राजस्थान के मुख्यमंत्री
अशोक गहलोत ने शनिवार को कहा कि नौकरशाहों और न्यायाधीशों को देश के लिए काम करना
चाहिए ना कि उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद की चिंता करनी चाहिए.
मुख्यमंत्री ने कहा, ''कोई मुख्यमंत्री, एमएलए, एमपी या जज बनता
है तो कितना गर्व होता है कि हमें देश की सेवा करने का मौक़ा मिला है. ज़िंदगी कोई
एक हज़ार साल की नहीं होती है. ज़िंदगी का जो वक़्त मिला है, उसमें हम देश के लिए
कुछ करें. नौकरशाहों या न्यायाधीशों में अगर ये चिंता रहेगी कि रिटायरमेंट के बाद
क्या बनना है, क्या बन सकते हैं तो फिर कैसे काम चलेगा.''
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट
के पूर्व न्यायाधीश रंजन गोगोई के राज्यसभा सांसद के तौर पर नामांकन का भी ज़िक्र किया.
अशोक गहलोत ने कहा, ''चार सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने कहा कि लोकतंत्र ख़तरे
में है. हमने कहा बहुत बड़ी बात कह दी. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के साथ
क्या-क्या हो रहा है. बहुत चिंता का विषय बन गया. फिर उनमें से एक सीजेआई बन जाते हैं
मिस्टर गोगोई. बाद में फिर वही तरीक़ा जैसे पहले चल रहा था. मैंने राष्ट्रपति के
सामने पूछा कि गोगोई पहले ठीक थे या अब ठीक हैं. बाद में उनका संसद में नामांकन हो
गया.''
मुख्यमंत्री गहलोत ने ये बातें जयपुर में 18वें ऑल इंडिया लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के उद्घाटन समारोह में कहीं. इस मौक़े पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमन्ना और केंद्रीय क़ानून मंत्री किरन रिजीजू भी मौजूद थे.
सीएम ने वकीलों की महंगी फ़ीस का मसला भी उठाया और न्यायपालिका को निशाने पर लिया.
उन्होंने कहा, ''कोई ग़रीब आदमी सुप्रीम कोर्ट जा नहीं सकता. वकीलों की लाखों-करोड़ों फीस होती है. कुछ लोग कहते हैं कि ये (महंगी फ़ीस) कुछ वकीलों के लिए ही है. इसका लोग जवाब देते हैं कि अगर ये कुछ वकीलों के लिए है तो न्यायाधीश भी फेस वैल्यू देखकर फ़ैसला देते हैं. तो आदमी क्या करे. अमुक वकील को खड़ा करेंगे तब जाकर जज साहब प्रभावित होंगे.''
''हमें ये समझना पड़ेगा क्योंकि संविधान की रक्षा करना हमारा यानी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका कर्तव्य है. पर जिस तरह के हालात बनते जा रहे हैं, उसमें आपकी (न्यायपालिका) भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है.''
अशोक गहलोत ने कहा, ''देश के अंदर हालात बहुत गंभीर हैं. सरकारें बदल रही हैं- गोवा, मणिपुर, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र. क्या इस देश में लोकतंत्र है? मैं नहीं जानता कि मेरी सरकार कैसे बच गई. मैं आज आपके सामने नहीं होता. मेरी जगह आप कोई और मुख्यमंत्री देख रहे होते. अनिश्चितता की स्थिति थी.''
मुख्य न्यायाधीश ने लोकतंत्र और विपक्ष पर क्या कहा
मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन्ना ने भी इस दौरान लोकतंत्र और विपक्ष के लिए दुर्भावना को लेकर कई बातें कहीं. उन्होंने कहा कि राजनीतिक विरोध को 'दुश्मनी समझना' स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी नहीं है.
उन्होंने कहा, ''हमें ध्यान रखना चाहिए भारत संसदीय लोकतंत्र के लिए बना था ना कि संसदीय सरकार के लिए. लोकतंत्र का मूल विचार प्रतिनिधित्व है. किसानों ने प्रतिनिधित्व वाले लोकतंत्र को चुनने का फ़ैसला किया था जो प्रभावी प्रतिनिधित्व की बात करता है. वो जगह जहाँ बहुंसख्यक अल्पसंख्यकों पर हावी ना हों. ''
''एक आधुनिक लोकतंत्र में लोग अदालत से विधायी और कार्यकारी ज्यादतियों के सामने खड़ा होने की उम्मीद करते हैं. विपक्ष की अनुपस्थिति में ये बात गंभीर हो जाती है.''
विपक्ष की जगह को लेकर वो कहते हैं, ''विचार की भिन्नता राजनीति और समाज को समृद्ध करती है. राजनीतिक विरोध को शत्रुता की तरह नहीं देखना चाहिए, दुख की बात है जो हम आजकल देख रहे हैं. ये एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान नहीं है.''
''संसदीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए मजबूत विपक्ष की ज़रूरत होती है. दुर्भाग्य से विपक्ष के लिए जगह कम हो रही है. हम देख रहे हैं बिना विस्तृत विचार-विमर्श और जांच किए क़ानून पास हो रहे हैं.''