दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद को ख़त्म करने में अहम भूमिका निभाने
वाले और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आर्कबिशप डेसमंड टूटू का 90 साल की आयु में निधन
हो गया है.
दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने कहा कि डेसमंड टूटू की मौत
"दक्षिण अफ्रीका के शानदार लोगों की एक पूरी पीढ़ी के प्रति शोक का एक और अध्याय" है.
उन्होंने कहा कि "मुक्त दक्षिण
अफ्रीका" बनाने में मुख्य पादरी डेसमंड टूटू का बड़ा योगदान था.
राष्ट्रपति रामफोसा ने डेसमंड टूटू को "एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक नेता, रंगभेद विरोधी कार्यकर्ता और मानवाधिकार का वैश्विक प्रचारक" क़रार दिया है और कहा है कि वो देश और दुनिया में दक्षिण अफ्रीका की सबसे मशहूर शख़्सियतों में शामिल रहे हैं.
उन्हों टूटू को बेजोड़ देशभक्त, सिद्धांत वाले और व्यावहारिक नेता बताया है, जिन्होंने बाइबल की उस भावना को एक अर्थ दिया कि बिना काम के धर्म का कोई मतलब नहीं होता.
डेसमंड टूटू की मौत दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद-शासन के अंतिम राष्ट्रपति रहे एफडब्ल्यू डी क्लार्क की मौत के कुछ ही सप्ताह बाद हुई है. क्लार्क का 85 साल की आयु में इस साल 11 नवंबर को निधन हो गया था.
डेसमंड टूटू दुनिया में रंगभेद विरोध के प्रतीक रहे नेल्सन मंडेला के समकालीन थे. वो नस्ल आधारित भेदभाव और अलगाव की नीति ख़त्म करने के आंदोलन के पीछे की मुख्य प्रेरक शक्तियों में शामिल थे.
दक्षिण अफ़्रीका की अंतरात्मा कहलाने वाले डेसमंड टूटू उस दौर में देश की मुखर आवाज़ थे जब 1948 से 1991 के बीच दक्षिण अफ़्रीका में अल्पसंख्यक श्वेत लोगों का शासन था.
गोरे शासक वहां की काली बहुसंख्यक जनता के ख़िलाफ़ नस्ल के आधार पर बांटने वाली भेदभाव पूर्ण नीति लागू करते रहे. डेसमंड टूटू ने ऐसी नीति का जमकर विरोध किया. उन दिनों से लेकर अब तक कई क्षेत्रीय झड़पों में वो मिलाप का स्वर बने.
अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी की वजह से आर्कबिशप डेसमंड टूटू को दक्षिण अफ़्रीका की नैतिक धुरी के तौर पर देखा जाता है. वो देश और दुनिया में दक्षिण अफ्रीका की सबसे मशहूर शख़्सियतों में शामिल रहे.
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित
रंगभेद व्यवस्था ख़त्म करने में उनके संघर्ष को देखते हुए उन्हें 1984 में नोबेल शांति पुरस्कार से नवाज़ा गया.
1970 के दशक में एक युवा पादरी के तौर पर वो दक्षिण अफ़्रीका की रंगभेदी सरकार के प्रखर आलोचकों में से एक थे. 1980 के दशक के मध्य में जब दक्षिण अफ़्रीका में अल्पसंख्यक श्वेत शासन कर रहे थे, उस दौरान टूटू उनके ख़िलाफ़ छोटे शहरों मे जाकर प्रचार करते थे.
लेकिन जब एक बार भीड़ ने एक ऐसे पुलिसवाले को जलाने का प्रयास किया जिस पर संदेह था कि वो गुप्त तौर पर पुलिस का काम कर रहा था तो उस ग़ुस्साई हुई भीड़ के बीच में घुसकर टूटू ने उसका बचाव किया.
1986 में डेसमंड टूटू केप टाउन के आर्कबिशप बने और क़रीब इसके एक दशक बाद उन्होंने उस 'ट्रुथ एंड रिकंशिलिएशन कमीशन' की अध्यक्षता की जिसे रंगभेद सरकार के समय हुए अपराधों की जाँच करने के लिए गठित किया गया था.