कोरोना के ख़िलाफ़ जंग में विश्व युद्ध के दौर से क्या सीख सकते हैं?

    • Author, एड्रिन बर्नहार्ड
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
  • प्रकाशित

कुछ हफ़्तों पहले ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने अपने देश वासियों से अपील की थी कि संकट की इस घड़ी में सभी को वही अनुशासन और संकल्प दिखाना है जैसा कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान दिखाया था. इस समय जंग किसी देश से नहीं है बल्कि एक ऐसे शत्रु से है जो दिखाई नहीं देता.

कोरोना वायरस से लड़ी जाने वाली लड़ाई, कई लिहाज़ से जंग के मैदान में लड़ी जाने वाली लड़ाई से अलग है. लेकिन इसे मात देने के लिए वही तरीक़े अपनाए जा रहे हैं, जैसे किसी जंग में अपनाए जाते हैं.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से दुनिया ने कोई बड़ी जंग नहीं देखी है.

अमरीका की नॉर्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफ़ेसर मार्क आर विल्सन का कहना है कि संकट की घड़ी में क्या और कैसे करें. संकट गुज़र जाने के बाद उससे कैसे उबरें, इसके लिए कोई तयशुदा फॉर्मूला नहीं है. हां, अगर लोग इतिहास के पन्नों से धूल हटा लें, तो यक़ीनन उन्हें इस मुश्किल घड़ी का सामना करने का कोई मंत्र ज़रूर मिल जाएगा.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जहाज़ों, टैंकों, और बम फेंकने वाले विमानों के उत्पादन में मौलिक रूप से तेज़ी लाने की आवश्यकता थी, जिससे युद्धकालीन अर्थव्यवस्था लामबंद हुई. अमरीका और ब्रिटेन ने नागरिकों के लिए आम रोज़मर्रा का सामान बनाने वाली फ़ैक्ट्रियों को सैन्य उपकरण बनाने के काम पर लगा दिया था. कार बनाने वाली कंपनियां आर्मी के लिए ट्रक बनाने लगीं. घड़ियां बनाने वाली कंपनियां गोला-बारूद और कारतूस डिज़ाइन करने लगीं. रेशमी मोज़ों का इस्तेमाल पैराशूट में होने लगा.

जनरल मोटर्स बना रही है वेंटिलेटर

पिछले कुछ महीनों से हम एक बार फिर यही सूरत-ए-हाल देख रहे हैं. महज़ 72 घंटे के समय में फ़्रांस में परफ़्यूम बनाने वाली लग्ज़री ब्रांड कंपनी लुई वुतां ने हैंड सैनिटाइज़र बनाने शुरू कर दिए. अमरीका में जनरल मोटर्स कंपनी गाड़ियां बनाती है. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान इस कंपनी ने टैंक बनाए थे. कोरोना से जंग के लिए जनरल मोटर्स को वेंटिलेटर बनाने का काम दिया गया है.

इसी तरह ब्रिटेन में कपड़े बनाने वाली कंपनियां सर्जिकल और एन-95 मास्क तैयार कर रही हैं. इस समय बड़ी-बड़ी एयरलाइंस का इस्तेमाल या तो विदेशों में फँसे लोगों को लाने में, या फिर डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों को लाने, ले जाने के लिए किया जा रहा है.

ये परिवर्तन सिर्फ़ कंपनियों के सामान बनाने में ही नहीं देखा जा रहा है बल्कि इंसानों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है. मिसाल के लिए कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरोसर्जन और मेडिकल के छात्र आदि सभी को इमरजेंसी वार्डों और आईसीयू में मरीज़ों की देखभाल के लिए लगा दिया गया है. यहां तक कि अस्पताल में मरीज़ का पर्चा बनाने और बिल बनाने वाले भी मरीज़ों की स्कैनिंग कर रहे हैं. रेस्टोरेंट, डॉक्टर, नर्स, और अन्य स्टाफ़ के लिए बड़ी मात्रा में खाना तैयार कर रहे हैं. घर में माता-पिता ही बच्चों के अध्यापक हो गए हैं.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, काम के तरीक़ों में बदलाव कई महीनों में आए थे.

लेकिन कोरोना के समय में ये बदलाव चंद हफ़्तों में ही आ गए हैं. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान किए गए अभूतपूर्व प्रयास, बड़े पैमाने पर उत्पादन और मुनाफ़ा नियंत्रण की नीतियों से हमें कोरोना संकट काल के बाद स्थिति संभालने के लिए एक ख़ाक़ा मिल सकता है.

मिसाल के लिए जो कंपनी अभी वेंटिलेटर और निजी सुरक्षा कवच या पीपीई किट तैयार कर रही हैं, आगे भी फंड देकर उनसे यही काम जारी कराया जा सकता है. जो कंपनी इस वक़्त अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं, उन्हें इसी काम के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है. ऐसा हम चीन में देख भी चुके हैं. यहां हज़ारों कारीगरों ने सरकार के कहने पर चंद दिनों में मॉड्यूलर अस्पताल स्थापित कर दिए जहां हज़ारों कोविड-19 के मरीज़ों का आसानी से इलाज संभव हो गया.

इसके लिए शुरुआत में सरकारों को मोटी रक़म ख़र्च करनी होगी लेकिन लंबे समय में इसका फ़ायदा बहुत ज़्यादा होगा.

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बलिदान की समानता पर बहुत ज़ोर दिया गया था. श्रमिक नेताओं और संघ के अधिकारियों द्वारा इसे सरकारी नियमों के माध्यम से प्रचारित करने के लिए ज़ोर दिया गया था. हालांकि आज के दौर में ऐसा करना संभव नहीं है. लेकिन, हाल के कुछ सप्ताह में लोगों ने इसका पालन करने के लिए बड़े पैमाने पर इच्छा शक्ति दिखाई है.

अर्थव्यवस्था का रूप बदल जाएगा

कुछ जानकार महामारी को जंग नहीं मानते हैं. उनके मुताबिक़ जंग का मक़सद होता है, ज़्यादा से ज़्यादा मौत. जबकि महामारी से लड़ने का मक़सद होता है ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की जान बचाना. वहीं कुछ जानकार ये भी कहते हैं कि संकट की घड़ी हमें सुधार का अवसर प्रदान करती है. जैसा कि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हुआ. इस जंग के बाद राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य सुधार अमल में आए. संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठन बने. अमरीका में जीआई बिल पास हुआ जिसमें जंग से लौटने वाले सिपाहियों को लाभ देने जैसी बातें शामिल थीं. इसी तरह ब्रिटेन में नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) का गठन भी दूसरे विश्व युद्ध के बाद ही हुआ था.

उम्मीद की जा रही है कि कुछ इसी तरह के सुधार कोरोना काल के बाद भी होंगे. मिसाल के लिए ज़रूरी सामान की डिलिवरी करने वालों और स्वास्थ्यकर्मियों के लिए मुआवज़े के पैकेज की पेशकश हो सकती है. ये भी संभव है कि पूरी अर्थव्यवस्था का रूप ही बदल जाए.

रोज़गार गारंटी को और अधिक सुरक्षित बनाया जाए. संकट की इस घड़ी में जिस तरह नौजवान नेता, वैज्ञानिक और मेडिकल एक्सपर्ट सामने आ रहे हैं इसे देखकर कहा जा सकता है कि ऐसे लोग युद्ध के दौर के नायक साबित होंगे.

80 साल बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लामबंदी

द्वितीय विश्व युद्ध में एशिया और यूरोप पूरी तरह बर्बाद हो गए थे. क़रीब छह करोड़ लोग मारे गए थे. वर्ष 1945 को इतिहास में ज़ीरो वर्ष समझा जाता है. उस समय दुनिया ने ऐसा दौर देखा था जिसने हमेशा के लिए सब कुछ बदल दिया था. ये वो दौर था जिसमें लोगों ने सिर्फ़ नुक़सान देखा था. लेकिन वो उम्मीद से भरपूर थे.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूरे अमरीका और यूरोप में नई तकनीकों, उद्योगों और संबंधित मानव कौशल का निर्माण हुआ. यही नहीं रोज़गार और आय का उचित वितरण भी हुआ. इस युद्ध के बाद पुराने विचार ध्वस्त हो गए उनकी जगह नए सामाजिक संबंध, कारोबार और मानव कौशल की क़द्र की जाने लगी. लोगों ने एक दूसरे के साथ मज़बूत और अच्छे कारोबारी संबंध बनाकर एक दूसरे को मुश्किल हालात से बाहर निकाला.

कोरोना संकट ने यक़ीनन 80 साल बाद लोगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लामबंद किया है. अच्छी बात ये है कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान दुनिया गुटों में बंट कर एक दूसरे से लड़ रही थी. लेकिन कोरोना संकट काल में कई देश साथ आए हैं. उम्मीद है इस संकट के बाद दुनिया, नए तेवर और बहुत से सकारात्मक सुधारों के साथ फिर से खड़ी होगी.

(ये बीबीसी फ्यूचर की स्टोरी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. मूल कहानी देखने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं.)

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