पाकिस्तान चुनाव: नवाज़ शरीफ़ बोले- मिलकर सरकार बनाने को तैयार

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पाकिस्तान में गुरुवार 8 फरवरी को हुए आम चुनाव में मतगणना अभी भी जारी है. पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने कहा है कि मतगणना की रफ़्तार धीमी होने के लिए मतदान वाले दिन देश भर में इंटरनेट पर प्रतिबंध लगना रहा है.
लेकिन अब तक जो कुछ पता चला है, उसके मुताबिक़, इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के समर्थित उम्मीदवारों को 266 सदस्यों वाली नेशनल असेंबली में से 70 सीटों पर जीत हासिल हुई है.
वहीं, नवाज़ शरीफ़ के नेतृत्व वाली पाकिस्तान मुस्लिम लीग – नवाज़ को 61 सीटों पर जीत हासिल हुई है.
इसके साथ ही पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को लगभग 40 सीटों पर जीत दर्ज हुई है.
अपनी सीटें जीतने वाले इमरान ख़ान समर्थित उम्मीदवारों में से ज़्यादातर ख़ैबर-पख़्तूनख़्वाह के रहने वाले हैं. वहीं, सबसे ज़्यादा आबादी वाले पंजाब सूबे में नतीजे आना जारी है.
लाहौर की एनए-130 सीट पर भारी अंतर से चुनाव जीतने वाले नवाज़ शरीफ़ ने शुक्रवार शाम अपनी पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित किया.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, नवाज़ शरीफ़ ने दावा किया है कि उनकी पार्टी को इस चुनाव में सबसे ज़्यादा मत मिले हैं.
उन्होंने अपनी पार्टी को मिली कुल सीटों की संख्या ज़ाहिर नहीं की है. लेकिन चुनाव आयोग के मुताबिक़, उनकी पार्टी को 61 सीटें मिली हैं जो कि बहुमत के आंकड़े 133 से काफ़ी कम हैं.
उन्होंने ये भी कहा है कि उनकी पार्टी के पास इतनी सीटें नहीं हैं कि वह अपने दम पर सरकार बना सके. इसलिए उनकी पार्टी के शहबाज़ शरीफ़ समेत दूसरे नेता पीपीपी के आसिफ़ अली ज़रदारी और एमक्यूएम समेत दूसरी पार्टियों के नेताओं से मिलेंगे.
पीटीआई प्रमुख इमरान ख़ान को इस चुनाव में खड़े होने की इजाज़त नहीं थी. उनकी पार्टी को भी जनसभाएं आयोजित करने की इजाज़त नहीं थी. ऐसे में पीटीआई के कई उम्मीदवारों ने इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में हिस्सा लिया है.
पाकिस्तान में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीतने वाले लोगों को अपनी जीत के 72 घंटे के अंदर किसी पार्टी को अपना समर्थन देना होता है.
पाकिस्तान में सक्रिय पोलिंग ग्रुप गॉलअप पाकिस्तान के कार्यकारी निदेशक बिलाल गिलानी ने समाचार एजेंसी एएफ़पी के साथ बातचीत में कहा है कि ‘अगर पीटीआई सरकार बनाने में असमर्थ भी रहती है तो ये चुनाव बताते हैं कि राजनीतिक इंजीनियरिंग की भी एक सीमा होती है. ये दिखाता है कि सेना को हमेशा वो नहीं मिलता, जो कि वह चाहती है. ये उम्मीद की किरण है.”












