बीते कुछ दिनों से रामचरितमानस को लेकर हो रही बहस में अब एक और नाम जुड़ गया है. उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा है कि
रामचरितमानस बकवास है, इसके कुछ हिस्सों को बैन कर देना
चाहिए.
उनका कहना है कि इससे पिछड़े, दलित वर्गों की भावनाएं आहत हो रही हैं.
एक टेलीविज़न चैलन को दिए इंटरव्यू में स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा, “सभी धर्मों का हम सम्मान करते हैं. लेकिन अगर धर्म के नाम पर किसी वर्ग को अपमानित
करने के लिए कुछ कहा जाता है तो वो आपत्तिजनक है.”
“रामचरितमानस के कुछ अंश है जिस पर मुझे आपत्ति थी और आज फिर कह रहा हूं. किसी
भी धर्म में किसी को गाली देने का हक नहीं है. तुलसीदास की रामचरित मानस में एक
चौपाई है- जे बरनाधम तेली
कुम्हारा, स्वपच किरात कोल
कलवारा, ये सीधे-सीधे जाति का नाम लेकर उसे अधम
जाति का सर्टिफिकेट दिया गया है.”
“एक और चौपाई है- ‘ढोल
गंवार शूद्र पशु और नारी सब ताड़ना के अधिकारी’- इसमें शूद्र और महिलाओं को भी ताड़ना का अधिकारी बताया
गया है. इस पर आपत्ति करने पर धर्म के ठेकेदार ये कहने लग जाते हैं कि हमरा अर्थ उन्हें शिक्षा देने से है.”
मौर्य ने कहा कि “धर्म का वास्तविक अर्थ मानवता के कल्याण और उसकी मजबूती से है. अगर रामचरितमानस की किन्ही पंक्तियों के कारण समाज के एक वर्ग का जाति, वर्ण और वर्ग के आधार पर अपमान होता हो तो यह निश्चित रूप से धर्म नहीं बल्कि अधर्म है.“
“इससे इन जातियों के लाखों लोगों की भावनाएं आहत हो रही है. अगर तुलसीदास की रामचरितमानस पर वाद-विवाद करना किसी धर्म का अपमान है तो धार्मिक नेताओं को अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों और महिलाओं की चिंता क्यों नहीं होती? क्या यह वर्ग हिंदू नहीं है?“
उन्होंने कहा कि रामचरितमानस के आपत्तिजनक हिस्सों जिनसे जाति वर्ग और वर्ण के आधार पर समाज के एक हिस्से का अपमान होता है उन्हें प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए.
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अपर्णा यादव की प्रतिक्रिया
स्वामी प्रसाद के बयान पर बीजेपी नेता अपर्णा यादव ने प्रतिक्रिया दी है.
अपर्णा यादव ने कहा कि “शबरी के झूठे बेर खाकर राम ने जाति के बंधनों को तोड़ा और सतयुग में एक परम उदाहरण दिया. राम भारत का चरित्र है. राम किसी एक धर्म या मजहब के नहीं हैं. आज भी भारत में कहा जाता है बेटा हो तो राम जैसा हो. इस तरह का बयान अपनी राजनीति गर्म करने के लिए किसी ने भी दिया हो वह अपने खुद के चरित्र को दिखा रहे हैं.”
बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने हाल ही में रामचरित मानस को लेकर कहा था कि इससे समाज में नफ़रत फैल रही है.
चंद्रशेखर ने कहा था, ''मनुस्मृति को जलाने का काम क्यों किया गया? मनुस्मृति में एक बड़े तबके के ख़िलाफ़ यानी 85 प्रतिशत लोगों के ख़िलाफ़ गालियां दी गई हैं. रामचरितमानस का क्यों प्रतिरोध हुआ? किस अंश का प्रतिरोध हुआ? अधम जाति मैं बिद्या पाए, भयउँ जथा अहि दूध पिआए. यानी नीच जाति के लोगों को शिक्षा हासिल करने का अधिकार नहीं था.''
चंद्रशेखर ने कहा था, ''इसमें कहा गया है कि नीच जाति के लोग शिक्षा ग्रहण करके ज़हरीले हो जाते हैं, जैसे कि साँप दूध पीने के बाद होता है. इसी को कोट करके बाबा साहेब आंबेडकर ने बताया था कि ये ग्रंथ नफ़रत को बोने वाले हैं. एक युग मेंमनुस्मृति, दूसरे युग मेंरामचरितमानसऔर तीसरे युग में गुरु गोलवलर कीबंच ऑफ थॉट. ये हमारे देश और समाज को नफ़रत में बाँटती हैं.''
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