवाई से ज़्यादा अंतरराष्ट्रीय दबाव, ख़ासकर एफ़एटीएफ़ की जांच, से बचने के लिए दिखावटी क़दम है."
एफ़एटीएफ़ क्या है?
एफ़एटीएफ़ यानी फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्ट फ़ोर्स एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है, जो देशों को मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद की फंडिंग और परमाणु हथियारों के प्रसार की फंडिंग को रोकने के लिए मानक तय करती है. एफ़एटीएफ़ खुद पुलिस या जांच एजेंसी नहीं है. यह देशों की व्यवस्था और उसके अमल का आकलन करती है.
एफ़एटीएफ़ की कौन-कौन सी लिस्ट होती हैं?
आम तौर पर दो सूचियां सबसे ज्यादा चर्चा में रहती हैं:
इसमें उन देशों को रखा जाता है जिनकी व्यवस्था में मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद की फंडिंग या परमाणु प्रसार से जुड़ी फंडिंग से निपटने में रणनीतिक कमियां पाई गई हैं, लेकिन वे उन कमियों को दूर करने के लिए एफ़एटीएफ़ के साथ काम करने की प्रतिबद्धता जताते हैं. एफ़एटीएफ़ इन देशों की प्रगति पर नज़र रखता है.
ग्रे लिस्ट में आने का मतलब यह नहीं है कि देश पर तुरंत एफ़एटीएफ़ ने आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं. लेकिन इससे देश की वित्तीय व्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी बढ़ती है और बैंकों और निवेशकों के लिए जोखिम की धारणा बढ़ सकती है.
यह ज्यादा गंभीर श्रेणी है.
एफ़एटीएफ़ ऐसे देशों में मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद की फंडिंग या परमाणु प्रसार से जुड़ी फंडिंग से निपटने की व्यवस्था में गंभीर कमियां मानी जाती हैं.
एफ़एटीएफ़ ऐसे मामलों में दूसरे देशों से निगरानी और जांच-पड़ताल बढ़ाने, और सबसे गंभीर मामलों में काउंटर मेज़र्स अपनाने या कार्रवाई करने को कह सकता है.
ब्लैक लिस्ट में आने पर आम तौर पर:
- उस देश की वित्तीय व्यवस्था पर कड़ी निगरानी और जांच बढ़ जाती है.
- दूसरे देशों के बैंक उसके साथ लेन-देन को लेकर अधिक सावधानी बरतते हैं.
- अंतरराष्ट्रीय कारोबार और बैंकिंग लेन-देन मुश्किल और महंगे हो सकते हैं.
- विदेशी निवेश और देश की आर्थिक साख पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
- आईएमएफ़, वर्ल्ड बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से वित्तीय मदद हासिल करना भी मुश्किल हो सकता है, हालांकि एफ़एटीएफ़ सीधे इन संस्थाओं से फंडिंग रोकने का आदेश नहीं देता.
पाकिस्तान क्या अभी किसी लिस्ट में है?
एफ़एटीएफ़ के मुताबिक़ उसकी प्लीनरी मीटिंग्स आम तौर पर फरवरी, जून और अक्तूबर में होती हैं.
एफ़एटीएफ़ के पिछली म्यूचुअल इवैल्यूएशन और उसके बाद के फ़ॉलो-अप के बाद पाकिस्तान 21 अक्तूबर 2022 को ग्रे लिस्ट से बाहर हो चुका है.
एफ़एटीएफ़ हर प्लीनरी के बाद अपनी मॉनिटरिंग ज्यूरिस्डिक्शन की स्थिति पर अपडेट जारी करता है.
मसूद अज़हर कौन है?
मसूद अज़हर उन 20 भगोड़ों में भी शामिल था, जिन्हें भारत ने पाकिस्तान से मांगा था.
साल 2008 के मुंबई हमलों के बाद भारत ने यह मांग फिर उठाई थी. इन हमलों को लश्कर-ए-तैयबा के 10 चरमपंथियों ने अंजाम दिया था, जिसमें 166 लोगों की मौत हुई थी.
भारतीय अधिकारियों ने बाद के हमलों में भी जैश-ए-मोहम्मद की भूमिका बताई है, जिनमें साल 2016 का पठानकोट एयरबेस हमला और 2019 का पुलवामा विस्फोट भी शामिल है.
पाकिस्तानी अधिकारियों ने कहा कि उसका नाम एफ़आईए की 2026 की रेड बुक में भी शामिल है.
सूची में उसकी पहचान जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख के रूप में की गई है और इसमें प्रवेश की तारीख़ 31 दिसंबर, 2021 दी गई है.
सूची में अज़हर का नाम 1480वें नंबर पर है और इसमें 'मोस्ट वॉन्टेड आतंकवादियों' के 1,804 नाम शामिल हैं. इससे जुड़ी एंट्री में अज़हर को स्वस्थ, भारी शरीर वाला और सामान्य मध्यम क़द का बताया गया है.
इसी बहावलपुर में 10 जुलाई, 1968 को अल्लाहबख्श सबीर के परिवार में मसूद अज़हर का जन्म हुआ था. अज़हर के पिता सबीर बहावलपुर के एक सरकारी स्कूल में प्राधानाध्यापक थे.
भारत के गृह मंत्रालय की ओर से सात मार्च 2024 को जारी मोस्ट वॉन्टेड लोगों की सूची में मसूद अज़हर का नाम नंबर एक पर है.
भारत के ख़िलाफ़ मसूद के अपराध की लंबी चौड़ी सूची है और कई मामलों में अभियुक्त के तौर पर उसका नाम है.
इन मामलों में एक अक्तूबर, 2001 को श्रीनगर में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य विधानसभा कॉम्प्लेक्स पर हमला भी शामिल है, जिसमें 38 लोगों की मौत हुई थी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.