टाइटैनिक का मलबा देखने गई पनडुब्बी को खोजने के लिए उत्तरी अटलांटिक में खोज अभियान को तीन दिन से ज्यादा का समय हो गया है.
हर बीतते घंटे पनडुब्बी में मौजूद ऑक्सीजन की मात्रा कम हो रही है. रविवार को लापता हुई पनडुब्बी में अब महज तीस घंटों से भी कम की ऑक्सीजन बची है.
20 हज़ार वर्ग किलोमीटर से बड़े महासागर के क्षेत्र में यूएस कोस्ट, कनाडा की नौसेना, वायु सेना, कोस्ट गार्ड के साथ-साथ न्यूयॉर्क एयर नेशनल गार्ड भी मदद कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी है.
अमेरिकी कोस्ट गार्ड के मुताबिक समुद्र के नीचे से कुछ आवाजें जरूर सुनाई दी हैं, जो काफी अहम मानी जा रही हैं.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि यह खोज इतनी चुनौतीपूर्ण और मुश्किल क्यों बनी हुई है? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए बीबीसी ने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के मरीन इंजीनियरिंग के प्रोफेसर एलिस्टेयर ग्रेग से बात की है.
वे कहते हैं कि पानी के जरिए संचार करना हमेशा बहुत मुश्किल काम होता है. एक बार जब आप कम्युनिकेशन खो देते हैं तो उसे ढूंढना किसी चुनौती से कम नहीं है.
ग्रेग बताते हैं, "खोज अभियान को यह नहीं पता है कि उन्हें पनडुब्बी को अटलांटिक महासागर की सतह पर खोजना है या फिर समुद्र के तल में. यह दोनों जगह हो सकती है. पनडुब्बी के इन दोनों के बीच होने की संभावना बहुत कम है."
पनडुब्बी महासागर में कैप कॉड से करीब 900 मील दूर लापता हुई है, जहां समुद्र की गहराई करीब 13 हजार फीट है.
ग्रेग बताते हैं कि अगर पनडुब्बी समुद्र की सतह पर होगी तो उसे ढूंढना बहुत मुश्किल है, क्योंकि उसे ऐसे बनाया गया है कि वह तैरती रहे. इसके साथ ही पनडुब्बी के रंग के चलते उसे हवा से भी नहीं देखा सकता है.
प्रोफेसर कहते हैं कि अगर पनडुब्बी ने अपनी पॉवर खो दी होगी तो वह सिग्नल नहीं भेज पाएगी और ऐसे में उसका पता लगाना आसान काम नहीं है.
इसके अलावा एक सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि पनडुब्बी में बैठे यात्री खुद उससे बाहर नहीं आ सकते हैं, क्योंकि उन्हें अंदर बांधकर बिठाया जाता है, इसलिए वे उसके अंदर फंसे हुए हैं.
वे कहते हैं कि अगर पनडुब्बी समुद्र की सतह पर है तो उसे देखने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसका पता लगाने के लिए हमारे पास सोनर तकनीक है, जिसमें सिग्नल भेजकर किसी चीज का पता लगाया जा सकता है.
पनडुब्बी से टाइटैनिक का सफर
आठ दिन की इस यात्रा के लिए ढाई लाख डॉलर यानी 2 करोड़ रुपये से भी अधिक राशि की टिकट खरीदी जाती है. इस यात्रा के ज़रिए टाइटैनिक के मलबे को समुद्र में 3800 मीटर नीचे जाकर देखा जा सकता है.
ओशनगेट कंपनी के विज्ञापन के अनुसार, ये आठ दिनों की यात्रा साधारण ज़िंदगी से निकलने और कुछ असाधारण खोजने का मौका है.
इस छोटी पनडुब्बी में एक पायलट और तीन टिकट खरीदने वाले मेहमान यात्री होते हैं. उनके अलावा कंपनी के मुताबिक पनडुब्बी में एक एक्सपर्ट भी सवार होते हैं.
ये मिशन न्यूफ़ाउंडलैंड में सेंट जॉन्स से शुरू होता है.
कंपनी की वेबसाइट के अनुसार, उसके पास तीन पनडुब्बी हैं, जिनमें से केवल लापता होने वाले टाइटन में ही इतनी गहराई तक जाने की क्षमता है.
इस पनडुब्बी का वज़न 10 हज़ार 432 किलोग्राम है और वेबसाइट की मानें तो ये 13 हज़ार 100 फ़ुट की गहराई तक जा सकती है. पनडुब्बी में 96 घंटे का ऑक्सीजन सपोर्ट बचा है.
टाइटैनिक जहाज़ साल 1912 में न्यूयॉर्क की अपनी पहली यात्रा के दौरान डूब गया था. ये अपने समय में सबसे बड़ा ज़हाज़ था. इसमें मौजूद 2200 यात्रियों और क्रू के सदस्यों में से 1500 से अधिक मारे गए थे. इस जहाज़ का मलबा पहली बार 1985 में खोजा गया था.