अफ़ग़ानिस्तान: तालिबान की सत्ता पर महिलाएँ क्या कह रही हैं?
सोदाबा हैदरी
बीबीसी संवाददाता
तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भरोसा दिलाया है कि उनके शासन में अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा.
तालिबान ने कहा है कि वो "शरिया क़ानून व्यवस्था के तहत महिलाओं के हक़ तय करने को प्रतिबद्ध हैं."
तालिबान ने कहा है कि उनके शासन में महिलाएं "शरिया क़ानून के तहत" पढ़ाई कर सकती हैं और नौकरी भी कर सकती हैं. लेकिन ज़मीनी स्तर पर इस पर कैसे अमल होगा इस पर अभी कोई स्पष्टता नहीं है.
अभी तक इन सवालों के उत्तर भी नहीं मिले हैं कि क्या महिलाओं को वोट देने का हक़ होगा, क्या वो किसी पार्टी में शामिल हो सकती हैं या क्या वो जज या खिलाड़ी बन सकती हैं?
अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़े के बाद मंगलवार को तालिबान ने पहली बार औपचारिक रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस की.
इस दौरान पहली बार कैमरे के सामने आए संगठन के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद से देश में महिलाओं के भविष्य को लेकर कई सवाल किए गए, लेकिन उन्होंने किसी सवाल का सीधे-सीधे जबाव देने की बजाय कहा, "नए नियम नया प्रशासन बनाएगा."
हालांकि उन्होंने मोटे तौर पर ये कहा कि स्वास्थ्य, क़ानून, शिक्षा और पुलिस में महिलाओं की "ज़रूरत होगी".
हालांकि इन क्षेत्रों में उन्हें किस स्तर पर शामिल किया जाएगा इस पर भी अभी कोई स्पष्टता नहीं है. लेकिन तालिबान के इन दावों पर अफ़ग़ान महिलाओं को यक़ीन नहीं.
काबुल में टेलीविज़न पर प्रेस कॉन्फ्रेंस सुन रही एक महिला ने कहा, "ये जो कह रहे हैं उस पर मुझे बिल्कुल भी यक़ीन नहीं है." एक और महिला ने कहा, "ये उनकी एक चाल है. वो हमें लालच दे रहे हैं ताकि हम घर से बाहर निकलें और वो हमें सज़ा दे सकें. तालिबान के शासन में मैं न तो पढ़ाई करूंगी और न ही नौकरी करूंगी."
एक तरफ जहां अधिकतर अफ़ग़ान महिलाएं तालिबान के इन दावों पर यक़ीन नहीं कर रही हैं, वहीं कुछ महिलाओं ने महिला अधिकारों को लेकर तालिबान के रवैये का स्वागत किया है.
एक महिला के अनुसार, "अगर मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर सकती हूं और काम कर सकती हूं तो मेरे लिए आज़ादी की यही परिभाषा होगी. मेरे लिए ये वो लाल रेखा है जिसे अब तक तालिबान ने पार नहीं किया है."
उन्होंने कहा कि "मुझे हिजाब पहनने से कोई दिक्क़त नहीं बशर्ते मुझे पढ़ाई करने दिया जाए और मैं काम कर सकूं. मैं एक इस्लामी देश में रहती हूं और मैं बुर्क़ा के अलावा किसी भी इस्लामी ड्रेस कोड को अपनाने के लिए तैयार हूं. मैं बुर्क़ा नहीं अपनाऊंगी क्योंकि वो इस्लामी ड्रेस कोड का हिस्सा नहीं है.''
ज़बीहुल्लाह मुज़ाहिद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान की जीत को "गौरव का पल" बताया और कहा कि "बीस साल के संघर्ष के बाद हमने देश को आज़ाद कर लिया है और विदेशियों को निकाल दिया है."
उन्होंने कहा कि वो अफ़ग़ानिस्तान को युद्ध या संघर्ष की भूमि नहीं बनना चाहते. उन्होंने कहा, "जिन्होंने हमारे ख़िलाफ़ लड़ाई की थी हमने उन सभी को माफ़ कर दिया है. हम दुश्मनी भूल चुके हैं. हमें न तो देश के भीतर कोई दुश्मन चाहिए और न ही हम कोई बाहरी शत्रु चाहते हैं."
इससे पहले काबुल पर कब्ज़ा होने के बाद तालिबान प्रमुख मुल्ला बरादर समेत संगठन के कई वरिष्ठ नेता कंधार पहुंचे. बरादर तालिबान के सह-संस्थापकों में से एक हैं और इसके सबसे वरिष्ठ नेताओं में शुमार हैं.
अब तक ये पता नहीं चल पाया है कि कि वो कहां से अफ़ग़ानिस्तान पहुंचे हैं, लेकिन माना जाता है कि तालिबान ने अधिकतर नेता क़तर की राजधानी दोहा में थे जहां अफ़ग़ानिस्तान से विदेशी सेना की वापसी को लेकर अमेरिका के साथ चर्चा जारी थी.
क्या है शरिया क़ानून?
शरिया क़ानून इस्लाम की क़ानूनी व्यवस्था है जो इस्लाम की पवित्र मानी जाने वाली क़िताब क़ुरान, पैगंबर की सीख पर आधारित इस्लाम की मूल शिक्षा और इस्लामी विद्वानों के जारी किए फ़तवों पर आधारित है.
शरिया का शाब्दिक अर्थ है "लक्ष्य तक पहुंचने के लिए स्पष्ट मार्ग."
सभी मुसलमानों के लिए शरिया क़ानून जीवन जीने का एक तरीका है. इसमें प्रार्थना करना, उपवास करना और गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए काम करना शामिल है.
शरिया क़ानून किसी मुसलमान व्यक्ति के जीवन के हर हिस्से यानी परिवार, आर्थिक और व्यापारिक जीवन को प्रभावित कर सकता है.
इसके तहत कड़े दंड का प्रावधान है- जैसे चोरी के लिए व्यक्ति के हाथ काट देना, व्यभिचार के लिए पत्थर मार कर किसी को मौत देना.
अपदस्थ उप राष्ट्रपति ने किया कार्यवाहक राष्ट्रपति होने का दावा
अफ़ग़ानिस्तान के अपदस्थ उप राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने दावा किया है कि रविवार को पूर्व राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के देश छोड़ कर भाग जाने के बाद वो देश के नए कार्यवाहक राष्ट्रपति हैं.
सालेह ने बीबीसी को एक ऑडियो संदेश भेजा है जिसमें उन्होंने पुष्टि की है कि वो अफ़ग़ानिस्तान में ही हैं और युद्ध अभी ख़त्म नहीं हुआ है.
इससे पहले उन्होंने ट्वीट कर जानकारी दी कि ''मैं देश के भीतर हूं और सभी की सहमति और समर्थन के लिए सभी नेताओं से संपर्क में हूं." इससे पहले उन्होंने कहा था कि उन्होंने "हिम्मत नहीं हारी है". उन्होंने लोगों से अपील की थी कि वो तालिबान के ख़िलाफ़ विरोध में शामिल हों.
अमरुल्लाह सालेह अफ़ग़ान ख़ुफ़िया सेवा के पूर्व निदेशक रह चुके हैं. रविवार को उन्होंने कहा था कि वो "किसी भी सूरत में" तालिबान के सामने हथियार नहीं डालेंगे.