क्या गैस-तेल की ज़रूरत ख़त्म कर देगी परमाणु ऊर्जा? चीन होड़ में सबसे आगे

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ईंधन इस्तेमाल करने के मामले में दुनिया दोराहे पर खड़ी है. जलवायु परिवर्तन के इस दौर में जीवाश्म ईंधन का धड़ल्ले से इस्तेमाल अब मुश्किल होता जा रहा है. धरती गर्म हो रही है और लगता नहीं है कि दुनिया कार्बन उत्सर्जन में कमी का लक्ष्य हासिल कर सकेगी.
ऊर्जा का ये संकट रूस-यूक्रेन युद्ध से और उजागर हो गया. रूसी गैस पर यूरोप किस क़दर निर्भर है, यह भी ज़ाहिर हो गया.
शायद इसलिए फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रों ने कहा कि न्यूक्लियर रेनेसां यानी परमाणु पुनर्जागरण का समय आ गया है.
मैक्रों ने पांच साल पहल परमाणु बिजली उत्पादन एक तिहाई घटाने का एलान किया था. फ्रांस के साथ कई और देशों ने भी फुकुशिमा दुर्घटना को देखते हुए ऐसा ही इरादा जताया था लेकिन इन दिनों एटॉमिक एनर्जी के प्रति दुनिया में नजरिया बदलता नज़र आ रहा है. खास कर गैस के बढ़ते दामों की वजह से.
रूस-यूक्रेन युद्ध से पैदा ऊर्जा समस्या ने तो इस ओर भी सोचने को मजबूर कर दिया है.
न्यूक्लियर साइंस और टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ अलफ़र्दो गार्सिया का कहना है यह दुर्भाग्य है कि हमें एक युद्ध से पता चल रहा है कि अब हम जीवाश्म ईंधन पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं रह सकते.
जीवाश्म ईंधन से दुनिया का दो तिहाई बिजली और ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होता है. लेकिन जीवाश्म ईंधन से 2018 में वायु प्रदूषण से अस्सी लाख लोग मारे गए गए थे. ये आंकड़े हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के अध्ययन के हैं.















