कच्चे माल की कमी
के चलते मौजूदा सीज़न में जूट उद्योग को क़रीब 1,500 करोड़ रुपये का नुक़सान हो चुका
है.
समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया ने जूट उद्योग से जुड़े लोगों के हवाले से रविवार को बताया कि इस सीज़न में पर्याप्त माल न मिलने की वजह से 4.81 लाख गांठ
(एक गांठ में 500 बोरी) जूट की बोरियों की आपूर्ति नहीं हो पाई. इस चलते अब अनाज रखने
के लिए प्लास्टिक की बोरियों का इस्तेमाल हो रहा है.
जूट के प्रमुख उत्पादक
राज्य पश्चिम बंगाल में केंद्र और राज्य सरकार की मदद के बावजूद यह कमी हुई है.
असल में बाज़ार में
कच्चे जूट की कमी को लेकर अराजक सी स्थिति बनी हुई है. इस समय बाज़ार में कच्चे माल
की जो क़ीमत है वो जूट के मिलों के लिए तय क़ीमत से कहीं ज़्यादा है. इस चलते मिलों
को पर्याप्त कच्चा माल मिल नहीं पा रहा.
पीटीआई ने सूत्रों के हवाले से लिखा है, "नवंबर और दिसंबर में 4.8 लाख गांठ जूट की बोरियों की आपूर्ति कम रही. मिल मालिक इतना उत्पादन नहीं कर सके. अनुमान है कि इससे 1,500 करोड़ रुपये का नुक़सान हो गया."
जूट मिलों को नवंबर में 2.50 लाख गांठ और दिसंबर में 2.31 लाख गांठ जूट की बोरियों की आपूर्ति करनी थी.
सरकारें 12 हज़ार करोड़ के जूट बैग ख़रीदती हैं
मालूम हो कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने नवंबर में 2021-22 सीज़न के दौरान पैकिंग में जूट की बोरियों के ज़रूरी उपयोग के नियमों को मंज़ूरी दी थी. इन नियमों के तहत, अनाजों की पैकिंग में जूट की बोरियों का शत-प्रतिशत उपयोग किया जाएगा, जबकि 20 प्रतिशत चीनी जूट की बोरियों में पैक होगी.
मालूम हो कि केंद्र और राज्य सरकारों की संस्थाओं द्वारा हर साल क़रीब 12,000 करोड़ रुपये की जूट की बोरियों की ख़रीद होती है. इस समय बोरियों की एक गांठ की क़ीमत क़रीब 31,000 रुपये है.
इस बारे में नाम न छापने की शर्त पर एक उत्पादक ने कहा, "प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने हमारी पूरी मदद की, लेकिन कच्चे जूट की क़ीमत को लेकर समस्या है."
"इस समय कच्चे जूट का बाज़ार मूल्य लगभग 7,200 रुपये प्रति क्विंटल है, पर जूट आयुक्त ने मिलों के लिए इसकी अधिकतम क़ीमत 6,500 रुपये प्रति क्विंटल तय की है. इसलिए हम तय क़ीमत पर कच्चा माल नहीं खरीद पा रहे हैं. इससे जूट की बोरियों के उत्पादन और आपूर्ति में बाधा आई है.''