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कॉलेजियम ने SC में नियुक्ति के लिए तीन महिलाओं समेत नौ नामों की सिफ़ारिश की
अगर इन सभी नामों को पर मुहर लग जाती है तो भारत को आने वाले सालों में पहली महिला चीफ़ जस्टिस मिल जाएगी
लाइव कवरेज
भूमिका राय, कमलेश मठेनी, मानसी दाश and अपूर्व कृष्ण
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अफ़ग़ानिस्तान में विस्थापन पर चिंता जताई
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि ''अफ़ग़ानिस्तान में लोग कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. अफ़ग़ानिस्तान में बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन हो रहा है, अतिसार, कुपोषण, हाईब्लड प्रेशर और कोरोना के संभावित मामले मामले बढ़ रहे हैं. साथ ही यौन स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं हो रही है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ये भी कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में फौरन मानवीय सहायता सुनिश्चित और और स्वास्थ्य सेवाओं को जारी रखने की आवश्यकता है.
अफ़ग़ान महिलाओं की चिंता
ब्रिटेन, अमरेिका और यूरोपियन संघ ने एक दर्ज़न से अधिक देशों के साथ मिलकर एक संयुक्त बयान जारी किया है जिसमें कहा गया है कि तालिबान के दोबारा क़ब्ज़े के बाद वे अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों को लेकर बेहद चिंतित हैं.
तालिबान ये कह चुका है कि वो अफ़ग़ानिस्तान पर इस्लामी शरिया क़ानूनों के हिसाब से शासन करेगा और उसी हिसाब से महिलाओं से बर्ताव किया जाएगा.
कॉलेजियम ने SC में नियुक्ति के लिए तीन महिलाओं समेत नौ नामों की सिफ़ारिश की
सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने जजों की बहाली के लिए, नौ नामों की सिफ़ारिश की है जिनमें तीन महिलाएं हैं.
अगर इन नामों मुहर लग जाती है तो साल 2027 में बीवी नागरत्ना भारत की पहली महिला चीफ़ जस्टिस बन सकती हैं.
मौजूदा चीफ़ जस्टिस एनवी रमन्ना की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम ने हाल ही में इन नौ नामों की सिफ़ारिश सरकार को भेजी है.
इस प्रस्ताव के आधार पर अगर न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पद्दोन्नत किया जाता है तो वह 2027 में भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बन सकती हैं.
कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना के अलावा, तेलंगाना हाई कोर्ट की चीफ़ जस्टिस हिमा कोहली और गुजरात हाई कोर्ट की बेला त्रिवेदी के नामों की भी सिफ़ारिश की गई है.
सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम में चीफ़ जस्टिस रमन्ना के अलावा जस्टिस उदय उमेश ललित, एएम खानविलकर, डॉ धनंजय वाई चंद्रचूड़ और एल नागेश्वर राव शामिल थे.
इस समय सुप्रीम कोर्ट में नौ जजों की वैकेंसी है क्योंकि बीते साल-डेढ़ साल में कई जज रिटायर हुए हैं.
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित 34 न्यायाधीश मान्य हैं. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ़ 24 जज ही है और आज न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा के रिटायर होने के साथ ही कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या 23 हो गई है.
अफ़ग़ानिस्तान के कई शहरों में तालिबान विरोधी प्रदर्शन, गोलीबारी में एक की मौत
पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के शहर जलालाबाद में तालिबान की गोलीबारी में कम से कम एक व्यक्ति की मौत हो गई है.
स्थानीय लोग शहर के एक चौक पर अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिश कर रहे थे जिसके बाद तालिबान लड़ाकों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं, जिसमें एक शख़्स के मौत की पुष्टि हुई है.
बीबीसी की पश्तो सेवा ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान के जलालाबाद, कुनार और ख़ोस्त शहरों में तालिबान विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक़ प्रदर्शन कर रहे लोग अफ़ग़ानिस्तान का झंडा लहराते हुए प्रदर्शन कर रहे हैं
इन शहरों में हो रहे प्रदर्शनों के आधार पर यह कहना जल्दबाज़ी ही होगी कि आने वाले समय में यह प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर फैल सकता है.
हालांकि मौजूदा समय में जो बात बिल्कुल स्पष्ट है वो यह है कि चीज़ें तेज़ी से बदल रही हैं. हमारे पत्रकारों का कहना है कि बदलते माहौल से तालिबान तनाव में हैं.
पंजशीर घाटी के कई ऐसे असत्यापित वीडियो सामने आए हैं जिसमें पूर्व उत्तरी गठबंधन के झंडे के साथ मोटरबाइक सवारों का विशाल कारवां दिखाई दे रहा है. इन्हें पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह की "प्रतिरोध सेना" कहा जा रहा है, जिन्होंने खुद को कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित किया है.
ताजिकिस्तान में अफ़ग़ान दूतावास के अधिकारियों ने पहले ही सालेह की तस्वीरें पहले ही लगा दी हैं औरउन्हें अपने राष्ट्रपति के रूप में नामित किया है.
हालांकि तालिबान ने अभी तक इनमें से किसी भी घटनाक्रम पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी संयुक्त अरब अमीरात में
काबुल पर तालिबान के नियंत्रण के बाद अफ़ग़ानिस्तान से भागे पूर्व राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी संयुक्त अरब अमीरात जा पहुंचे हैं.
संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करके बताया है कि उन्होंने ''मानवीय आधार पर राष्ट्रपति ग़नी और उनके परिवार का अपने देश में स्वागत किया है.
कितनी रकम लेकर गए अशरफ़ ग़नी ?
ताजिकिस्तान में अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत मोहम्मद ज़हीर अग़बर ने दावा किया है कि अशरफ़ ग़नी ने रविवार को जब काबुल छोड़ा था, तब वे अपने साथ लगभग 16.9 करोड़ डॉलर लेकर गए थे.
उन्होंने राष्ट्रपति के तौर पर अशरफ़ ग़नी की लड़ाई को ''अपनी ज़मीन और अपने लोगों से विश्वासघात'' बताया है.
ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में अफ़ग़ान दूतावास में संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने ये भी कहा कि दूतावास, ग़नी के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह को अफ़ग़ानिस्तान के कार्यवाहक राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता देने पर विचार कर रहा है.
अशरफ़ ग़नी बीते रविवार को काबुल पर तालिबान लड़ाकों के नियंत्रण के दौरान अफ़ग़ानिस्तान से चले गए थे.
अमेरिका ने इस कदम के लिए उनकी कड़ी आलोचना की थी और कहा है कि अफ़ग़ान सरकार ने सही कदम उठाए होते तो काबुल पर तालिबान का इस तरह से क़ब्ज़ा ना होता.
बीते रविवार को काबुल से जाते-जाते अशरफ़ ग़नी ने लिखा था, "बहुत से लोग अनिश्चित भविष्य के बारे में डरे हुए और चिंतित हैं. तालिबान के लिए ये ज़रूरी है कि वो तमाम जनता को, पूरे राष्ट्र को, समाज के सभी वर्गों और अफ़ग़ानिस्तान की औरतों को यक़ीन दिलाएं और उनके दिलों को जीतें."
शुरुआती रिपोर्ट्स में कहा गया था कि अशरफ़ ग़नी ताजिकिस्तान भागे हैं. हालांकि तब अल-जज़ीरा ने बताया था कि ग़नी, उनकी पत्नी, सेना प्रमुख और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद गए हैं.
अशरफ़ ग़नी के ख़िलाफ़ रहा है तालिबान
साल 2017 में अशरफ़ गनी ने बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में कहा था "अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रपति होना पृथ्वी की सबसे ख़राब नौकरी है. यहाँ दिक़्क़तों की कमी नहीं है. जिसमें सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा की है."
जिस वक्त उन्होंने ये साक्षात्कार दिया उस वक्त उन्हें अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि उनके लिए आने वाले साल इससे भी ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होने वाले हैं.
अमेरिका ने बताया काबुल से कैसे सैकड़ों लोगों को लेकर निकला उनका विमान
अमेरिकी वायुसेना ने बताया है कि काबुल एयरपोर्ट पर सोमवार को उनका मालवाहक विमान किन परिस्थितियों में वहाँ से निकला.
उन्होंने साथ ही अफ़रातफ़री के दौरान लोगों के मारे जाने की घटनाओं की जाँच के भी आदेश दिए हैं.
हालाँकि, उन्होंने ये नहीं बताया है कि कितने लोगों की मृत्यु हुई. पर ये कहा है कि ये विमान जब क़तर में अल-उबैद एयरबेस पर उतर रहा था तो उसके पहियों में मानव अवशेष मिले.
अमेरिकी वायुसेना ने ये भी कहा है कि वो उपलब्ध वीडियो रिकॉर्डिंग की भी जाँच करेगा और इस बारे में रिपोर्ट तैयार करेगा.
सोमवार को काबुल हवाई अड्डे से नाटकीय तस्वीरें आई थीं जिनमें दिखा था कि सैकड़ों की संख्या में बदहवास लोग अमेरिकी सी-17 ग्लोबमास्टर थ्री मालवाहक विमान के इर्द-गिर्द भाग रहे थे और उसके पहियों और पंखों पर चढ़ रहे थे.
बाद में ऐसी भी रिपोर्टें आई थी कि कुछ लोग उड़ते विमान से नीचे गिर गए.
अमेरिकी वायुसेना ने कहा कि उनका विमान काबुल में लोगों को बाहर निकालने के लिए ज़रूरी सामानों को पहुँचाने गया था. मगर उनके सामान उतारने से पहले ही सैकड़ों अफ़ग़ान लोगों ने विमान को घेर लिया.
सुरक्षा स्थिति को बिगड़ती देख चालक दल ने अंततः विमान को उड़ा ले जाने का फ़ैसला किया.
बाद में बताया गया कि इस विमान में 640 लोग सवार थे जिन्हें अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकाला गया. इनमें औरतें और बच्चे शामिल थे.
अमेरिका ने कहा कि तालिबान ने उनसे वादा किया था कि काबुल एयरपोर्ट पहुँचने वाले लोगों को सुरक्षित जाने दिया जाएगा.
अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सलिवन ने कहा है कि तालिबान से कहा जाएगा कि वो अपने वादे को पूरा करें.
उन्होंने साथ ही कहा कि अमेरिका ने तालिबान को आने वाले समय में हज़ारों अमेरिकी और अफ़ग़ान लोगों को निकालने की योजना की जानकारी दी है.
अमेरिकी रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि उनका लक्ष्य है कि प्रतिदिन 9,000 लोगों को वहाँ से निकाला जाए.
तालिबान नेताओं ने की काबुल में हामिद करज़ई और दूसरे नेताओं से मुलाक़ात
तालिबान के एक नेता अनस हक़्क़ानी ने आज काबुल में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई और वरिष्ठ राजनेता अब्दुल्ला अब्दुल्ला के साथ मुलाक़ात की है.
अनस हक़्क़ानी तालिबान के वरिष्ठ नेता सिराजुद्दीन हक़्क़ानी के भाई हैं. सिराजुद्दीन अपने पिता जलालुद्दीन हक़्क़ानी की मौत के बाद हक़्क़ानी नेटवर्क के नए नेता हैं.
बीबीसी की पश्तो सेवा को तालिबान के एक सूत्र ने बताया कि अफ़ग़ान संसद के उच्च सदन सीनेट के अध्यक्ष अब्दुल हादी मुस्लिमयार भी बैठक में शामिल थे.
इस मुलाक़ात में क्या चर्चा हुई इसका ब्यौरा नहीं दिया गया है. मगर हामिद करज़ई के एक क़रीबी सूत्र ने बीबीसी को बताया कि इस बैठक में एक मिली-जुली सरकार बनाने के बारे में बात हुई जो सभी को स्वीकार्य हो.
करज़ई और अब्दुल्ला इससे पहले तालिबान के एक और नेता आमिर ख़ान मोत्तकी से भी मिल चुके हैं.
अब्दुल्ला अब्दुल्ला पिछली सरकार में के मुख्य शांति दूत थे जो सुलह के लिए बनाई गई परिषद के प्रमुख थे जिसे तालिबान के साथ वार्ता की अगुआई करनी थी.
इस बीच तालिबान के कई बड़े नेता आज या कल अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल पहुँच सकते हैं.
सबसे प्रमुख नेताओं में एक माने जाने वाले मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर और अन्य तालिबान नेता मंगलवार को क़तर से अफ़ग़ानिस्तान लौटे. वो पहले दक्षिणी शहर कंधार पहुँचे जहाँ तालिबान का जन्म हुआ था.
मुल्ला बरादर तालिबान के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. वो उन चार लोगों में से एक हैं जिन्होंने 1994 में तालिबान का गठन किया था.
वह कतर में अमेरिका के साथ हुई वार्ताओं में हिस्सा ले रहे थे. उन्हें शांति वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए जेल से रिहा किया गया था.
बताया जाता है कि मुल्ला बरादर शांति वार्ता के पक्षकार रहे हैं.
अफ़ग़ानिस्तान के मौजूदा हालात पर ब्रिटेन में संसद का विशेष सत्र
अफ़ग़ानिस्तान की मौजूदा स्थिति पर चर्चा करने के लिए ब्रिटेन की संसद में विशेष सत्र बुलाया गया है.
यह विशेष सत्र "अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति पर विचार” के लिए बुलाया गया है. हालांकि विशेष सत्र के दौरान वोटिंग होने की संभावना नहीं है
विशेष सत्र बुलाए जाने पर सवाल उठाते हुए कुछ सांसदों-राजनेताओं ने कहा कि अब इस अंतिम चरण में संसद को वापस बुलाने से क्या हासिल होगा.
साल 2013 के बाद से यह पहला मौक़ा है जब सांसदों को ग्रीष्मकालीन अवकाश से बुलाया जा रहा है. इससे पूर्व तत्कालीन प्रधान मंत्री डेविड कैमरन ने सीरिया में रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल पर चर्चा करने के लिए एक आपातकालीन सत्र बुलाया था.
संसद में बहस शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने सांसदों को संबोधित किया.
सांसद जॉन बैरॉन के एक सवाल का जवाब देते हुए बोरिस जॉनसन ने कहा कि उनकी सरकार अफ़ग़ानिस्तान मिशन के दौरान ब्रिटेन का समर्थन करने वाले लोगों के लिए वो सबकुछ करेगी जो वो कर सकती है.
बोरिस जॉनसन ने कहा कि 9/11 के हमले को लगभग 20 साल हो चुके हैं.जिसके कारण नेटो के सहयोगी देश अफ़ग़ानिस्तान गए. अफ़ग़ानिस्तान को स्थिर करने के लिए हम जो कुछ भी कर सकते थे, वो करने के लिए हम अफ़ग़ानिस्तान गए.
सांसद टोबियास एलवुड ने बोरिस जॉनसन से सवाल पूछा कि क्या प्रधान मंत्री इस बात से सहमत हैं कि ब्रिटेन अब उन्हीं विद्रोहियों को दोबारा सत्ता सौंप रहा है?
इस पर प्रधानमंत्री ने कहा कि हम उस मिशन में सफल हुए और अफ़ग़ानिस्तान में प्रशिक्षण शिविर को नष्ट कर दिया गया.
पूर्व प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति पर सरकार के आकलन पर सवाल उठाया.
उन्होंने सवाल किया कि "क्या वास्तव में खुफ़िया जानकारी इतनी ग़लत थी? क्या अफ़गान सरकार के बारे में हमारी समझ इतनी कमजोर थी? क्या जमीन पर स्थिति के बारे में हमारी जानकारी इतनी अपर्याप्त थी? या क्या हमें लगा कि हमें अमेरिका का अनुसरण करना चाहिए?"
उन्होंने यह भी कहा कि तालिबान ने घोषणा की है कि महिलाएं काम कर सकेंगी और लड़कियां इस्लामी कानून के तहत स्कूल जा सकेंगी, लेकिन यह "इस्लामी कानून की उनकी व्याख्या के तहत है और हमने पहले भी देखा है कि महिलाओं और लड़कियों के अधिकारों के लिए इसका क्या मतलब है."
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के विरोध में सड़कों पर उतरे लोग, खोस्त में भी प्रदर्शन
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के काबुल पर नियंत्रण के तीन दिन बाद कम-से-कम दो शहरों में आम लोगों के तालिबान के विरोध में प्रदर्शन की ख़बर आ रही है.
बुधवार को नांगरहार प्रांत की राजधानी जलालाबाद के बाद खोस्त प्रांत की राजधानी खोस्त में भी आम लोगों के सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने की ख़बर आई है.
दोनों ही शहरों में बड़ी संख्या में लोगों ने शहर के केंद्र में अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रीय झंडे लगा दिए और फिर रैली निकाली.
स्थानीन मीडिया में खोस्त से आए वीडियो में दिखता है कि वहाँ प्रदर्शनकारी सड़क के ऊपर बने एक फ़ुटब्रिज पर अफ़ग़ान झंडा लगा देते हैं जिसके बाद कुछ हथियारबंद लोग भागकर उसे गिराने की कोशिश करते हैं.
बंदूकधारी गोलियाँ भी चलाते हैं जिसके बाद वहाँ अफ़रातफ़री मच जाती है. बीबीसी पश्तो सेवा को स्थानीय सूत्रों ने बताया कि कम-से-कम एक शख़्स इस हंगामे में घायल हुआ है.
इससे पहले जलालाबाद शहर से भी ऐसी ही तस्वीरें आई थीं जहाँ लोगों ने अफ़ग़ानिस्तान का झंडा लेकर प्रदर्शन किया और फिर उन्हें तितर-बितर करने के लिए हवा में गोलियाँ चलाई गईं.
तालिबान ने जलालाबाद पर रविवार सुबह को बिना किसी लड़ाई के क़ब्ज़ा कर लिया था. इसके बाद अफ़ग़ानिस्तान को पाकिस्तान से जोड़नेवाली सड़क पर उनका नियंत्रण हो गया था.
मगर बुधवार को जलालाबाद से ख़बर आई कि वहाँ नारे लगाती भीड़ ने तालिबान का झंडा हटाकर अफ़ग़ानिस्तान का झंडा लगा दिया.
प्रदर्शनकारी तालिबान से राष्ट्रीय ध्वज को नहीं बदलने की माँग कर रहे थे.
तालिबान के प्रवक्ता ज़बीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा है कि देश के झंडे को लेकर अभी विचार-विमर्श हो रहा है.
काबुल एयरपोर्ट के हाथ से जाने की ख़बर का तुर्की ने किया खंडन
तुर्की ने इन ख़बरों का खंडन किया है कि उसने काबुल एयरपोर्ट का संचालन जारी रखने का इरादा छोड़ दिया है.
तुर्की ने कहा है कि वो अभी तालिबान और दूसरे अफ़ग़ान राजनेताओं के बीच हो रही बातचीत के परिणामों की प्रतीक्षा कर रहा है.
तुर्की के अख़बार हुर्रियत ने तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुट कावुसोग्लु का बयान छापा है जिसमें उन्होंने कहा है,”उनकी बात ख़त्म होने के बाद हम दूसरी बातों के बारे में बात करेंगे.”
अफ़ग़ानिस्तान में काबुल एयरपोर्ट का मुद्दा पिछले समय से लगातार चर्चा में है जिसका संचालन तुर्की के हाथों में था.
तुर्की के लगभग 600 सैनिक काबुल के हामिद करज़ई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को सुरक्ष देते रहे हैं.
उसने इच्छा जताई थी कि वो अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी और नेटो सेना की वापसी के बाद भी एयरपोर्ट को चलाने और उसकी सुरक्षा का काम करना चाहता है.
मगर तालिबान इसके लिए तैयार नहीं है. उसने कह दिया है कि वो चाहता है कि नेटो के सारे सैनिक देश से निकल जाएँ.
तुर्की भी नेटो का सदस्य है और ऐसे में ये मामला अटक गया है.
अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति भवन समेत तमाम दूतावासों के नज़दीक स्थित काबुल हवाई अड्डा रणनीतिक रूप से काफ़ी अहम है.
ये एयरपोर्ट इस युद्धग्रस्त मुल्क तक मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए एक सुरक्षित रास्ता देता है.
साथ ही कहा जाता रहा है कि कोई संवेदनशील स्थिति पैदा होने पर विदेशी राजनयिकों को सुरक्षित बाहर निकालने का एकमात्र विकल्प है.
जलालाबाद में अफ़ग़ानिस्तान का झंडा थामे निकले लोग, 'तालिबान' ने चलाई गोलियाँ
अफ़ग़ानिस्तान के जलालाबाद शहर में कुछ लोगों ने अफ़ग़ानिस्तान के झंडे के समर्थन में एक रैली निकाली जिसे लेकर हिंसा होने और हवा में गोलियाँ चलाए जााने की ख़बरें आ रही हैं.
जलालाबाद पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के नांगरहार प्रांत की राजधानी और देश का पाँचवाँ सबसे बड़ा शहर है.
स्थानीय मीडिया के अनुसार बुधवार सुबह कई आम लोगों ने वहाँ के मुख्य चौराहे पर अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रध्वज फ़हरा दिया.
उसके बाद सैकड़ों लोग झंडे के समर्थन में नारे लगाते हुए जुलूस निकालने लगे. ये लोग तालिबान से राष्ट्रीय ध्वज को नहीं बदलने की माँग कर रहे थे.
इसके थोड़ी ही देर बाद शहर की मुख्य सड़क पर कुछ बंदूकधारियों ने उन्हें रोका.
सोशल मीडिया पर दिख रहे वीडियो में नज़र आता है कि कुछ बंदूकधारियों ने भीड़ को हटाने के लिए हवा में गोलियाँ चलाईं.
अभी ये स्पष्ट नहीं है कि ये बंदूकधारी कौन थे, मगर कई सूत्र ये बता रहे हैं कि ये लोग तालिबान के सदस्य थे.
अफ़ग़ानिस्तान की एक स्थानीय समाचार एजेंसी पझवोक अफ़ग़ान न्यूज़ ने इस रैली की तस्वीरें और वीडियो ट्वीट की हैं.
एजेंसी ने लिखा है कि तालिबान के सदस्यों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं और इसे कवर कर रहे कुछ वीडियो पत्रकारों को भी पीटा.
तालिबान ने इस घटना पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.
अभी ये भी स्पष्ट नहीं है कि हिंसा में किसी को चोट आई या नहीं.
तालिबान सरकार को मान्यता देने को लेकर पाकिस्तान बोला- ऐसे ही नहीं देंगे
पाकिस्तान ने कहा है कि वो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार को मान्यता देने के बारे में एकतरफ़ा फ़ैसला नहीं करेगा.
पाकिस्तान के सूचना और प्रसारण मंत्री फ़वाद चौधरी ने मंगलवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि पाकिस्तान इस बारे में कोई भी फ़ैसला क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों से मशवरा करने के बाद ही करेगा.
फ़वाद चौधरी ने कहा, “जो भी फ़ैसले होंगे वो एकपक्षीय नहीं हैं, द्विपक्षीय नहीं हैं, ये बहुपक्षीय फ़ैसले हैं. तो हम अकेले कोई फ़ैसला नहीं करना चाहते, हम इस क्षेत्र में भी और अपने अंतरराष्ट्रीय साथियों के संपर्क में हैं और हम उसी हिसाब से फ़ैसला लेंगे. “
उन्होंने बताया कि पाकिस्तान ने काबुल में तालिबान के पहुँचने के बाद तुर्की और अमेरिका के साथ विस्तार से चर्चा की है.
प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैयप अर्दोआन से बात की तो पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने अमेरिका के विदेश मंत्री टोनी ब्लिंकन के साथ चर्चा की है.
फ़वाद चौधरी ने कहा कि पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में हुए सत्ता परिवर्तन से ख़ुश है.
उन्होंने कहा, “हम ख़ुश और संतुष्ट हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में बदलाव ना तो किसी ख़ून-ख़राबे के हुआ ना ही कोई लड़ाई छिड़ी.”
पाकिस्तान ने पहले दी थी मान्यता
तालिबान ने जब आख़िरी बार 90 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता हाथ में ली थी तब केवल तीन देशों ने उसकी सरकार को मान्यता दी थी.
वे थे - सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान.
लेकिन 1996 से 2001 के दौर में अफ़ग़ानिस्तान बाक़ी दुनिया ने लगभग कटा हुआ था.
अफ़ग़ानिस्तान पहुँच चुके हैं मुल्ला बरादर, आज या कल पहुँचेंगे काबुल
ऐसी ख़बरें हैं कि तालिबान के सबसे प्रमुख नेताओं में एक माने जाने वाले मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर और अन्य तालिबान नेता आज या कल अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल पहुँच सकते हैं.
मुल्ला बरादर मंगलवार को क़तर से अफ़ग़ानिस्तान लौटे. वो पहले दक्षिणी शहर कंधार पहुँचे जहाँ तालिबान का जन्म हुआ था.
मुल्ला बरादर तालिबान के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं. वो उन चार लोगों में से एक हैं जिन्होंने 1994 में तालिबान का गठन किया था.
वह कतर में अमेरिका के साथ हुई वार्ताओं में हिस्सा ले रहे थे. उन्हें शांति वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए जेल से रिहा किया गया था.
बताया जाता है कि मुल्ला बरादर शांति वार्ता के पक्षकार रहे हैं.
इस वर्ष मार्च में भी उन्होंने मॉस्को में अफ़ग़ान शांति वार्ता में तालिबान की ओर से शिरकत की थी.
उन्हें 2010 में अमेरिका और पाकिस्तान के एक संयुक्त अभियान में पाकिस्तान के कराची शहर से गिरफ़्तार किया गया था.
तीन साल पहले, वर्ष 2018 में पाकिस्तान ने उन्हें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड़ोनल्ड ट्रंप के अफ़ग़ान दूतर ज़ल्मे ख़लीलज़ाद के कहने पर रिहा कर दिया था.
बरादर ने वर्ष 2020 में अमेरिका के साथ दोहा में हुए समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जिसे ट्रंप सरकार ने एक बड़ी उपलब्धि क़रार दिया था.
यूपी में सपा सांसद शफ़ीकुर्रहमान बर्क तालिबान पर बोल फँसे, देशद्रोह का केस दर्ज
समीरात्मज मिश्र
लखनऊ से बीबीसी हिन्दी के लिए
उत्तर प्रदेश में संभल से समाजवादी पार्टी के लोकसभा सांसद शफ़ीकुर्रहमान बर्क पर एक बीजेपी कार्यकर्ता की शिकायत पर देशद्रोह का केस दर्ज किया गया है.
एक दिन पहले अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता सँभालने वाले तालिबान की तुलना भारत की आज़ादी के लिए लड़ने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से की थी.
संभल के पुलिस अधीक्षक चक्रेश मिश्र ने इस बारे में मीडिया को बताया, "कोतवाली संभल में यह शिकायत की गई कि थी कि सांसद शफ़ीकुर्रहमान बर्क ने तालिबान की तुलना भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से की है. ऐसे बयान राजद्रोह की श्रेणी में आते हैं. इसलिए उनके ख़िलाफ़ 124ए यानी देशद्रोह की धारा में एफ़आईआर दर्ज की गई है. साथ ही 153ए और 295 भी लगाया गया है. उनके अलावा दो अन्य लोगों ने भी सोशल मीडिया पर वीडियो में ऐसी ही बातें कही हैं, उनके ख़िलाफ़ भी केस दर्ज कर लिया गया है."
शफ़ीकुर्रहमान बर्क ने अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के अधिकार मामले में इसकी तुलना भारत के स्वतंत्रता संग्राम से की थी, हालांकि उसके बाद उन्होंने अपने बयान का बचाव भी किया था.
संभल में मीडिया से बातचीत में बर्क ने कहा था, "जब भारत अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े में था, तब देश ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी. अब तालिबान भी अपने देश को आज़ाद कराकर देश ख़ुद से चलाना चाहते हैं. पहले रूस और फिर अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में क़ब्ज़ा कर रखा था. उन्होंने अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ी. ये उनका पर्सनल मामला है, इसमें किसी को दख़ल नहीं देना चाहिए."
यूपी के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य समेत बीजेपी के कई नेताओं ने बर्क के इस बयान की तीखी आलोचना की थी और बीजेपी ने उनसे माफ़ी मांगने को भी कहा था.
यही नहीं, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी शफ़ीकुर्रहमान बर्क की इस टिप्पणी पर आलोचना की है.
केस दर्ज होने के बाद शफ़ीकुर्रहमान बर्क से उनकी प्रतिक्रिया जानने के कोशिश की गई लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी.
दो साल पहले संसद में वंदे मातरम पर अपने एक बयान को लेकर भी शफ़ीकुर्रहमान बर्क विवादों में आ गए थे.
सदन में उर्दू में शपथ लेने के बाद उन्होंने कहा था, "भारत का संविधान जिंदाबाद लेकिन जहां तक वंदे मातरम का सवाल है यह इस्लाम के खिलाफ है और हम इसका पालन नहीं कर सकते."
सुनंदा पुष्कर मौत मामले में शशि थरूर बरी, सबूतों के अभाव में आरोप ख़ारिज
दिल्ली की एक अदालत ने कांग्रेस नेता शशि थरूर को उनकी पत्नी सुनंदा पुष्कर की मौत के मामले में सभी आरोपों से बरी कर दिया है.
बीबीसी के सहयोगी पत्रकार सुचित्र मोहंती ने जानकारी दी है कि अदालत ने सबूतों की कमी के आधार पर थरूर पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला ख़ारिज कर दिया.
सुनंदा पुष्कर 17 जनवरी 2014 को दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में मृत पाई गई थीं.
शुरू में उनकी मौत को ख़ुदकुशी माना गया था मगर बाद में दिल्ली पुलिस ने कहा कि उनकी हत्या की गई थी. हालाँकि, उन्होंने किसी संदिग्ध का नाम नहीं लिया था.
2018 में दिल्ली पुलिस ने शशि थरूर पर अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाने और क्रूरता का आरोप लगाया.
दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट उन्होंने इस मामले में अभियुक्त माना था.
हालांकि, तब शशि थरूर ने ट्वीट करके चार्जशीट में लगाए गए आरोपों को आधारहीन बताया था और इसके ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने की बात कही थी.
शशि थरूर ने अदालत के उन्हें बरी करने के आदेश के बाद एक बयान जारी कर न्यायाधीश गीतांजलि गोयल का आभार प्रकट किया है.
थरूर ने लिखा है, "इस आदेश से उस डरावने सपने का अंत हो गया है जिसने मुझे मेरी पत्नी सुनंदा की दुखद मृत्यु के बाद घेर लिया था. मैंने धीरज से मुझपर लगाए गए दर्जनों आरोपों और मीडिया में लगाए मिथ्यारोपण का सामना किया और भारतीय न्यायपालिका में आस्था बनाए रखी, जिसकी आज जीत हुई है."
तालिबान का वादा, 'आम नागरिक सुरक्षा के साथ एयरपोर्ट तक जा सकते हैं'
समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार व्हाइट हाउस ने मंगलवार को कहा है कि तालिबान ने वादा किया है कि आम नागरिक बिना डर के सुरक्षा के साथ काबुल एयरपोर्ट तक जा सकते हैं.
अमेरिकी सरकार के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में फ़िलहाल क़रीब 11,000 अमेरिकी नागरिक मौजूद हैं जिनमें राजनयिक और कॉन्ट्रैक्टर शामिल हैं.
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ये सुनिश्चित करने के लिए कि काबुल के हामिद करज़ई एयरपोर्ट पर हमला न हो और अफ़ग़ानिस्तान से निकल रहे लोग सुरक्षित हवाई अड्डे तक पहुंच सकें, वो लगातार तालिबान के कमांडरों के साथ संपर्क में हैं.
हालांकि इस तरह की ख़बरें भी मिल रही हैं कि काबुल हावाई अड्डे में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे अफ़ग़ान नागरिकों को तालिबान लड़ाकों के हाथों हिंसा का सामना करना पड़ रहा है.
मंगलवार को मीडिया में ऐसी तस्वीरें देखी गईं जिनमें एयरपोर्ट के आसपास लोगों और बच्चों के चेहरे ख़ून से लथपथ थे.
कनाडाई सशस्त्र सेना के प्रवक्ता के हवाले से समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कहा है कि कनाडा अफ़ग़ानिस्तान में फंसे ऐसे आम नागरिकों को निकालने के लिए सैन्य उड़ानें जारी रखेगा जो "कनाडा के साथ क़रीबी संबंधों के कारण ख़तरे में हो सकते हैं."
इससे पहले अमेरिका ने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद और काबुल एयपोर्ट आ रहे अपने नागरिकों की रक्षा की ज़िम्मेदारी वो नहीं ले सकेगा.
अमेरिकी मीडिया के अनुसार अमेरिकी नागरिकों को एक ईमेल भेजा गया है जिसके अनुसार उन्हें वक्त पर काबुल एयपोर्ट पहुंचने को कहा गया है और कहा गया है कि सफ़र के दौरान उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उनकी ख़ुद की होगी.
ईमेल के अनुसार "अमेरिकी सरकार जल्द ही वहां से कई उड़ानें शुरू करने जा रही है."
अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने बीबीसी से इस संदेश की पुष्टि की और कहा कि जिन लोगों ने सरकार से मदद मांगी है उन्हें ईमेल के ज़रिए जानकारी दी गई है.
माना जा रहा है कि हज़ारों अमेरिकी नागरिक अभी अफ़ग़ानिस्तान में फंसे हैं, हालांकि इनकी सही संख्या के बारे में अभी कोई जानकारी नहीं है.
बाइडन ने तालिबान के साथ हुआ समझौता तोड़ा- माइक पेंस
अमेरिका के पूर्व उप-राष्ट्रपति माइक पेंस ने अमेरिका के अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलने के लिए राष्ट्रपति जो बाइडन की आलोचना की है.
अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल में उनका एक लेख प्रकाशित हुआ है जिसमें उन्होंने इस फ़ैसले के बारे में लिखा है - "ईरान बंधक संकट के बाद देश की विदेश नीति का इस तरह का अपमान पहले कभी नहीं हुआ."
उन्होंने लिखा कि इस फ़ैसले के कारण दुनियाभर में अमेरिका की बदनामी हुई है और अमेरिका के सहयोगियों का उस पर भरोसा कम हो सकता है. साथ ही इस कारण दुश्मन भी अमेरिका की परीक्षा लेने की कोशिश कर सकते हैं.
उन्होंने लिखा कि इस फ़ैसले से उन बहादुर अमेरिकी सैनिकों का अपमान हुआ है जिन्होंने 9/11 की घटना के बाद चरमपंथियों को सज़ा दे कर अमेरिकियों को न्याय दिलाया और बीते 20 सालों में अफ़ग़ानिस्तान में काम किया.
पेंस ने दावा किया कि राष्ट्रपति जो बाइडन ने उस समझौते को तोड़ दिया है जो पूर्व प्रशासन ने तालिबान के साथ किया था.
पेंस ने कहा कि समझौते के अनुसार तालिबान के अमेरिकियों पर हमले रोकने की शर्त के साथ अफ़ग़ानिस्तान से चरणबद्ध तरीके से अमेरिकी सेना को बाहर निकाला जाना था. इसके साथ ही अमेरिका को वहां पर चरमपंथी संगठनों के पनपने को रोकना था और अफ़ग़ान नेताओं से बातचीत कर वहां नई सरकार बनाने में मदद करनी थी.
पेंस ने दावा किया कि बाइडन ने ये कह कर समझौते का उल्लंघन किया कि अमेरिकी सेनाएं कई महीनों तक अफ़ग़ानिस्तान में रहेंगी और इसके जवाब में तालिबान ने इलाक़ों पर कब्ज़ा करने का अपना अभियान छेड़ दिया.
लेकिन कुछ बुद्धिजीवियों ने पेंस की आलोचना की है.
वरिष्ठ पत्रकार थॉमस जोसिलिन ने कहा है कि तालिबान ने भी समझौते का पूरी तरह से पालन नहीं किया है.
हालांकि थॉमस इस बात से सहमत हैं कि तालिबान के लड़ाकों ने अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकियों पर हमले नहीं किए.
अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़े के बारे में क्या कह रहे हैं दूसरे देश
अमेरिका
अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़े के बाद फ़िलहाल अमेरिका सक्रिय रूप से संगठन के साथ बातचीत कर रहा है.
अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में फंसे अमेरिकी और मित्र देशों के लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की अपनी कोशिशें तेज़ कर दी हैं.
इस बीच अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि वो ताक़त के इस्तेमाल से सत्ता में आई तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार को मान्यता नहीं देगा.
मंगलवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने कहा कि "अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान को बीस सालों तक अपना ख़ून, पसीना और अपने आंसू दिए हैं."
यूरोपीय संघ
यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रमुख जोसेप बुरेल के अनुसार संघ भले ही चरमपंथी संगठन तालिबान की सरकार को मान्यता न दे, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की मदद के लिए वो तालिबान से चर्चा करना जारी रखेगा.
मंगलवार को उन्होंने कहा, "हमने कभी ऐसा नहीं कहा कि हम तालिबान को मान्यता देंगे."
ब्रिटेन
ब्रितानी विदेश मंत्री डोमिनिक राब ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान को दी जा रही मानवीय मदद को ब्रिटेन 10 फ़ीसदी बढ़ाएगा.
उन्होंने ये स्पष्ट नहीं किया है कि ब्रिटेन सरकार, अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सरकार को मान्यता देगी या नहीं.
हालांकि एक दिन पहले ब्रितानी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा था कि मुल्कों को तालिबान सरकार को मान्यता देने में किसी तरह की जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए.
मंगलवार को बोरिस जॉनसन ने कहा है कि आतंकवाद के उभरते ख़तरे से बचने और अफ़ग़ानिस्तान के लोगों की मदद के लिए बीते बीस सालों में अफ़ग़ानिस्तान में जो बढ़त हासिल की गई है, उसे बनाए रखा जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि इस पर अधिक चर्चा जी-7 देशों के सम्मेलन में की जाएगी.
ब्रितानी सरकार ने कहा है कि काबुल पर तालिबान के कब्ज़े के बाद वो क़रीब 20,000 अफ़ग़ान नागरिकों को अपने यहां पनाह देगा. सरकार ने कहा कि पहले साल 5,000 शरणार्थियों के अलावा ब्रिटेन के लिए काम कर रहे 5,000 अफ़ग़ानों को यहां रहने की अनुमति दी जाएगी.
नेटो
नेटो ने अफ़ग़ानिस्तान को दी जाने वाली सभी तरह की मदद को रोक दिया है. नेटो प्रमुख जेन्स स्टोल्टेनबर्ग ने कहा कि नेटो मदद देना तभी शुरू कर सकता है जब वहां कोई 'समावेशी सरकार' बन जाए.
कनाडा
कनाडा ने कहा है कि वो तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान के प्रशासक के रूप में स्वीकृति नहीं देगा.
कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा कि तालिबान को मान्यता देना एक चरमपंथी संगठन को मान्यता देने के जैसा होगा.
पाकिस्तान
पाकिस्तान के सूचना मंत्री ने मंगलवार को कहा कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय ताक़तों के साथ चर्चा के बाद ही पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सत्ता को स्वीकार करने या न करने के बारे में कोई फ़ैसला लेगा.
युगांडा
युगांडा के अधिकारियों ने बीबीसी को बताया है कि अमेरिकी सरकार की गुज़ारिश के बाद अफ़ग़ानिस्तान छोड़ कर भागे 2,000 लोगों को वो पनाह देगा.
500 शरणणार्थियों का पहला दस्ता आज एंतेबे पहुंचेगा.
युगांडा का कहना है कि आने वाले शरणार्थियों का कोविड-19 टेस्ट किया जाएगा और उन्हें बसाने से पहले आइसोलेशन सेटंर्स में रखा जाएगा. युगांडा ने स्पष्ट किया है कि इसका ख़र्च अमेरिका देने वाला है.
भारत के लिए स्थिति हो सकती है मुश्किल
अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़े के बाद दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव आ गया है. इसके साथ ही भारत के लिए अब स्थिति पहले से अधिक मुश्किल हो गई है.
पाकिस्तान और चीन के साथ लंबे वक्त से भारत के सीमा से जुड़े विवाद हैं. ऐसे में रूस और चीन ने अगर किसी रूप में तालिबान सरकार को मान्यता दे दी तो भारत के लिए स्थिति और मुश्किल हो सकती है.
लैंकास्टर यूनिवर्सिटी में राजनीति के प्रोफ़ेसर अफ़ग़ानिस्तान पर किताब लिख चुके अमलेंदु मिश्रा कहते हैं कि भारत के लिए ये बुरे और अधिक बुरे के बीच चुनाव करने का वक्त है और उसे बातचीत के सभी रास्ते खुले रखने होंगे.
अफ़ग़ानिस्तान में 20 साल के युद्ध से क्या हासिल?
अफ़ग़ान नागरिक तालिबान के 20 साल पहले के दमनकारी शासन की यादों से सहमे हुए हैं.
दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान से सेनाएं हटाने के फ़ैसले को सही ठहराया है. लेकिन उन्हें अपने ही देश में किन सवालों का सामना करना पड़ रहा है,
अफ़ग़ानिस्तान में जाना अमेरिकी इतिहास का 'सबसे ग़लत फ़ैसला' - ट्रंप
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अफ़ग़ानिस्तान 'जाना अमेरिका के इतिहास का सबसे ग़लत फ़ैसला था.'
फ़ॉक्स न्यूज़ के संवाददाता सौं हैनिटी को दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि "अमेरिकी सेना दुनिया की सबसे ताक़तवर सेना है और जो हो रहा है उसके कारण हमारी बदनामी हो रही है. मध्यपूर्व में जाने का फ़ैसला हमारे लिए अब तक का सबसे बुरा फ़ैसला था. इस फ़ैसले के कारण हमें न केवल करोड़ों डॉलर का नुक़सान हुआ बल्कि लाखों लोगों की जानें भी गईं."
"हमने मध्यपूर्व को तबाह कर दिया है. आज हम फिर से वहीं खड़े हैं जहां 20-21 साल पहले थे. हमने इन सालों में जो कुछ निर्माण किया वो सब तबाह हो गया है. ऐसा लगता है कि हमने रेत के दलदल में पैर रखा और वहां फंस गए."