आरडी बर्मन: हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते मगर...
पंचम दा की धुनों में लगातार हवा, बारिश और धूप की जुगलबंदी सुनाई देती है. उनके संगीत की रेंज इतनी बड़ी और भव्य है कि वह कब-कहाँ आपको अपने आगोश में ले लेगा कहा नहीं जा सकता.
पंचम दा होते तो वे 27 जून को अपना 83वां जन्मदिन मना रहे होते.
आप 'चिंगारी कोई भड़के' या 'ओ मांझी रे अपना किनारा' सुनते हुए उदास हो सकते हैं और 'महबूबा महबूबा' या 'तुम क्या जानो मोहब्बत क्या है' में उनकी गूंजती-भारी आवाज़ के अनूठेपन में डूब सकते हैं. 'आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे' और 'हमें तुमसे प्यार कितना' जैसे उनके असंख्य गीत आपको गहरी रूमानियत में डुबो सकते हैं.
गुलज़ार की 1977 की फिल्म है 'किताब'. उसमें रात के धुंधलके में चलने वाली रेलगाड़ी का एक उम्रदराज़ खलासी हर रात एक बेनाम स्टेशन से गाड़ी के गुजरने का इंतज़ार करता है. उस स्टेशन का नीम-अंधेरा एक प्रौढ़ होती औरत की हंसी से रोशन होता है जो गाड़ी को लालटेन से हरा सिग्नल दिखाने का काम करती है.