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कोरोना लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्थाएं पटरी पर आएंगी तो क्या क्या होगा
- Author, रोजर हैराबिन
- पदनाम, पर्यावरण विश्लेषक, बीबीसी
- प्रकाशित
'पीटर्सबर्ग क्लाइमेट डायलॉग' के लिए अगले हफ़्ते 28 अप्रैल से होने वाली बैठक में ये उम्मीद की जा रही है कि कोविड-19 की महामारी से पैदा हुए आर्थिक संकट पर ज़रूर बात होगी.
आर्थिक संकट को सुलझाने के लिए जिन विकल्पों पर भी बात हों, उनमें जलवायु परिवर्तन का सवाल ज़रूर शामिल किया जाना चाहिए.
दो दिनों तक चलने वाली इस ऑनलाइन कॉन्फ़्रेंस में 30 देशों के पर्यावरण मंत्री ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की दिशा में बात करेंगे.
बैठक के एजेंडे में फोकस इस बात पर रहेगा कि महामारी ख़त्म होने के बाद अर्थव्यवस्थाओं को पटरी पर लाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों में पर्यावरण का संतुलन कैसे साधा जाए.
इसका एक और मक़सद कॉर्बन फ़्यूल की खपत में कमी की महत्वाकांक्षी योजना को लेकर अंतरराष्ट्रीय समझौते पर सहमति तैयार करना है.
पेरिस समझौता
हालांकि, पिछले नवंबर में इसी मुद्दे पर ग्लासगो में निर्धारित COP26 की अहम कॉन्फ़्रेंस स्थगित हो गई थी और इसके बाद से नई तारीख का एलान नहीं हो पाया है.
कॉन्फ़्रेंस COP26 के अध्यक्ष और ब्रिटेन के पर्यावरण मंत्री आलोक शर्मा कहते हैं, "क्लाइमेट चेंज पर लक्ष्य बढ़ाने के इरादे पर हम कायम हैं ताकि पेरिस समझौते (तापमान में वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस से कम पर स्थिर रखने के लक्ष्य) को पूरा किया जा सके."
"दुनिया को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए क्योंकि उसे कोरोना वायरस की महामारी का मुक़ाबला करना है. ताकि जब ज़िंदगी पटरी पर आए तो उसमें पर्यावरण का ख्याल रखा जा सके, जिसमें कोई पीछे न छूटे. पीटर्सबर्ग क्लाइमेट डायलॉग पर हम सभी देश मिलकर बात करेंगे कि कैसे सपनों को ज़मीन पर साकार किया जाता है."
ब्रिटेन और जर्मनी 'पीटर्सबर्ग क्लाइमेट डायलॉग' की साझा तौर पर मेजबानी करने जा रहे हैं. इस ऑनलाइन कॉन्फ़्रेंस में विकसित देशों के साथ-साथ विकासशील देश भी हिस्सा ले रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश, सिविल सोसायटी और कारोबारी दुनिया के लोगों को भी कॉन्फ़्रेंस में अपनी बात रखने का मौका मिलेगा.
जलवायु परिवर्तन
पिछले हफ़्ते ही एंटोनियो गुटेरेश ने चेताया था कि जलवायु परिवर्तन का मुद्दा कोरोना वायरस से कहीं बड़ा है.
कई कैम्पेन ग्रुप इस मीटिंग को लेकर सशंकित हैं. कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए हुए पेरिस समझौते के बाद से ही हकीकत में कार्बन डायक्साइड (CO2) गैस का स्तर बढ़ रहा है.
हालांकि कोविड-19 की महामारी की वजह से इसमें फिलहाल के लिए गिरावट दर्ज की गई है.
पर्यावरण और विकास के लिए काम करने वाली ग़ैर सरकारी संस्था 'केयर' का कहना है, "हमने चेतावनी दी है कि क्लाइमेट चेंज को लेकर अमीर देशों की तरफ़ से विकासशील देशों को मिलने वाली आर्थिक मदद दरअसल साल 2018 में कम कर दी गई थी. विकासशील देशों को ये मदद इसलीए दी जाती है कि वो पर्यावरण परिवर्तन के हिसाब से खुद को ढाल सकें."
'केयर' ,से जुड़े स्वेन हार्मेलिंग कहते हैं, "अगर सरकारें अपने आर्थिक मदद को लंबे समय तक जारी रखने और न्यायसंगत बनाए रखने में नाकाम रहीं तो वे हमारी पृथ्वी को आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण की दृष्टि से बर्बादी के ऐसे कगार पर लाकर खड़ा कर देंगी जहां हमारा अस्तित्व ही ख़तरे में होगा और ये स्थिति पर्यावरण संकट के कारण पैदा होगी."
यूरोपीय संघ
यूरोपीय संघ ने पहले से ही पर्यावरण के संरक्षण के लिए आर्थिक पैकेज की तैयारी कर रखी है. यूरोपीय संघ में इस आर्थिक पैकेज का काम देख रहे फ़्रैंज़ टिमरमैंस कहते हैं कि कोविड-19 की महामारी ख़त्म होने के बाद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए खर्च किए जाने वाले प्रत्येक यूरो को पर्यावरण और डिजिटल बदलाव से जोड़ा जाएगा.
यूरोपीय संघ में इस आर्थिक पैकेज को ग्रीन डील का नाम दिया जा रहा है. फ़्रैंज़ टिमरमैंस कहते हैं, "यूरोप का ग्रीन डील विकास की रणनीति है और हम इसमें कामयाब होंगे. जब अगला संकट आएगा तो हम इसे छोड़ने की स्थिति में नहीं होंगे. ये यूरोप के भविष्य के लिए ज़रूरी है."
इस बीच चीन को देखकर ऐसा लग रहा है कि कार्बन फ़्यूल की जबर्दस्त खपत से वो अपने विकास के इंजन को रफ़्तार देना जारी रखेगा जबकि राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि अमरीका संघर्ष से जूझ रही तेल कंपनियों को बचाएगा. यहां तक कि यूरोप में भी पर्यावरण से जुड़े आर्थिक पैकेज को लेकर कुछ देशों में कश्मकश की स्थिति महसूस की जा सकती है.
कोरोना वायरस
जर्मनी की मध्यमार्गी दक्षिण पंथी सीडीयू पार्टी के नेता मार्कस पाइपर का कहना है कि पर्यावरण को बढ़ावा देनी वाली टेक्नॉलॉजी में यूरोपीय संघ के निवेश की योजना लंबे समय के लिए लिहाज नामुमकिन है.
मार्कस पाइपर कहते हैं, "शीर्ष पर खड़ी किसी अर्थव्यवस्था के लिए ग्रीन डील एक बहुत बड़ी चुनौती थी. कोरोना वायरस से जो नुक़सान हुआ है, उसने इसे आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं छोड़ा है."
लेकिन ब्रिटेन के पर्यावरण वादी अर्थशास्त्री लॉर्ड स्टर्न कहते हैं, "फौरी प्राथमिकता तो कोविड-19 की मौजूदा महामारी से निपटने की है. उसके बाद हमें भविष्य का निर्माण करना है. फ़्रैंज़ टिमरमैंस सही कह रहे हैं और ट्रंप गलत हैं. हमें केवल उन्हीं कंपनियों को बचाना चाहिए जो क्लाइमेट चेंज की समस्या से निपटने में अपना योगदान देने जा रहे हैं."
"ज़रूरी नहीं कि फिलहाल ये कंपनियां पर्यावरण को नुक़सान न पहुंचाने वाली टेक फ़र्म्स ही हों. लेकिन इन कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों के मुताबिक़ कार्बन उत्सर्जन में कटौती की कोशिशों में अपना योगदान करना होगा."
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