26 सप्ताह की गर्भवती महिला के गर्भपात की मांग वाली याचिका का मामला क्या है?
- Author, उमंग पोद्दार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 26 सप्ताह की गर्भवती एक विवाहित महिला की गर्भपात की मांग वाली याचिका पर सुनवाई जारी रखी.
कोर्ट ने एम्स से आज महिला का मेडिकल परीक्षण करने को कहा है. अब इस मामले की सुनवाई सोमवार को होगी.
सरकार ने क्या कहा?
सरकार ने दलील दी कि उन्हें ऐसा कोई देश नहीं मिला जहां24 हफ्ते के बाद गर्भपात की इजाज़त हो.इसमें कहा गया है कि भारत में कुछ स्थितियों मेंक़ानून24 सप्ताह के बाद गर्भपात की अनुमति देता है, जबमां की जान बचाने की ज़रूरत हो या भ्रूण में पर्याप्त असामान्यता हो.
इस मामले में सरकार ने कहा था कि एम्स के मेडिकल बोर्ड ने कहा है कि बच्चा व्यवहार्य है और उसके बचने की उचित संभावना है.उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने विरोधाभासी बातें कही हैं और कभी-कभी "हमें लोगों को खुद से बचाने की ज़रूरत होती है."
याचिकाकर्ताओं ने क्या दी दलील?
गर्भवती महिला के वकील ने तर्क दिया कि उन्हें28 सितंबर को गर्भावस्था के बारे में पता चला और5 दिनों के भीतर वह इसे समाप्त करने के लिए अदालत में आईं. उन्होंने पिछले साल सितंबर में अपने दूसरे बच्चे को जन्म दिया था और तब से वह प्रसवोत्तर मनोविकृति से पीड़ित हैं.
“प्रसवोत्तर मनोविकृति के लिए वह जो दवाएँ ले रही हैं वह भ्रूण के लिए स्वस्थ नहीं है.गर्भावस्था के बारे में पता चलने के बाद से उन्होंने दवाएँ लेना बंद कर दिया है, लेकिन जब वह एक दिन भी दवा नहीं लेती हैं, तो उन्हें दैनिक गतिविधियाँ करने में परेशानी होती है.इस प्रकार, उन्हें अपने और बच्चे के स्वास्थ्य की ख़ातिर गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी जानी चाहिए.”
वकील ने यह भी कहा, "जन्म के बाद मां खाने, नहाने या किसी भी तरह से अपनी देखभाल करने में विफल हो सकती है. आत्महत्या का ख़तरा भी है."
हालाँकि, जब अदालत दस्तावेज़ों पर ग़ौर कर रही थी, तो उसे प्रसवोत्तर मनोविकृति के लिए उसके नुस्खे की वैधता पर संदेह हुआ.मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "इस बात का कोई संदर्भ नहीं है कि डॉक्टर किस चीज़ के लिए दवा लिख रहे हैं.हस्तलिखित नुस्खा भी कुछ नहीं कहता."
इस वजह सेकोर्ट ने एक आदेश पारित किया कि एम्स अधिक परीक्षण करेगा, आदर्श रूप से आज दोपहर2 बजे और सोमवार को मामले पर फिर से सुनवाई करेगी.
इसने डॉक्टरों से निम्नलिखित बातों पर ध्यान देने को कहा:
1. क्या भ्रूण किसी महत्वपूर्ण असामान्यता से पीड़ित है?
2. क्या याचिकाकर्ता की गर्भावस्था को पूरी अवधि तक जारी रखने से उन दवाओं से नुक़सान होगा जो वह अपनी स्थिति के लिए ले रही है?
3. याचिकाकर्ता की मानसिक और शारीरिक स्थिति क्या है?
नौ अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य बेंच ने गर्भपात की इजाज़त दे दी थी. हालाँकि, एक दिन बाद, एक डॉक्टर ने सरकारी वकील को ईमेल करके कहा कि उन्हें गर्भपात के लिए भ्रूण का हृदय रोकना होगा, अन्यथा यह समय से पहले प्रसव होगा और भ्रूण का स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाएगा.
तब सरकार ने कोर्ट के आदेश को वापस लेने की अर्ज़ी दाख़िल की. अब कोर्ट की तीन जजों की बेंच इस मामले की दोबारा सुनवाई कर रही है.