यूक्रेन संकट के बीच तुर्की, रूस और यूक्रेन दोनों देशों से अपना सामंजस्य बैठाए हुए है. ऐसे में इसके कुछ नतीजे भी दिखने लगे हैं.
गुरुवार दोपहर को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप्प आर्दोअन को फ़ोन किया और उन्होंने बताया कि यूक्रेन के साथ शांति समझौते के लिए रूस की वास्तविक मांगें क्या-क्या हैं.
बीबीसी के वर्ल्ड अफ़ेयर्स एडिटर जॉन सिंपसन ने इस फ़ोन कॉल के कुछ ही मिनटों बाद तुर्की के राष्ट्रपति के प्रवक्ता और सलाहकार इब्राहिम कलिन का इंटरव्यू किया.
कलिन के मुताबिक़, रूस की मांगें दो कैटेगरी में आती हैं. शुरुआती चार मांगें ऐसी हैं जो यूक्रेन के लिए पूरा कर पाना मुश्किल नहीं हैं.
इन मांगों में से एक है कि यूक्रेन ये स्वीकार करे कि वो न्यूट्रल रहेगा और नेटो ज्वाइन नहीं करेगा. ये ऐसी मांग है जिसपर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की पहले ही बोल चुके हैं.
इस कैटेगरी में जो अन्य मांगें हैं जो रूस के लिए चेहरा बचाने वाली चीज़ दिखती है.
ये मांगें हैं कि यूक्रेन को निरस्त्रीकरण प्रक्रिया को सुनिश्चित करना होगा, जिससे ये साबित हो कि वो रूस के लिए ख़तरा नहीं है.
यूक्रेन में रूसी भाषा के लिए सुरक्षा होनी चाहिए और ''डि-नाज़िफिकेशन'' की भी बात है.
ये मांग ज़ेलेंस्की को परेशान करने वाली है, वो ज़ेलेंस्की जो खुद यहूदी हैं और उनके कुछ रिश्तेदारों की होलोकास्ट में मौत हो गई थी, लेकिन तुर्की का मानना है कि ज़ेलेंस्की के लिए इसको स्वीकार करना मुश्किल नहीं होगा.
शायद, यूक्रेन के लिए ये पर्याप्त होगा कि वो नव-नाज़ीवाद की निंदा करे और उसपर नकेल कसने का वादा करे.
दूसरी कैटेगरी ऐसे मांगों की है जिसमें यूक्रेन को दिक्कतें आएंगी. कलिन ने इसके बारे में खुलकर नहीं बताया उन्होंने कहा कि इस मांग में पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र की स्थिति शामिल है.
पूर्वी यूक्रेन के कुछ इलाक़ों पर रूस पहले से ही दावा ठोक चुका है. साथ ही क्राइमिया की स्थिति पर भी उसका जोर है. दूसरी, बात ये है कि रूस मांग करेगा कि क्राइमिया को यूक्रेन औपचारिक तौर पर स्वीकार करे, जिसपर 2014 में रूस ने क़ब्ज़ा कर लिया था.