आंध्र का माइक्रो फाइनेंस है बेहतर विकल्प

    • Author, उमर फ़ारूक़
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद
  • प्रकाशित

आंध्र प्रदेश में कुछ माइक्रो फाइनेस कंपनियों के उत्पीड़न के कारण खेती करने वाले किसानों की आत्म-हत्याओं की घटनाओं ने माइक्रो फाइनेंस के बारे में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

लेकिन महिलाओं के स्वयं सेवी ग्रुप एक बेहतर विकल्प के रूप में उभरे हैं. इन समूहों ने छोटी-छोटी बचत करके विभिन्न स्थानों पर माइक्रो फाइनेंस कंपनियों और महाजनों के शोषण का दरवाज़ा बंद कर दिया है.

राज्य में इन समूहों का विकास इतना बेहतर हुआ है कि सात लाख समूहों से तकरीबन एक करोड़ महिलाएं जुड गई हैं जिन्होंने अब तक छह हज़ार करोड़ रुपये की बचत की है. अब इस आधार पर उन्हें बैंकों से भी ऋण मिलता है जिसका वो आर्थिक और व्यापारिक गतिविधियों में इस्तेमाल करती हैं.

इस अभियान की सफलता का एक उदाहरण है महबूबनगर जिले का लिंगरेड्डी गुदा गाँव, जहाँ महिलाओं के ऐसे कोई 28 ग्रुप काम कर रहे हैं और हर समूह से 12 से 14 महिलाएं जुड़ी हुई हैं.

उन्हीं महिलाओं में शामिल है 60 वर्षीया बानो बी. पढ़ी-लिखी न होने के बावजूद यह महिला खुद अपना व्यापार चलाती हैं जिसमें दूध का कारोबार और खेती-बाड़ी भी शामिल है.

बानो बी ने बीबीसी को बताया, "मैं गत 14 वर्षों से इस ग्रुप की सदस्य हूँ और अब तक मैने 28,000 रुपये की बचत की है और उसके आधार पर मुझे समय-समय पर बैंक से ऋण मिल जाता है. अभी हाल ही में हमारे ग्रुप को बैंक से दो लाख रुपये का ऋण मिला और उसमें से हर सदस्य को 14,000 रुपए मिले. इसमें मैंने कुछ और रुपए मिलाकर एक गाय खरीदी. जब पहला ऋण मिला तब मैंने एक भैंस खरीदी थी. अब मेरे पास छह भैंसें और चार गाय है और दूध के व्यापार से ही हमारा गुजारा होता है.”

बानों बी का आगे कहना है, “इससे हमें हर महीने दस हजार रुपए की आमदनी होती है. मेरी चार एकड़ जमीन भी है. इस आमदनी से मैं बचत भी करती हूँ और व्यापार में पूँजी-निवेश भी करती हूँ. मेरा एक बेटा बिजली का झटका लगने से मर गया था. उसके चार बच्चों की परिवरिश भी मैं ही करती हूँ".

खुद की जिम्मेदारी

स्वयंसेवी समूहों की व्यवस्था बड़े ही संगठित और पारदर्शिता के साथ काम करती है. हालाँकि कहने के लिए तो ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारी उसकी निगरानी करते हैं, लेकिन सारा काम-काज और अधिकार महिलाओं के हाथ ही में होता है.

हर समूह की एक नेता होती है. ऐसा ही एक श्री चैतन्य समूह है जिसकी नेता अनिता हैं और उसी समूह की सदस्य बानो बी हैं. बानो बी और अनिता आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन और चेतना की वो छवि हैं जो इन समूहों द्वारा ग्रामीण आंध्र प्रदेश में आया है.

हर पंद्रह दिन में एक बार समूह की बैठक होती है और उसी में बैंक से ऋण लेने से लेकर ऋण लौटाने तक के फैसले होते हैं. उसमें हर महिला सदस्य के आर्थिक और व्यापारिक मामलों की समीक्षा होती है ताकि इसकी गारंटी की जा सके कि बैंक से मिलने वाले ऋण का सही जगह इस्तेमाल हो.

महबूबनगर जिले में इन समूहों के उत्पाद की मार्केटिंग की जिम्मेवार सहायक प्रोजेक्ट मैनेजर नागा मल्लिका का कहना है, “इस व्यवस्था की सफलता का सबसे बड़ा कारण यही है कि बैंक किसी एक सदस्य को व्यक्तिगत रूप से ऋण नहीं देता है, बल्कि पूरे समूह को ऋण देता है और पूरा समूह पर उसे समय से लौटाने की जिम्मेदारी होती है. इस तरह पूरे समूह का हित एक हो जाता है.”

समय पर ऋण लौटाने से बैंक भी उन्हें बार-बार ऋण देते हैं. अनीता के ग्रुप को अब तक तीन बार ऋण मिल चुका है और इसका ऋण लौटाने का रिकॉर्ड भी बहुत अच्चा है. यही वजह है की लिंगरेड्डी गुडा गाँव माइक्रो फाइनेंस के जाल से बचा रहा है.

पढ़ी-लिखी न होने के बावजूद बानो बी खुद अपना व्यपार चलाती हैं
इमेज कैप्शन, पढ़ी-लिखी न होने के बावजूद बानो बी खुद अपना व्यपार चलाती हैं

जबकि इसी गाँव से कुछ ही दूर एक गाँव हाजिगुदा में एक व्यक्ति ने निजी माइक्रो फाइनेंस कंपनी द्वारा परेशान किए जाने के कारण आत्महत्या कर ली थी.

अधिकारियों का कहना है कि माइक्रो फाइनेंस कम्पनियाँ केवल उन्ही गाँव में आ सकी हैं जहाँ महिलाएं स्वयं सेवी समूहों द्वारा बैंकों से लिए गए ऋण वापस नहीं कर सकीं.

नागा मल्लिका का कहना है, “बैंकों और माइक्रो फाइनेंस कंपनियों से मिलने वाले ऋण में एक बड़ा फर्क यह है कि बैंक 12 से 14 प्रतिशत की दर पर ऋण देते हैं जबकि माइक्रो फाइनेंस कंपनियों का कोई हिसाब-किताब नहीं है और उनके ऋण की दर 36 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत तक कुछ भी हो सकती है.”

नागा मल्लिका का कहना है कि जब आप बैंक से ऋण लेते हो तो जैसे-जैसे आप पैसे लौटाते हैं ब्याज दर घटता है. माइक्रो फाइनेंस में शुरू से आखिर तक एक ही ब्याज दर होती है और वो भी बहुत ज्यादा.

वारंगल जिले में एक ऐसी महिला ने आत्म हत्या कर ली थी जिसने एक माइक्रो फाइनेंस कंपनी से 20,000 रुपये का ऋण लिया था. अगले बीस महीनों में उन्होंने 22,000 से ज्यादा रुपए लौटा दिए थे, लेकिन माइक्रो फाइनेंस कंपनी का उतना ही ऋण अब भी बांकी था.

हर पंद्रह दिन में एक बार समूह की बैठक होती है.उसमें हर महिला सदस्यों के आर्थिक और व्यापारिक मामलों की समीक्षा होती है
इमेज कैप्शन, हर पंद्रह दिन में एक बार समूह की बैठक होती है.उसमें हर महिला सदस्यों के आर्थिक और व्यापारिक मामलों की समीक्षा होती है

जब वो समय पर किस्त अदा नहीं कर सकी तो कंपनी वालों ने उसे सताना शुरु कर दिया और उसी कारण उसने आत्महत्या कर ली.

इस तरह की घटनाओं के बाद ही राज्य सरकार ने इन कंपनियों के विरुद्ध कड़ी करवाई की और एक अध्यादेश जारी करके उसपर पाबंदी लगा दी गईं. साथ ही, सरकार ने ग्रामीण महिलाओं के लिए अन्य नौ योजनाएं भी शुरू की, जिसमें उन्हें बैंकों से बिना किसी ब्याज के ऋण दिलाना और महिलाओं का खुद अपना बैंक ‘स्त्री निधि’ स्थापित करना भी शामिल है.

नागा मल्लिका का कहना है कि महिलाओं के समूहों को जो ऋण मिलता है उसमें से केवल 3 प्रतिशत ब्याज महिलाओं को देना पड़ता है और बाक़ी ब्याज दर सरकार देती है. इसका शर्त सिर्फ यही है कि महिलाएं समय से ऋण वापस करे.

ग्रामीण विकास मंत्री माणिक्य वारा प्रसाद राव का कहना है कि सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर यह तीन प्रतिशत ब्याज दर भी हटा देने का फैसला किया है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "अगर महिलाओं का कोई समूह समय पर बैंकों का ऋण लौटा देता है तो उसका पूरा ब्याज राज्य सरकार देगी. ब्याज का यह पैसा महिलाओं के समूह के खाते में जमा रहेगा और जिसका वो इस्तेमाल कर सकेंगी. इसके लिए राज्य सरकार ने एक हज़ार करोड़ रुपये की राशि रखी है.”

सरकार की इस नीति के कारण लिंगरेड्डी गुडा गांव के उस समूह को मिलने वाले दो लाख रूपए के ऋण पर लगभग 50,000 रुपये के ब्याज की बचत करेगा.

महिलाओं का बैंक

साथ ही राज्य सरकार ने जो "स्त्री निधि" बैंक स्थापित किया है वो भी स्वयं सेवी समूहों की सदस्य महिलाओं के लिए काफी सहायक सिद्ध हुआ है. इस बैंक की नौ प्राथमिक पूँजी है इसमें खुद राज्य भर के महिला समूहों ने सौ करोड़ रुपये लगाये हैं जबकि सरकार ने भी उतनी ही पूँजी लगाई है.

जिन महिलाओं का ऋण लौटाने का रिकार्ड अच्चा है. वो केवल फ़ोन करके इस बैंक से आपातकालीन स्थिति में ऋण भी ले सकती हैं. बैंक अडतालीस घंटे के अन्दर ही इस महिला के बैंक खाते में ऋण का पैसा जमा कर देता है.

अगर एक ग्रुप में 12 महिलाएं हैं तो एक समय में यह बैंक छह महिलाओं को ऋण देता है और उसे लौटाने के बाद शेष सदस्यों को भी ऋण मिलता है. इस तरह पूरा ग्रुप इस बात की गारंटी करता है कि ऋण लेने वाली महिलाएं समय पर ऋण लौटाएं.

करते क्या हैं?

हर समूह की एक नेता होती है. ऐसा ही एक श्री चैतन्य समूह है जिसकी नेता अनिता हैं
इमेज कैप्शन, हर समूह की एक नेता होती है. ऐसा ही एक श्री चैतन्य समूह है जिसकी नेता अनिता हैं

लेकिन सवाल यह है कि आखिर महिलाओं का यह ग्रुप करते क्या हैं और अपनी बचत की राशि और बैंक से मिलने वाले ऋण का उपयोग कैसे करते हैं?

इन महिलाओं का सबसे लोकप्रिय काम डेयरी फार्म चलाना या दूध का व्यापार है. लिंगरेड्डी गुडा में अधिकतर महिलाएं भैंस और गाय पालने का ही काम करती हैं. इसके अलावा वो बनियान और दूसरे कपडे़ बनाने, लेस तैयार करने जैसे कई व्यापार कर रही हैं.

इसके अलावा अब इन महिला समूहों ने धान की खरीद- बिक्री का काम भी शुरू कर दिया है. अनीता का कहना है कि लिंग रेड्डी गुडा के समूहों ने पिछले साल किसानों से एक करोड़ रुपये से भी ज्यादा का धान ख़रीदा और उसे राईस मिलों को बेचा, जिससे उन्हें तीन लाख रुपये की आमदनी हुई.

इसमें से खर्च निकालने के बाद इन समूहों ने दो लाख रुपये की बचत की है. अनिता का कहना था,"हमने ये पैसे आपस में बांटे नहीं बल्कि उसे बचाकर रखा है और उससे भी हम सदस्यों को ऋण दे रहे हैं".

सरकारी मदद

राज्य सरकार भी इन समूहों को प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है. मंत्री वारा प्रसाद राव के अनुसार इस वर्ष इन समूहों को 13,000 करोड़ रुपए देने का लक्ष्य रखा गया है और आधा लक्ष्य पूरा भी कर लिया गया है.

ग्रामीण महिलाओं को उम्मीद है कि अगर उन्हें इसी तरह सरकार और बैंकों की मदद मिलती रही तो स्वर्ग को ज़मीन पर उतार लाने का सपना वो जल्द ही साकार कर लेंगी.