किसानों की मौत पर पीएम मोदी की ख़ामोशी, राहुल गांधी ने उठाए सवाल
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए कहा कि वो 'किसानों और भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याओं' और 'बढ़ती कीमतों' पर खामोश बने हुए हैं लेकिन जब उनकी या उनके दोस्तों की आलोचना की जाती है तो वे 'उग्र' हो जाते हैं.
लाइव कवरेज
लखीमपुर खीरी को हिन्दू बनाम सिख बनाने की कोशिश की गई: वरुण गाँधी
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उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा को लेकर बीजेपी के भीतर भी विवाद बढ़ता दिख रहा है.
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से लोकसभा सांसद वरुण गाँधी अपनी ही पार्टी की सरकार को इस मुद्दे पर लगातार घेरते दिख रहे हैं.
शुक्रवार को इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में बीजेपी प्रमुख जेपी नड्डा ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि उन्होंने वरुण गाँधी को बुलाकर बात की थी. नड्डा ने ये भी कहा था कि अब इस मामले सब कुछ ठीक हो जाएगा. लेकिन रविवार को वरुण गाँधी ने एक और ट्वीट किया, जिससे पता चलता है कि सब कुछ ठीक नहीं हुआ है.
अपने ट्वीट में वरुण गाँधी ने लिखा है, "लखीमपुर खीरी की घटना को हिंदू बनाम सिख की लड़ाई में तब्दील करने की कोशिश हो रही है. ये न सिर्फ़ अनैतिक है बल्कि झूठ भी है. ऐसा करना ख़तरनाक है और उन जख़्मों को कुरेदने जैसा है, जिन्हें ठीक होने में पीढ़ियाँ लगीं. हमें तुच्छ राजनीति को राष्ट्रीय एकता के ऊपर नहीं रखना चाहिए."
द ग्रेट गेम: जब ब्रिटेन को ये डर सताने लगा कि रूस उससे भारत न छीन ले
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यह उन्नीसवीं सदी के शुरुआत की बात है. युवा ब्रितानी अधिकारियों की एक टीम ख़ुफ़िया मिशन के तहत सिंधु नदी में पानी के बहाव, उसकी गहराई और उसमें शिपिंग की संभावनाओं के बारे में जानकारी एकत्र कर रही थी.
उनकी पूरी कोशिश थी कि सिंध के गवर्नरों और पंजाब में रणजीत सिंह की सरकार को किसी भी तरह से इस मिशन की ख़बर न लगे. लंदन में, सिंधु नदी को ब्रिटेन के हित के लिए एक व्यापारिक जलमार्ग में बदलने का निर्णय लिया जा चुका था.
एक वरिष्ठ ब्रितानी अधिकारी के अनुसार, "सिंधु नदी को टेम्स नदी में बदला जाना था." सिंधु नदी पर मुख्य बंदरगाह बनाने के लिए मिट्ठनकोट नामक क्षेत्र को चुना गया था.
ये वह समय था जब ब्रिटेन ने 'सोने की चिड़िया' कहे जाने वाले भारत में अपनी उपस्थिति मज़बूत कर ली थी और अब उसे ख़तरा था, कि कहीं रूस उससे भारत को न छीन ले. रूस और ब्रिटेन के बीच पहले से ही इस क्षेत्र में वर्चस्व का संघर्ष चल रहा था.
ताइवान की राष्ट्रपति बोलीं- चीन के दबाव के आगे घुटने नहीं टेकेंगे
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ताइवान की
राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने चीन की बढ़ती आक्रामकता पर अपने लोकतंत्र का बचाव करते
हुए कहा है कि कोई भी ताइवान को चीन के तय किये गए रास्ते को स्वीकार करने के लिए
मजबूर नहीं कर सकता है.
उन्होंने कहा कि ताइवान को कोई भी ऐसे रास्ते पर जाने के लिए मजबूर नहीं कर
सकता है जो ना तो स्वतंत्रता प्रदान करता है और ना ही लोकतंत्र.
बीजिंग हमेशा से ताइवान को अपना अभिन्न अंग बताता रहा है और दुनिया के अधिकतर देशों ने ताइवान को मान्यता नहीं दी है.
लेकिन हाल ही में चीन की सेना पीपल्स लिबरेशन आर्मी यानी
पीएलए ने अक्टूबर महीने के पहले चार दिनों में रिकॉर्ड रूप से लड़ाकू विमानों को ताइवान के हवाई क्षेत्र
में भेजा था. जिसके बाद से ताइवान पर राजनीतिक और सैन्य दबाव बढ़ता दिख रहा है.
चीन के लड़ाकू
विमानों के ताइवान के हवाई क्षेत्र में अतिक्रमण करने को चीन में जहां ताक़त के
प्रदर्शन के रूप में देखा गया वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे लेकर चिंता ज़ाहिर
की गई.
हालांकि शनिवार को चीन
के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा था कि वह शांतिपूर्ण तरीक़े से ताइवान को चीन में शामिल करेंगे.
उनकी इस कोशिश पर
ताइवान की ओर से कोई बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली थी.
'ताइवान का भविष्य ताइवान के लोग तय करेंगे'
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इमेज कैप्शन, ताइवान खुद को एक स्वतंत्र देश मानता है लेकिन चीन उसे अपने भूभाग का हिस्सा बताता है
ताइवान ने अपने एक बयान में स्पष्ट किया था कि ताइवान का भविष्य क्या होगा यह ताइवान के लोग ही तय करेंगे.
नेशनल डे रैली को संबोधित करते हुए वेन ने कहा कि वह ताइवान-स्ट्रेट (जलडमरू) में तनाव कम होने की उम्मीद करती हैं.
उन्होंने एक बार फिर अपने पुराने बयान को दोहराते हुए कहा कि ताइवान कोई भी जल्दबाज़ी नहीं करेगा.
सेंट्रल ताइपे में राष्ट्रपति कार्यालय के बाहर अपने एक संबोधन में उन्होंने कहा कि किसी को भी यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि ताइवान के लोग किसी दबाव के आगे झुक जाएंगे.
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उन्होंने कहा, "हम अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को मज़बूत करना जारी रखेंगे और अपने दृढ़ संकल्प को साबित करके दिखाएंगे कि कोई भी हो, वे हमें चीन के रास्ते का अनुसरण करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता."
उन्होंने अपने संबोधन में आगे कहा, "ऐसा इसलिए क्योंकि चीन ने जो रास्ता तय किया है वह न तो ताइवान को स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक तरीक़ा प्रदान करता है और ना ही 2.3 करोड़ लोगों को संप्रभुता देता है."
चीन दावा करता है कि ताइवान उसका एक प्रांत है और उसे अपने नियंत्रण में लेने के लिए प्रतिबद्ध है.
चीन का कहना है कि अगर ख़ुद में मिलाने के लिए ताक़त का भी इस्तेमाल करना पड़ा तो किया जाएगा. चीन ताइवान में राष्ट्रपति साई इंग-वेन की सरकार को अलगाववादी मानता है.
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पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम के जनक की मौत पर भारत का ज़िक्र क्यों?
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पाकिस्तान के
परमाणु वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुल क़दीर ख़ान का रविवार सुबह 85 साल की उम्र में निधन हो गया.
डॉक्टर ख़ान को पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का जनक भी कहा जाता है.
पिछले महीने
के दूसरे हफ़्ते में उन्होंने अपने इलाज में पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार पर
उपेक्षा का आरोप लगाया था.
पाकिस्तान में डॉ. अब्दुल क़दीर ख़ान को पाकिस्तान के ‘ताज’ के तौर पर याद किया जा रहा है.
पाकिस्तान में ट्विटर के पांच टॉप ट्रेंड (#DrAbdulQadeerKhan, May Allah, Jannah, #AQKhan, Rest In Peace) जो छाए हैं, उन्हीं को याद करते हुए हैं.
डॉक्टर क़दीर ख़ान को
पाकिस्तान में 'मोहसिन-ए-पाकिस्तान' यानी पाकिस्तान का रक्षक भी कहा जाता है.
पाकिस्तान के मेहरबान शेख़ ने ट्विटर पर लिखा है- आप हमारे दिलों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे.
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सईद अहमद ने
ट्विटर पर लिखा है- एक सच्चा पाकिस्तानी, जिससे शायद ही कोई नफ़रत रने वाला हो. आज
हमें छोड़कर चला गया.
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शफ़क़त नाम
के एक यूज़र ने लिखा है- दिन में ही
सूरज ढल गया.
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हालांकि एक
ओर जहां पाकिस्तान अपने क़ाबिल वैज्ञानिक को याद करते हुए दुखी है वहीं कुछ लोगों
ने उन्हें याद करते हुए भी भारत का ज़िक्र किया है.
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सफ़ा अख़्तर लिखती हैं- 1.3 अरब भारतीयों के सामने अगर 2.1 करोड़ पाकिस्तानी गर्व महसूस करते हैं, तो यह केवल इस हीरो की वजह से है.
भारत और अमेरिका के रिश्ते पर चीनी मीडिया का यह तंज़
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चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी का मुखपत्र माने जाने वाला अंग्रेज़ी दैनिक ग्लोबल टाइम्स ने भारत और अमेरिका के रिश्ते पर जमकर निशाना साधा है.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''जब कोई बात भारत
के संदर्भ में होती है तो अमेरिकी अधिकारी अपने एजेंडों के लिए अक्सर एक शब्द का
इस्तेमाल करते है- “एक जैसे विचार रखने वाले.”
अख़बार के अनुसार, अमेरिका की उप विदेश मंत्री
वेंडी शर्मन ने ठीक वैसा ही किया है. अपनी भारत यात्रा के दौरान इंडिया आइडियाज़
सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुँची शरमन ने कहा, “जहाँ कहीं भी
ज़रूरत महसूस होगी हम चीन को चुनौती देंगे, जहाँ बात हमारे और हमारे सहयोगियों के
हितों की आएगी हम चीन को चुनौती देंगे और जहाँ कहीं भी नियमों पर आधारित
अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था प्रभावित होगी, हम चुनौती देंगे.”
शरमन ने अपने इस
संबोधन में यह ज़ोर देकर कहा कि भारत और अमेरिका इन मुद्दों पर साझा विचार रखते
हैं.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''ज़ाहिर तौर शर्मन
अपने बयानों से भारत को तसल्ली देने की कोशिश कर रही थीं. क्योंकि पिछले ही महीने
अमेरिका ने भारत को एक किनारे करते हुए ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के साथ एक
त्रिकोणीय सुरक्षा साझेदारी की है.''
''अमेरिका की नज़रों में उसके हर सहयोगी देश का एक
स्तर तय है. सभी के लिए उसके मानदंड अलग हैं. देखने पर ऐसा लगता है कि अंग्रेज़ी
बोलने वाले मुल्क उसके सच्चे और सबसे निकटस्थ सहयोगी हैं. जैसे ब्रिटेन और
ऑस्ट्रेलिया. जापान और यूरोप भी कहीं ना कहीं उसके लिए मायने रखते हैं लेकिन जहाँ तक बात है भारत की तो भारत उनके लिए सिर्फ़ एक चीन विरोधी सीमा से अधिक कुछ नहीं
है. अमेरिका सच्चे तौर पर भारत पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं करता है. और ना ही वह
भारत के हितों की कोई परवाह करेगा.''
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ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''भारत ने पिछले कुछ दिनों में चीन-अमेरिका संबंधों में नरमी के संकेत देखे होंगे. यूएस ट्रेड रीप्रेसेंटेटिव कैथरीन ताय ने कहा कि आने वाले समय में अमेरिका व्यापार के मसलों पर चीन के साथ स्पष्ट बातचीत करेगा.''
''उसके बाद सीपीसी सेंट्रल कमिटी के पॉलिटिकल ब्यूरो के सदस्य और ऑफ़िस ऑफ़ द सेंट्रल कमिशन फॉर फ़ॉरेन अफ़ेयर्स के डायरेक्टर यांग जिएची की अमेरिका नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र जेक सुलिवन से ज्यूरिख़ में हुई मुलाक़ात को भी काफी सार्थक बताया जा रहा है. जैसे-जैसे बाइडन प्रशासन की नीति चीन के प्रति व्यावहारिक औऱ सैद्धांतिक होती जा रही है, भारत की स्थिति उतनी ही शर्मनाक होती जा रही है.''
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स में छपे इस लेख में अप्रैल महीने की एक घटना का भी ज़िक्र किया गया है.
इसके मुताबिक़, अप्रैल महीने में अमेरिकी नौसेना ने भारत से बिना सहमति के अनुरोध के ही भारत के एक्ज़ीक्यूटिव इकोनॉमिक ज़ोन में प्रवेश किया.
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अख़बार ने लिखा है, ''ये वो दौर था जब भारत कोरोना महामारी के विकराल स्वरूप से जूझ रहा था लेकिन अमेरिका ने भारत का सहयोगी होने के बावजूद उसको कच्चे माल का निर्यात बंद कर दिया.''
ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक़, रणनीतिक रूप से चीन को चुनौती के रूप में देखने के अलावा दोनों देश लोकतंत्रात्मक प्रणाली के आधार पर एक-दूसरे को एक जैसा बताते हैं लेकिन क्या अमेरिका वास्तव में भारत के लोकतंत्र और मानवाधिकार के प्रति व्यवहार का समर्थन करता है?
मार्च में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने मानवाधिकार हितों के आधार पर एक रिपोर्ट जारी की थी. जिसमें उसने भारत पर मानवाधिकारों के हनन को लेकर उसकी आलोचना की थी. चीन अख़बार ने लिखा है, ''इसके अलावा जुलाई महीने में भारत यात्रा के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भारत को लोकतंत्र के मूल्यों से पीछे नहीं हटने को लेकर चेतावनी दी थी.''
अमेरिका से बराबरी पर बातचीत होनी चाहिए: तालिबान
तालिबान से अमेरिका ने शुरू की वार्ता, जानिए क्या हुई बात
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इसी साल अगस्त महीने
में अमेरिकी सैनिकों की अफ़ग़ानिस्तान से वापसी के साथ ही तालिबान ने देश को अपने
नियंत्रण में ले लिया था. कुछ दिनों बाद ही वहाँ अपनी सरकार की घोषणा
भी कर दी थी.
इस पूरे घटनाक्रम
के बाद बीते दिन पहली बार अमेरिका और तालिबान ने आमने-सामने बैठकर बात की. अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण के बाद अमेरिकी अधिकारियों और तालिबान के प्रतिनिधियों के बीच यह पहली
मुलाक़ात थी.
अमेरिका और तालिबान के अधिकारियों
के अनुसार, अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के उप-निदेशक की अध्यक्षता वाले एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल
ने क़तर की राजधानी दोहा में तालिबान के अधिकारियों से शनिवार को बात की.
अमेरिकी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट
के अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि बातचीत में विदेशी नागरिकों की
सुरक्षित वापसी, तालिबान की सरकार को समावेशी बनाने और महिला अधिकारों के सम्मान जैसे मुद्दों पर
बात हुई. यह बातचीत रविवार को भी जारी रहेगी.
वॉशिंगटन पोस्ट से अमेरिकी
विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि यह बैठक तालिबान
को मान्यता देने को लेकर नहीं थी. उस अधिकारी ने कहा कि तालिबान को मान्यता उसके किए
पर मिलेगा और अभी उसने ऐसा कुछ किया नहीं है. तालिबान के प्रतिनिधिमंडल की अध्यक्षता
विदेश मंत्री आमिर ख़ान मुत्ताक़ी कर रहे हैं.
टीआरटी वर्ल्ड की
ख़बर अनुसार, तालिबान ने इस बैठक में कहा कि अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा तालिबान
सरकार को अस्थिर करने की कोशिश ना की जाए.
टीआरटी के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान की
अंतरिम सरकार में विदेश मंत्री आमिर ख़ान मुत्तक़ी ने कहा कि अमेरिका सरकार को
अस्थिर करने की कोशिश ना करे.
मुत्तक़ी का यह
बयान ऐसे समय में आया है जब 20 सालों तक चले युद्ध के बाद अमेरिकी सेना
अफ़ग़ानिस्तान से वापसी कर चुकी है.
कतर की राजधानी दोहा
में इस बैठक के बाद मुत्तक़ी ने अफ़ग़ानिस्तान के सरकारी न्यूज़ एजेंसी बख़्तर से
कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करना किसी के लिए भी अच्छा
नहीं है.
न्यूज़ एजेंसी को दिए
अपने बयान में उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान के
साथ अच्छे संबंध रखने में सभी की भलाई है.
एक रिकॉर्डेड
बयान में उन्होंने कहा, “अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा सरकार को कमज़ोर करने की कुछ
भी ऐसा नहीं किया जाना चाहिए, जिससे लोगों को परेशानी हो."
तालिबान सरकार के
विदेश मंत्री मुत्तक़ी का यह बयान दोहा में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के डिप्टी स्पेशल
रीप्रेज़ेटेटिव टॉम वेस्ट और शीर्ष यूएसएआईडी अधिकारी साराह चार्ल्स के साथ होने
वाली दो दिनों की बैठक के पहले दिन आया है.
अमेरिकी
अधिकारियों ने बैठक के दौरान तालिबान से आतंकवादी समूहों को रोकने, अमेरिकी
नागरिकों को निकालने और मानवीय सहायता जैसे मुद्दों पर चर्चा की.
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उन्होंने कहा कि अमेरिका कोरोना महामारी के ख़िलाफ़ टीकाकरण अभियान में अफ़ग़ानिस्तान की मदद करेगा.
तालिबान सरकार के विदेश मंत्री मुत्तक़ी ने कहा कि हमसे वादा किया गया है कि दोनों देशों के बीच संबंध अच्छे रहेंगे.
मोत्ताकी ने संवाददाताओं से कहा कि तालिबान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ अपने संबंध सुधारना चाहता हैलेकिन किसी को भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
मस्जिद पर हमला
इससे पूर्व अफ़ग़ानिस्तान के कुंदूज़ शहर की एक मस्जिद में शुक्रवार को एक आत्मघाती बम धमाका हुआ, जिसमें कम से कम 50 लोगों की मौत हो गई.
अमेरिकी सेना के देश छोड़ने के बाद यह सबसे बड़ा हमला है. यह हमला शिया मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय की सैद आबाद मस्जिद में हुआ.
उत्तरी शहर में हुए इस धमाके में 100 से ज़्यादा लोग जख़्मी हुए हैं. इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली है.
इस्लामिक स्टेट के अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद धड़े आईएस-के (ख़ुरासान) ने तालिबान के शासन का लगातार विरोध किया है और उसने देश के पूर्वी हिस्से में कई धमाकों को अंजाम दिया है.
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बुरे हालात
अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती, खाद्य कीमतों में इज़ाफ़ा, बेरोज़गारी के कारण अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुज़र रही है.
मुत्तक़ी ने अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा स्थिति पर दुनिया के दूसरे देशों के साथ-साथ अमेरिका के साथ भी चर्चा करने की इच्छा जताई.
उन्होंने कहा, "अफ़ग़ानिस्तान के लोग फिलहाल जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उनका हल निकाला जाना चाहिए.”
उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान के लोगों के हितों की रक्षा के लिए तालिबान सरकार की प्रतिबद्धता को भी दोहराया.
भारत के दबाव के आगे क्या झुकने जा रहा है श्रीलंका?
दिल्ली के अंधेरे में डूबने का ख़तरा, केजरीवाल ने पीएम को लिखा पत्र
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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली
के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शनिवार को आशंका जताते हुए कहा कि आने वाले
दिनों में दिल्ली को बिजली संकट का सामना करना पड़ सकता है.
उन्होंने कहा कि देश भर
में कोयला संकट के कारण पावर-प्लांट्स में कोयला आपूर्ति प्रभावित हुई है
और दिल्ली को भी बिजली इन्हीं प्लांट्स से मिलती है. ऐसे में दिल्ली को बिजली संकट
का सामना करना पड़ सकता है.
मुख्यमंत्री
अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बिजली संयंत्रों में कोयले
की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करने की मांग की है.
दिल्ली के मुख्यमंत्री
अरविंद केजरीवाल ने एक ट्वीट करके कहा है कि कोयले की कमी के कारण दिल्ली के सामने
बिजली संकट खड़ा है.
केजरीवाल
ने कहा, "दिल्ली को बिजली संकट का सामना करना पड़ सकता
है. मैं व्यक्तिगत तौर पर स्थिति पर नज़र रख रहा हूँ. हम इससे बचने की हर संभव
कोशिश कर रहे हैं. इसी बीच मैंने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उनसे व्यक्तिगत तौर
पर हस्तक्षेप करने की अपील की है."
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चेतावनी: बीबीसी दूसरी वेबसाइट्स की सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
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दिल्ली के ऊर्जा मंत्री सत्येंद्र जैन ने भी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर मौजूदा स्थिति में सुधार नहीं होता है को राजधानी को दो दिनों के भीतर ब्लैकआउट की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है.
उन्होंने बिजली की कमी की तुलना कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन सिलिंडरों की कमी से की.
अपने एक बयान में उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि यह आश्चर्य की ही बात है कि यह संकट मानव-निर्मित है क्योंकि ना तो कोयले से बिजली बनाने वाले प्लांट्स को कोयले की आपूर्ति हो पा रही है औन ना ही गैस से बिजली बनाने वाले संयंत्रों को गैस.
कल केंद्र ने बवाना पावर प्लांट की गैस सप्लाई बंद कर दी थी. इसके बाद जब राज्य सरकार ने इस संबंध में हस्तक्षेप किया तब जाकर इसे दोबारा शुरू किया गया.
सत्येंद्र जैन ने शनिवार को बिजली विभाग और एनर्जी कंपनियों के अधिकारियों के साथ एक बैठक भी की.
दिल्ली को अपनी ज़रूरत की बिजली का एक बड़ा हिस्सा दादरी स्थित एनटीपीसी प्लांट और झज्जर स्थित थर्मल पावर प्लांट से मिलता है. दिल्ली में कोई थर्मल प्लांट नहीं है.
हालांकि पहले दिल्ली में थर्मल प्लांट थे लेकिन बीते 12 सालों में तीन प्लांट्स के बंद हो जाने के बाद से दिल्ली में कोई थर्मल प्लांट नहीं है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे अपने पत्र में अरविंद केजरीवाल ने लिखा है कि दिल्ली कोयले की कमी से जूझ रही है.
उन्होंने लिखा है, “मैं आपका ध्यान कोयले की मौजूदा आपूर्ति की ओर दिलाना चाहता हूँ. दिल्ली इस समय कोयले की कमी का सामना कर रही है. आपूर्ति में कमी का यह सिलसिला बीते दो महीने (अगस्त-सितंबर) से ही जारी है. ऐसे में दिल्ली को जिन प्लांट्स से बिजली मिलती है, उनकी आपूर्ति प्रभावित हुई है.”
अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री से एक्सचेंज पर बेची जाने वाली बिजली की दर की कैपिंग करने का भी अनुरोध किया ताकि मुनाफ़ाखोरी को रोका जा सके.
वहीं केंद्र सरकार ने गाइडलाइंस जारी करते हुए थर्मल पावर प्लांट्स को अपनी पूरी क्षमता से बिजली उत्पादन के लिए कहा है. भारत में 70 फ़ीसदी बिजली कोयले से ही मिलती है और देश के 135 कोयला संचालित पॉवर प्लांट में से आधे से अधिक प्लांट कोयला आपूर्ति में कमी का सामना कर रहे हैं.
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