अमेरिका, जापान,
भारत और ऑस्ट्रेलिया के नेताओं ने क्वॉड शिखर सम्मेलन के तहत बीते शुक्रवार को
बैठक की थी. क्वॉड समूह देशों के नेताओं की यह पहली व्यक्तिगत मुलाक़ात थी.
ग्लोबल टाइम्स ने
इस मुलाक़ात को चीन के संदर्भ में रेखांकित किया है.
ग्लोबल टाइम्स के
मुताबिक़, शुक्रवार को वॉशिंगटन में क्वॉड देशों ने चीन को ‘रोकने’ के लिए
आपसी संबंधों की मज़बूती के लिए बैठक की.
लेकिन जानकारों का कहना है कि बैठक के
दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपने अनुवाद उपकरण में ख़राबी की शिकायत की.
यह उभरते हुए चीन-विरोधी गुट के भविष्य का सूचक भी था. अमेरिका की घटती क्षमता और
वैश्विक परिस्थितियों में आए बदलाव के कारण चीन विरोधी यह गुट किसी भी तरह से
कारगर साबित नहीं होगा.
वॉशिंगटन पोस्ट
की रिपोर्ट के मुताबिक़, शुक्रवार को हुई क्वॉड देशों की इस बैठक की उद्घोषणा में
मुख्य रूप से वैक्सीन, जलवायु, तकनीकी और अंतरिक्ष सहयोग सहित दूसरे अन्य मुद्दों
का ज़िक्र किया गया. पत्रकारों ने चीन या बीजिंग जैसे शब्द नहीं सुने लेकिन क्वॉड ‘समूह के ज़्यादातर एजेंडे का सब-टेक्स्ट चीन’ था.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि क्वॉड समूह के देश मौजूदा समय में "कोविड से लेकर जलवायु की चुनौतियों और उभरती प्रौद्योगिकी से जुड़ी प्रमुख चुनौतियों का सामना करने के लिए एक मंच पर आ रहे हैं."
उन्होंने बैठक की शुरुआत में कहा, “हम जानते हैं कि हमें हमारा लक्ष्य कैसे प्राप्त करना है और इसके लिए हम हर चुनौती के लिए तैयार भी हैं."
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने बाइडन की टिप्पणी को ही दोहराते हुए कहा, "हम एक स्वतंत्र हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विश्वास करते हैं, क्योंकि यही एक मज़बूत, स्थिर और समृद्ध क्षेत्र प्रदान कर सकता है."
जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा ने भी इस बैठक में भाग लिया. उन्होंने कहा कि क्वॉड चार देशों की "एक अति महत्वपूर्ण" पहल है "जो समान मौलिक मूल्यों को साझा करते हैं और क़ानून के शासन के आधार पर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक स्वतंत्र और खुले अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को साकार करने के लिए सहयोग करते हैं."
चाइना फ़ॉरेन अफ़ेयर्स यूनिवर्सिटी में इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंटरनेशनल रिलेशन्स में प्रोफ़ेसर ली हैडोंगे ने ग्लोबल टाइम्स से कहा, हालांकि इन चारों देशों के नेताओं ने चीन को लेकर कुछ नहीं कहा और ना ही उन्होंने ज़ाहिर तौर पर चीन के साथ मौजूदा गतिरोध का ज़िक्र किया लेकिन इस शिखर सम्मेलन का एजेंडा चीन पर ही केंद्रित था. यह एक ऐसी पहल है, जिसका उद्देश्य विशेष रूप से पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में सहयोग के बैनर तले विवादों और टकराव को बढ़ाना है.
उन्होंने कहा कि वीक्सीन की आपूर्ति पर सहयोग और महामारी से निपटने के उपायों जैसे मुद्दों की आड़ में अमेरिका समेत क्वॉड के अन्य तीन देश अपने असली उद्देश्य को छिपाना चाहते हैं. ऐसा करके वे अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करना चाहते हैं लेकिन चीन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस तरह की निम्न-स्तरीय रणनीति देखी है.
ली के मुतबिक़, अमेरिका क्वॉड के चारों सदस्यों के बीच एकजुटता और समन्वय दिखाना चाहता है क्योंकि वह चीन के साथ प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
ली ने कहा, "चीन और अमेरिका के बीच पहले से ही तनावपूर्ण प्रतिस्पर्धा है. ऐसे में बाइडन, चीन के साथ टकराव से बचना चाहते हैं और चीन के ख़िलाफ़ उकसावे की कार्रवाई कर रहे हैं. लेकिन तथ्य यह है कि वह नाजुक स्थिति को संभालने में असमर्थ है."
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक़, चार देशों के नेताओं के बीच हुई इस बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन भी शामिल हुए.
ली कहते है कि ब्लिंकन की उपस्थिति ने यह दिखा दिया है कि वह ब्लिंकन ही हैं जो क्वाड समूह को आगे बढ़ा रहे हैं.
शिन्हुआ विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के फेलो सुन चेंगहाओ के मुताबिक़ ने ग्लोबल टाइम्स से कहा है कि चीन का बिल्कुल उल्लेख नहीं होना भी क्वॉड देशों के बीच के गतिरोध को प्रदर्शित करता है. हो सकता है कि वे सभी देश चीन के उदय को न चाहने के समान विचार वाले हों लेकिन चीन के प्रति उनकी नीतियां एक-दूसरे से अलग हो सकती हैं.
हालांकि शिखर सम्मेलन काफी सार्थक बताया गया लेकिन बैठक के दौरान जो बाइडन ने अपने एक कर्मचारी से कहा कि उनका अनुवादक उपकरण काम नहीं कर रहा है. यह बात उन्होंने माइक पर कही, जिसे अन्य नेताओं ने सुना भी.
सुन के मुताबिक़, क्वाड शिखर सम्मेलन बाइडन प्रशासन का नवीनतम क़दम है लेकिन अलग-अलग सहयोगियों के साथ, अलग-अलग गठबंधनों का अच्छा असर नहीं होगा क्योंकि अमेरिका का ध्यान केंद्रित नहीं है. इसने उसके सहयोगियों के बीच असंतोष को बढ़ाया भी है.
क्वाड शिखर सम्मेलन से पहले ही अमेरिका ने ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के साथ ऑकस डील की घोषणा की थी. इस पर फ्रांस ने नाराज़गी जतायी और अपने राजदूतों को इन सहयोगी देशों से वापस बुला लिया था.
विश्लेषकों का कहना है कि ऑकस ने क्वाड शिखर सम्मेलन पर असर तो ज़रूर डाला है क्योंकि जापान और भारत ऑकस में साझेदार नहीं है जबकि ऑस्ट्रेलिया है.