कार्यकर्ताओं, डॉक्टरों, पोषण-विज्ञानी, अभिभावकों, वकीलों और शोधकर्ताओं के एक समूह ने हाल में खान-पान से जुड़ी आदतों को लेकर हुए विवाद और हमलों पर चिंता ज़ाहिर की है.
इस समूह ने मांस खाने को लेकर हुए हालिया विवाद, मीट बेचने को लेकर हुए हमलों और संबंधित दुकानों को बंद करने के लिए लागू किए गए क़ानून को लेकर अपनी चिंता ज़ाहिर की है.
इस समूह का दावा है कि खाने-पीने को लेकर लोगों की पसंद और उनकी आजीविका में हस्तक्षेप के गंभीर सामाजिक, आर्थिक और सेहत संबंधी परिणाम हो सकते हैं.
यह पत्र ऐसे समय में सामने आया है
जबकि दो दिन पहले ही, तीन मई को मध्य प्रदेश में गोहत्या के
आरोप में उग्र भीड़ ने आदिवासियों के एक गाँव पर हमला बोल दिया था. इस हमले में दो
लोगों की मौत हो गई जबकि एक अन्य शख़्स गंभीर रूप से घायल भी हुआ है.
इससे पहले अप्रैल महीने की शुरुआत में, हिंदुओं के पर्व नवरात्रि के दौरान दक्षिणी दिल्ली में मीट
की दुकानों को बंद करने का आदेश जारी किया गया था.
पत्र में कहा गया है कि अगर भारत में लोगों के पोषण के आधार पर बात करें तो जानवरों का मांस भारत के लोगों की पोषण संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने का एक अहम साधन है.
मौजूदा केंद्र सरकार, इससे जुड़ी दूसरी शाखाएं-दल, संबंधित मीडिया, न्यायपालिका और पुलिस इस प्रमुख पोषक खाद्य को आम लोगों की थाली से दूर करने के लिए प्रतिबद्ध नज़र आती है.
इस समूह ने चिंता जताते हुए कहा कि इस तरह की कार्रवाई के कई मायनों में प्रतिकूल प्रभाव हो सकते हैं.
मीट की दुकानों पर प्रतिबंध की मांग अब देशव्यापी होती जा रही है. एक अप्रैल 2022 को उत्तर प्रदेश में नवरात्रि के दौरान, पूरे नौ दिन के लिए मीट की दुकानों को बंद रखने की मांग की गयी. साथ ही यह धमकी भी दी गयी कि जो इस आदेश का पालन नहीं करेगा, उसकी दुकान को बुलडोज़र से तोड़ डाला जाएगा.
बीजेपी सासित योगी आदित्यनाथ की सरकार वाले उत्तर प्रदेश में पहले दिन से मीट की दुकानों पर हमले होते रहे हैं, झारखंड और कर्नाटक में भी ऐसे मामले सुनने में आते रहे हैं लेकिन हाल के हफ़्तों में इस तरह की घटनाएं तेज़ी से बढ़ रही है. देश के दूसरे हिस्सों से भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं.
मीट और मीट बेचने वालों को गंदगी, बीमारी और अस्वच्छता से जोड़कर देखा जाता है और इसीलिए इससे जुड़ी दुर्भावना लोगों को बहुत जल्दी प्रबावित करती है, ख़ासतौर पर एक विशिष्ट वर्ग को और समुदाय को. ऐसे में जब मीट खाने वालों और बेचने वालों के साथ जब मॉब लिंचिंग, हिंसा, दुकानों को नष्ट करने और दुकानदार को प्रताड़ित करने जैसी किसी घटना को अंजाम दिया जाता है तो उसे ‘स्वच्छता’ का नाम दे दिया जाता है. हमला करने वाले इस स्वच्छता अभियान के तौर पर जताते हैं.
मीट पर प्रतिबंध लगाने की मांग या दुकानों को बंद किये जाने का असर लगभग हर वर्ग पर ही होता है लेकिन इससे सबसे अधिक वह वर्ग प्रभावित होता है जो पहले से आर्थिक स्तर पर पिछड़ा हुआ है. कई राज्यों में मवेशियों को मारे जाने को लेकर कड़े प्रतिबंध लगा दिये गए हैं और इसे अवैध करार दिया गया है, जिससे एक वर्ग के लिए संकट गहराता जा रहा है.
मांस खाने को लेकर और बेचने को लेकर सरकार और उससे जुड़ी संस्थाओं के हस्तक्षेप को लेकर 102 लोगों के इस समूह ने अपनी चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा है कि यह हस्तक्षेप नागरिकों के भोजन और पोषण के अधिकार पर हमला है. इस समूह में ज्यां ड्रेज़, सेंटर फ़ॉर हिस्टोरिकल स्टडीज़(जेएनयू) की रिटायर्ड प्रोफ़ेसर जानकी नायर, आईआईटी बॉम्बे के न्यूट्रीशन रिसर्चर डी पार्थासारथी, यूनिवर्सिटी ऑफ़ हैदराबाद के देशदीप धनकर, एडवोकेट अवनी चोकसी जैसे कई नाम शामिल हैं.
102 लोगों के इस समूह के अलावा पांच संस्थाओं ने भी इस पत्र को अपना समर्थन दिया है.