दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल आज रामलीला मैदान में शक्ति प्रदर्शन करने जा रहे हैं.
ट्रांसफर पोस्टिंग वाले अध्यादेश के ख़िलाफ़ आज आम आदमी पार्टी दिल्ली में महारैली कर रही है.
केजरीवाल ने ट्वीट कर कहा, "दिल्ली की जनता के अधिकारों को छीनने वाले केंद्र सरकार के तानाशाही अध्यादेश के ख़िलाफ़ कल (11 जून) दिल्ली के लोग रामलीला मैदान में एकजुट होंगे. संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए हो रही इस महारैली में आप भी ज़रूर आएं."
काफी दिनों से आम आदमी पार्टी इस महारैली की तैयारी में लगी हुई है. रैली में आप पार्टी ने वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सासंद कपिल सिब्बल को भी आमंत्रित किया है.
रैली में दिल्ली सरकार के विधायकों और नेताओं के अलावा पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी हिस्सा लेंगे.
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला और अध्यादेश
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बीते 11 मई को दिल्ली सरकार के पक्ष में फ़ैसला सुनाते हुए कहा था कि अधिकारियों के ट्रांसफ़र और पोस्टिंग का अधिकार दिल्ली सरकार के पास होना चाहिए.
पीठ ने कहा कि दिल्ली में सभी प्रशासनिक मामलों में सुपरविज़न का अधिकार उपराज्यपाल के पास नहीं हो सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि दिल्ली की चुनी हुई सरकार के हर अधिकार में उपराज्यपाल का दखल नहीं हो सकता.
पीठ ने कहा, "अधिकारियों की पोस्टिंग और ट्रांसफ़र का अधिकार लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार के पास होता है."
केंद्र सरकार का अध्यादेश क्या कहता है?
इस अध्यादेश के तहत अधिकारियों की ट्रांसफ़र और पोस्टिंग से जुड़ा आख़िरी फैसला लेने का हक़ उपराज्यपाल को वापस दे दिया गया है.
सरकार, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) अध्यादेश, 2023 लेकर आई है. इसके तहत दिल्ली में सेवा दे रहे 'दानिक्स' कैडर के 'ग्रुप-ए' अधिकारियों के तबादले और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए 'राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण' गठित किया जाएगा.
दानिक्स यानी दिल्ली, अंडमान-निकोबार, लक्षद्वीप, दमन एंड दीव, दादरा एंड नागर हवेली सिविल सर्विसेस.
प्राधिकरण में कौन-कौन होगा?
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प्राधिकरण में तीन सदस्य होंगे.
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दिल्ली के मुख्यमंत्री
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दिल्ली के मुख्य सचिव
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दिल्ली के गृह प्रधान सचिव
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मुख्यमंत्री को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया है.
प्राधिकरण को सभी 'ग्रुप ए और दानिक्स के अधिकारियों के तबादले और नियुक्ति से जुड़े फैसले लेने का हक़ तो होगा लेकिन आख़िरी मुहर उपराज्यपाल की होगी.
यानी अगर उपराज्यपाल को प्राधिकरण का लिया फ़ैसला ठीक नहीं लगा तो वो उसे बदलाव के लिए वापस लौटा सकते हैं. फिर भी अगर मतभेद जारी रहता है तो अंतिम फ़ैसला उपराज्यपाल का ही होगा.