टूथब्रश करने के लिए क्या दो मिनट काफी होते हैं, ब्रश करने का क्या है सही तरीक़ा?

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- Author, जोसेफिन हर्शफेल्ड
- पदनाम, .
- प्रकाशित
हम में से कई लोग इस सलाह से परिचित हैं कि हमें अपने दांतों को दिन में दो बार और कम से कम दो मिनट तक ब्रश करना चाहिए.
दांत के डॉक्टरों ने 1970 के दशक में यह सुझाव देना शुरू किया कि हमें अपने दांतों को दो मिनट के लिए साफ़ करना चाहिए और बाद में नरम ब्रिसल वाले टूथब्रश को इस्तेमाल करने की भी सलाह दी थी.
वैसे कुछ का कहना है कि एक मिनट भी दांतों को ब्रश करना काफ़ी है, जबकि कुछ साक्ष्यों का कहना है कि दो मिनट तक इसे साफ़ करना भी पर्याप्त नहीं है.
कुछ नए शोधों के मुताबिक अगर दांत से अधिक से अधिक गंदगी हटानी है तो ब्रश भी ज़्यादा देर तक करनी होगी.
इसके लिए कम से कम तीन या चार मिनट ब्रश करने का सुझाव दिया गया है. क्या इसका मतलब ये है कि हमें ब्रश करने के समय को दोगुना करना होगा?

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प्लेक़ हटाने में मददगार
लेकिन अब जो सर्वसम्मति बनी है, वो मुख्य रूप से 1990 के दशक से प्रकाशित शोध रिपोर्ट पर आधारित हैं जिसमें ब्रश करने के समय, उसकी तकनीक और टूथब्रश के विभिन्न प्रकारों के बारे में है.
इन शोधों में पता चला कि दो मिनट तक ब्रश करना प्लेक़ को तो हटाने में मददगार है लेकिन अच्छी तरह से नहीं.
लेकिन जब ब्रश दो मिनट से अधिक समय के लिए किया गया तो उससे पहले की तुलना में अधिक प्लेक़ हटे. इसके बावजूद ये शोध अब भी नहीं किया गया कि दो मिनट की तुलना में दो मिनट से अधिक ब्रश करने पर क्या लंबे समय तक हमारे दांत स्वस्थ रहेंगे.
हालांकि प्लेक़ के अधिक जमाव से होने वाले नुकसान को हम जानते हैं और इसके आधार पर हर बार ब्रश करने से हटने वाला प्लेक़ हमारे मुंह के स्वास्थ्य को बेहतर ही बनाता है.
लेकिन इसके साक्ष्य नहीं हैं और ऐसा कर पाना आसान भी नहीं है क्योंकि इस तरह के शोध में काफ़ी वक़्त लगेगा.

शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र
जब हम दांतों को ब्रश करते हैं तो हमारा उद्देश्य उससे रोगाणुओं को हटाना होता है. इन्हें डेंटल प्लेक़ कहते हैं. ये प्लेक़ बैक्टीरिया, वायरस और फंगस के रूप में वहां इकट्ठा होकर एक समुदाय के रूप में वहां रहते हैं, जिसे माइक्रोबियल बायोफ़िल्म कहा जाता है.
ये बायोफ़िल्म बहुत चिपचिपे होते हैं और सिर्फ़ उन्हें ब्रश की मदद से ही हटाया जा सकता है. ये रोगाणु कई कारणों से आसानी से बढ़ते चले जाते हैं, इसमें दातों की सतह पर खुरदुरेपन का पनपना, ब्रश का मसूड़े के कुछ हिस्सों तक न पहुंच पाना जैसी चीज़ें शामिल हैं.
वास्तव में, साफ़ कर दिए जाने के कुछ ही घंटों बाद ये प्लेक़ बायोफ़िल्म हमारे दांतों पर दोबारा तैयार होने की क्षमता रखते हैं. तब ही दिन में दो बार ब्रश करने की सलाह दी जाती है.
अगर लंबे समय तक ब्रश न की जाए और ठीक से दांत साफ़ न किए जाएं तो उस पर प्लेक़ का गहरा जमावड़ा हो जाएगा और इससे हमारे शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को सक्रिय कर सकता है और इससे मसूड़े में सूजन और दर्द जैसी स्थित पैदा होती है.
सूजन आमतौर पर दर्दनाक नहीं होते लेकिन अक्सर दांतों को ब्रश करने के समय ख़ून निकलने की शिकायत होती है और कुछ मामलों में तो सांसों से बदबू तक आती हैं. बायोफ़िल्म कैविटी का कारण भी बन सकते हैं.

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ब्रश करने का क्या है उचित तरीक़ा?
प्रत्येक दांत से अधिक से अधिक प्लेक़ को हटाना ही हमारे ब्रश करने का उद्देश्य होता है. ताज़ा साक्ष्य बताते हैं कि दांतों को ब्रश करने में लगाया गया अधिक समय (हर बार ब्रश करने पर चार मिनट तक) इसे साफ़ करने में मददगार होता है.
लंबे समय तक ब्रश करने का मतलब ये होता है कि हम अपने दांतों को अधिक से अधिक साफ़ कर पाते हैं, ख़ास कर उन जगहों पर जहां आसानी से ब्रश नहीं पहुंचते और कम समय तक सफ़ाई करने में वो जगह रह जाते हैं.
लेकिन इस बात को लेकर भी सावधान रहें कि अपने दांतों को बार बार ब्रश न करें (उदाहरण के लिए- दिन में दो बार से अधिक) और उन्हें ज़ोर ज़ोर से भी न रगड़ें. इसके अलावा सबसे अहम ये है कि कड़े ब्रिसल वाले ब्रश और खुरदुरे टूथपेस्ट या पाउडर का इस्तेमाल तो बिल्कुल ही न करें क्योंकि इनसे दांतों में घर्षण ज़्यादा होता है और ये उन्हें बहुत नुकसान पहुंचा सकते हैं.
ब्रश करने के कई अलग अलग तरीक़े होते हैं, इनका उपयोग आप ब्रश ठीक से करने में कर सकते हैं.
इनमें से एक है बास तकनीक. इसमें दांतों के साथ मसूड़ों की अच्छी तरह सफ़ाई करता है. इसमें मसूड़ों के निचले भाग को भी साफ़ करते हैं जहां प्लेक़ सबसे पहले जमते हैं और जो वहां सूजन का कारण बनते हैं.
अपने दांतों को बहुत हल्की ताक़त से ब्रश करें. हालांकि इस पर किसी एक मत पर सर्वसम्मति के साक्ष्य नहीं है कि यह ताक़त कितनी होनी चाहिए. हमारे मुंह के भीतर हार्ड और सॉफ़्ट दोनों तरह के टिश्यू होते हैं और हल्की ताक़त से ब्रश करने पर उन्हें नुकसान नहीं पहुंचता है.

इस तकनीक को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं, जैसे कि आप कौन से टूथब्रश, टूथपेस्ट और जीभी इस्तेमाल करते हैं.
उदाहरण के लिए जिन्होंने बहुत अधिक एसिडिक सोडा पी कर अपने दांतों के सतह को नुकसान पहुंचा चुके हैं उनके दांत कमज़ोर हो सकते हैं.
इसका मतलब ये है कि अगर वे ऐसे टूथपेस्ट या सख्त ब्रिसल का इस्तेमाल करते हैं जिससे घर्षण हो तो उनके दांतों को और अधिक नुकसान पहुंचेगा.
आपको अपने दांतों के लिए कौन सा ब्रश इस्तेमाल करना चाहिए, इसके लिए अपने दांत के डॉक्टर से मिलें.

इंटरडेंटल सफ़ाई
इंटरडेंटल सफ़ाई जैसा कि नाम से पता चलता है, यह दांतों के बीच की सफ़ाई की तकनीक है. इसे फ़्लॉसिंग की कहते हैं. कई शोध में पता चला है कि इससे दांतों में सड़न और मसूड़े की सूजन दोनों को कम किया जा सकता है.
इसमें फ़्लॉस या धागे के दोनों छोर को दोनों हाथों से पकड़कर, दो दांतों के बीच में फंसाया जाता है, और हल्की ताक़त से दांतों पर ऊपर से नीचे फिर नीचे से ऊपर की ओर रगड़ा जाता है.
इंटरडेंटल ब्रश जिसे मसूड़ों और दांत के बीच धकेला जाता है वो और भी अधिक प्रभावी हो सकता है. टूथपिक्स, वाटर जेट्स या टंग क्लीनर्स जैसे सफ़ाई के अन्य तरीकों के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है.
निश्चित तौर पर हम दिन में दो बार अपने दांतों की सफ़ाई के आदि हैं लेकिन यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि इसके लिए हमें उचित तकनीक का उपगोय करने पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए कि हम ब्रश अच्छी तरह करें.
कुल मिलकार, दो मिनट से अधिक समय के लिए ब्रश करने से हमें अपने दांतों से अधिक प्लेक़ को हटाने में मदद मिल सकती है और इसके फलस्वरूप दांतों, मसूड़ों के बेहतर स्वास्थ्य की संभावना होगी.
(जोसेफिन हर्शफेल्ड, ब्रिटेन के बर्मिंघम यूनिवर्सिटी की रिस्टोरेटिव डेंटिस्ट्री में एक अकादमिक क्लिनिकल लेक्चरर हैं. द कॉन्वर्सेशन का ये लेख बीबीसी मुंडो पर प्रकाशित हुआ था.)
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