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CAA विरोधी प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर लगाया पिटाई करने का आरोप- आज की बड़ी ख़बरें
दिल्ली में नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में संसद तक जुलूस निकालने की कोशिश कर रहे जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों ने दिल्ली पुलिस पर पिटाई करने का आरोप लगाया है.
छात्रों का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया और पिटाई करते हुए नाज़ुक अंगों को भी निशाना बनाया. घायलों में लड़कों के अलावा लड़कियां भी शामिल हैं.
इन आरोपों के संबंध में अभी तक दिल्ली पुलिस की प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हुई है.
एक छात्रा की बहन ने वीडियो मेसेज के माध्यम से बीबीसी को बताया कि उनकी बहन के साथ कैसे क्रूरता हुई. इस वीडियो को उस समय रिकॉर्ड किया गया जब छात्रा को आईसीयू से अल्ट्रासाउंड के लिए बाहर लाया गया.
वीडियो में छात्रा कहती है, "मैं बैरिकेड पर खड़ी थी. एक महिला पुलिसकर्मी ने बैरिकेड से मुझे धक्का दिया जिससे मैं गिर गई. फिर चार-पांच पुलिसकर्मी थे वहां, उनमें से एक ने मुझे अपने बूटों से प्राइवेट पार्ट्स और सीने पर लातें मारीं. इससे मेरी पसली में फ्रैक्चर आया है."
छात्रा का दावा है कि जिस पुलिसकर्मी ने उनके साथ यह किया, ऑनलाइन न्यूज़ पर उसकी वीडियो क्लिप भी है.
मार्च कर रहे थे छात्र
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ पुलिस और यूनिवर्सिटी की अधिकारियों के अपील के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने अपना विरोध मार्च ख़त्म करने से इनकार कर दिया. पुलिस और यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना था कि इस प्रदर्शन की इजाज़त नहीं ली गई थी.
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रॉक्टर वसीम अहमद ने छात्रों से कहा, "मैं छात्रों से अपील करता हूं कि वे यूनिवर्सिटी की तरफ़ लौट जाएं. क़ानून का सम्मान करें और शांति से वापस जाएं."
जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के आस-पास के इलाकों में सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बीच प्रदर्शनकारियों ने यूनिवर्सिटी के गेट नंबर सात से अपना मार्च शुरू किया. इस दौरान पुरुष प्रदर्शनकारियों ने सड़क के दोनों तरफ़ मानव श्रृंखला बनाई हुई थी जबकि महिलाएं हाथ में तिरंगा लेकर 'हल्ला बोल' का नारा लगाती हुई आगे बढ़ रही थीं.
एक महिला प्रदर्शनकारी ज़ेबा अहमद ने कहा, "दो महीने हो गए हैं, हमें प्रदर्शन करते हुए. सरकार की तरफ़ से हमसे बात करने कोई नहीं आया. इसलिए हम उनसे जाकर बात करना चाहते हैं."
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश की. इसके बाद कुछ प्रदर्शनकारियों के घायल होने की ख़बर आई है.
शाहीन बाग़ में बच्ची की मौत पर सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी
नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ दिल्ली के शाहीन बाग़ में क़रीब दो महीने से हो रहे प्रदर्शन के दौरान चार महीने के बच्चे की मौत के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख़्त टिप्पणी की है.
बहादुरी पुरस्कार पाने वाली छात्रा ज़ेन गुणरत्न सदावर्ते की चिट्ठी पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इसपर सुनवाई की.
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की.
छात्रा ने पत्र याचिका में कहा है कि इस तरह के धरने प्रदर्शन में बच्चों को शामिल न किया जाए इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट गाइड लाइन बनाए.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि 'हम ये जानना चाहते हैं कि क्या चार महीने का बच्चा धरने में जा सकता है?' सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है.
सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) एक्ट को वैध ठहराया
सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधन क़ानून, 2018 को वैध क़रार दिया है.
इस क़ानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फ़ैसला सुनाया.
दरअसल 20 मार्च 2018 को एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के हो रहे दुरुपयोग के मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम के तहत मिलने वाली शिकायत पर स्वत: एफ़आईआर और गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी.
इसके बाद संसद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए क़ानून में संशोधन किया गया था. इसे भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. लेकिन जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने क़ानून में किए गए संशोधन का सही ठहराया. इसका अर्थ ये है कि शिकायत मिलने पर एफ़आईआर और गिरफ़्तारी पर पहले वाली स्थिति बन गई है.
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