ताइवान ने चीन से अपने "सैन्य दुःस्साहस" पर अंकुश लगाने को कहा है. बीते कुछ सालों में दोनों देशों के बीच तनाव अपने अधिकतम स्तर पर जा पहुँचा है.
नए साल के मौक़े पर दिए गए भाषण में ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन में कहा,"हमें चीन को याद दिलाना होगा कि वो स्थिति का ग़लत आकलन ना करे और 'सैन्य दुःस्साहस' को रोके."
2016 में साई इंग-वेन के सत्ता में आने के बाद से चीन ने ताइवान पर सैन्य और राजनयिक दबाव बढ़ा दिया है. साई इंग-वेन ताइवान पर चीन के दावे को ख़ारिज करती रही हैं और देश को चीन का हिस्सा नहीं मानती.
वहीं, चीन लोकतांत्रिक रूप से शासित ताइवान को अपना क्षेत्र बताता है और पिछले दो सालों में अपनी संप्रभुता के नाम पर ताइवान में सैन्य और राजनयिक दबाव बढ़ाता जा रहा है.
हाल के महीनों में चीन के लड़ाकू विमानों ने ताइवान के हवाई क्षेत्र का जमकर उल्लंघन किया है.
अपने भाषण में साई ने कहा कि ‘’चीन के अधिकारियों को ताइवान के आंतरिक क्षेत्र में सैन्य दुःस्साहस के प्रसार को रोक देना चाहिए."
"सेना के ज़रिए दोनों पक्षों के बीच मतभेदों का हल करना कोई विकल्प नहीं है."
उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में तनाव को कम करने के लिए,ताइवान और चीन दोनों को "लोगों की आजीविका और लोगों को शांत करने के लिए मेहनत करनी चाहिए" ताकि एक साथ समस्याओं का शांतिपूर्ण समाधान निकाला जा सके.
आज़ादी की कोशिश बड़ी तबाही लाएगी- चीन
वहीं, नए साल के संबोधन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि चीन और ताइवान दोनों के लोगों की साझा आकांक्षा है कि ‘’हमारी मातृभूमि को दोबारा पूरी तरह एक कर दिया जाएगा.’’
साई के भाषण के बाद शनिवार को बीजिंग में ताइवान मामलों के कार्यालय के प्रवक्ता जू फेंग्लियन ने कहा, "हम शांतिपूर्ण एकीकरण की संभावना के लिए प्रयास करने को तैयार हैं.’’
‘’लेकिन अगर ताइवान की अलगाववादी ताक़तें उकसाती और मजबूर करती हैं या उन्होंने किसी भी तरह से लाल रेखा पार की तो हमें निर्णायक क़दम उठाने होंगे.‘’
जू ने कहा कि स्वतंत्रता की कोशिश भी ताइवान को सिर्फ़ और सिर्फ़ एक "गहरी खाई" में धकेल देगी और यहाँ "बड़ी तबाही" लाएगी.
चीन और ताइवान के बीच विवाद
चीन और ताइवान के बीच 1949 से विवाद चला आ रहा है,जिसकी वजह से ताइवान की पहुँच अंतरराष्ट्रीय संगठनों तक नहीं है और उसे सीमित अंतरराष्ट्रीय मान्यता ही मिली हुई है.दुनिया के सिर्फ़ 15 देश ही ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र मानते हैं.
वहीं,चीन इसे अपने से अलग हुआ हिस्सा और एक विद्रोही प्रांत मानता है. साल 2005 में चीन ने अलगाववादी विरोधी क़ानून पारित किया था जो चीन को ताइवान को बलपूर्वक मिला लेने का अधिकार देता है. उसके बाद से अगर ताइवान अपने आप को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित करता है तो चीन की सेना उस पर हमला कर सकती है.