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भारतीय रक्षा मंत्रालय ने देश में अब तक हुए युद्ध, सैन्य अभियानों और सेना से जुड़ी अन्य जानकारियों को सार्वजनिक करने का ऐलान किया है.
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भारतीय रक्षा मंत्रालय ने देश में अब तक हुए युद्ध, सैन्य अभियानों और सेना से जुड़ी अन्य जानकारियों को सार्वजनिक करने का ऐलान किया है.
रक्षा मंत्रालय ने शनिवार को एक के बाद एक कई ट्वीट करके इस बारे में सिलसिलेवार ढंग से जानकारी दी.
इन ट्वीट्स में बताया गया है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने युद्ध,युद्ध के दौरान हुए संवाद, सैन्य ऑपरेशन और सेना के इतिहास से जुड़ी जानकारियों को गोपनीयता सूची से हटाकर सार्वजनिक करने की पॉलिसी को मंज़ूरी दे दी है.
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इन जानकारियों के प्रकाशन की मंज़ूरी और इन्हें प्रकाशित करने की ज़िम्मेदारी हिस्ट्री डिवीज़न की होगी.
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक़,“युद्ध को इतिहास को समय से प्रकाशित होने पर लोगों को घटनाओं की सही जानकारी मिलेगी, शैक्षिक रिसर्च के लिए प्रमाणिक सामग्री उपलब्ध होगी और साथ ही इससे ग़ैरज़रूरी अफ़वाहों को दूर करने में भी मदद मिलेगी.”
इस नीति मुताबिक़ सामान्य तौर पर रिकॉर्ड को 25 साल के बाद सार्वजनिक किया जाना चाहिए.
रक्षा मंत्रालय ने अपने ट्वीट में कहा, ‘‘युद्ध और सैन्य अभियानों के इतिहास को जुटाने के बाद बाद 25 साल या उससे पुराने रिकॉर्ड्स की जाँच विशेषज्ञ करेंगे और इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय अभिलेखागार (नैशनल आर्काइव) को सौंप दिया जाएगा.”

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सऊदी अरब ने ऐलान किया है कि इस साल 60 हज़ार से ज़्यादा लोगों को हज करने की अनुमति नहीं होगी और ये सभी स्थानीय लोग ही होंगे.
सऊदी अरब ने अपने बयान में कहा है कि दुनिया भर में कोरोना संक्रमण मामलों को देखते हुए यह फ़ैसला लिया गया है.
सऊदी के विदेश मंत्रालय ने अपने ट्विटर हैंडल पर एक बयान जारी करते हुए यह सूचना दी.
बयान में कहा गया है, “हज और उमरा मंत्रालय ने लोगों की सुरक्षा और स्वास्थ्य में ध्यान रखते हुए इस बार कुछ ख़ास ऐहतियाती कदम उठाए हैं.”
क्या हैं इस बार के नियम?
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इस्लामिक देशों के समूह ओआईसी ने सऊदी अरब के इस फ़ैसले का समर्थन किया है.
ओआईसी के ट्वीट में कहा गया है, “ओआईसी के महासचिव डॉक्टर यूसुफ़ अल-ओथाईमीन सऊदी अरब के हज मंत्रालय के फ़ैसले का स्वागत करते हैं.”
पिछले साल भी हज यात्रा पर कोरोना महामारी का असर पड़ा था. पिछले साल तो सऊदी अरब में रह रहे सिर्फ़ 1,000 लोगों को ही हज के लिए चुना गया था.
सामान्य हालात में दुनिया भर से 15-20 लाख मुसलमान हर साल हज करते हैं.
कुछ दिनों पहले केंद्रीय मंत्री मुख़्तार अब्बास नक़वी ने कहा था कि हज मामले पर सऊदी अरब जो भी फ़ैसला लेगा, भारत उसका समर्थन करेगा.
हालाँकि इस बीच भारत ने हज यात्रा से जुड़ी तैयारियाँ पूरी कर ली थीं और हज पर जाने के इच्छुक लोगों के आवेदन भी ले लिए थे.
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पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजों के बाद से उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी बीजेपी में हलचल बढ़ गई है.
कभी पीएम मोदी के सीएम योगी आदित्यनाथ से नाराज़ होने की अटकल तो कभी नेतृत्व परिवर्तन के क़यास.
मुख्यमंत्री की दिल्ली दरबार में हाजिरी से लेकर दूसरी पार्टी के नेताओं से मुलाक़ातें. क्या है इसकी वजह?
2017 में 300 से ज़्यादा सीटें जीतने वाली बीजेपी क्या 2022 के विधानसभा चुनाव को लेकर नर्वस है?
बीबीसी हिंदी के कार्यक्रम इंडिया बोल में मोहनलाल शर्मा के साथ इसी मुद्दे पर चर्चा.
पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजों के बाद से उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी बीजेपी में हलचल बढ़ गई है.
कभी पीएम मोदी के सीएम योगी आदित्यनाथ से नाराज़ होने की अटकल तो कभी नेतृत्व परिवर्तन के क़यास.
मुख्यमंत्री की दिल्ली दरबार में हाजिरी से लेकर दूसरी पार्टी के नेताओं से मुलाक़ातें. क्या है इसकी वजह?
2017 में 300 से ज़्यादा सीटें जीतने वाली बीजेपी क्या 2022 के विधानसभा चुनाव को लेकर नर्वस है?
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जीएसटी काउंसिल की 44वीं बैठक में वैक्सीन पर 5% जीएसटी जारी रखने का फ़ैसला लिया गया है.
इसके अलावा कोविड के इलाज और प्रबंधन में जरूरी उपकरणों पर भी टैक्स में कटौती की गई है.
ये नई दरें सितंबर अंत तक लागू रहेंगी.
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि केंद्र वैक्सीन ख़रीद रहा है और लोगों को मुफ्त मुहैया करेगाएगा. टीकाकरण पर जीएसटी नहीं लगेगा.
वित्त सचिव तरुण बजाज के मुताबिक दरों में कटौती को एक-दो दिनों में लागू कर दिया जाएगा.

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कोविड से सम्बन्धित सेवाओं और उपकरणों में जीएसटी कटौती:
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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान पश्चिमी देशों से चीन के ख़िलाफ़ एकजुट होने की अपील करेंगे. यह जानकारी उनके एक सहयोगी ने बीबीसी को दी है.
ब्रिटेन में बैठक के दौरान राष्ट्रपति बाइडन विकासशील देशों में चीन के इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश की प्रतिस्पर्धा में नया गठबंधन बनाने का आह्वान कर सकते हैं.
अमेरिका और उसके सहयोगी देश चीन पर शिनजियांग प्रांत में मानवाधिकार उल्लंघन और जबरिया श्रम कराने के आरोप भी लगाते रहे हैं.
जी-7 देशों के नेता फविष्य में महामारी की रोकथान के लिए योजना के प्रति प्रतिबद्धता भी ज़ाहिर करेंगे.
ब्रितानी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन कोर्नवॉल के तटीय रिज़ॉर्ट कार्बिस बे में इस तीन दिवसीय सम्मेलन की मेज़बानी कर रहे हैं.

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बीबीसी के नॉर्थ अमेरिका एडिटर जॉन सोपेल के मुताबिक अमेरिकी शनिवार के सत्र को दुनियाभर में चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती देने के रूप में देख रहे हैं.
पश्चिमी देशों को लगता है कि चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को चुनौती दी जानी चाहिए. अपने इस अभियान के तहत चीन ने विकासशील देशों में अरबों डॉलर निवेश किए हैं.
अमेरिकी प्रशासन के शीर्ष अधिकारी ये साबित करना चाहते हैं कि पश्चिमी मूल्य बरकरार रहेंगे. उनका तर्क है कि चीन के निवेश की भारी क़ीमत है.
पश्चिमी देशों का मानना है कि शिनजियांग के लेबर कैंपों में वीगर मुसलमानों से ज़बरदस्ती काम करवाना नैतिक तौर पर ग़लत है और आर्थिक रूप से अस्वीकार्य है क्योंकि इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का चुनौती मिलती है.
जो बाइडन इस बात पर ज़ोर दे सकते हैं कि वैश्विक सप्लाई चैन में इस तरह के श्रम से बनाए गए उत्पाद नहीं होने चाहिए. बाइडन इसका विकल्प भी पेश कर सकते हैं.
बाइडन प्रशासन ने अभी ये नहीं बताया है कि इस वैश्विक प्रयास में पश्चिमी देशों की कितनी हिस्सेदारी होगी और ये कब शुरू होगा या पूरा होगा.
हालांकि ये स्पष्ट है कि पश्चिमी देश निरंतर ताक़तवर हो रहे चीन का मुक़ाबला करना चाहते हैं.

पश्चिमी देशों ने चीन के ख़िलाफ़ अब तक क्या किया है?
इसी साल अमेरिका, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और कनाडा ने चीन के ख़िलाफ़ कई तरह के प्रतिबंधों की घोषणा की थी.
प्रतिबंधों के तहत शिनजियांग प्रांत के कई शीर्ष अधिकारियों पर यात्रा प्रतिबंध लगाए गए थे और उनकी संपत्ति ज़ब्त की गई थी.
एक अनुमान के मुताबिक चीन के उत्तरी-पश्चिमी शिनजियांग प्रांत में 10 लाख से अधिक वीगर मुसलमान अवैध हिरासत में हैं.
चीन का तर्क है कि इन्हें पुनर्शिक्षा केंद्रों में रखा गया है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि अल्पसंख्यक मुसलमानों को प्रताड़ित किया जा रहा है.
चीन की सरकार पर वीगर महिलाओं की ज़बरदस्ती नसबंदी करने के आरोप भी लगे हैं. बच्चों को परिवारों से अलग किया जा रहा है.
इसी साल फरवरी में बीबीसी ने अपनी एक जांच रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें वीगर मुसलमानों के उत्पीड़न की कहानियां सामने आईं थीं.
हिरासत में ली गईं महिलाओं के व्यवस्थित बलात्कार और यौन उत्पीड़न की जानकारियां भी सामने आईं थीं.
पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के जवाब में चीन ने अपनी तरफ़ से प्रतिबंध लगा दिए थे.

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अल्जीरिया में संसदीय चुनाव के लिए वोट डाले जा रहे हैं. चुनाव को कई लोग संदेह की नज़रों से देख रहे हैं और इसके ख़िलाफ़ ज़ोरदार विरोध आंदोलन चल रहा है.
राजनीतिक अस्थिरता, तेल से देश की कमाई में गिरावट और कोरोना महामारी ने सरकार के किए गए कई सुधार वादों को प्रभावित किया है.
"अगर बदलाव चाहते हैं, तो अपना वोट डालें" इस साल चुनाव में यह नारा था. सरकार को हाल के चुनावों में हुए ऐतिहासिक रूप से कम मतदान जैसा ही इस चुनाव में होने का डर है.

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संसद की 407 सीटों के लिए 20 हज़ार से अधिक प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं और इस बार पहले से कहीं अधिक निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में हैं.
हालांकि इस बार के चुनाव में महिला प्रत्याशियों की संख्या क़रीब 50 फ़ीसद है.
अफ़्रीका के सबसे बड़े देश में राष्ट्रपति अब्देलअज़ीज़ बोटलिक के अप्रैल 2019 में इस्तीफ़ा देने के बाद से तीसरी बार चुनाव हो रहे हैं. चुनाव के नतीजे सोमवार तक आने की उम्मीद है.

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पंजाब में आगामी विधानसभा चुनावों में शिरोमणी अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी एक साथ मैदान में उतरेंगे.
2022 में होने वाले चुनावों के मद्देनज़र दोनों पार्टियों ने आज एक संवाददाता सम्मेलन में औपचारिक तौर पर गठबंधन की घोषणा की.
इस मौक़े पर शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और बसपा के राष्ट्रीय महासचिव सतीश मिश्रा मौजूद थे. सुखबीर सिंह बादल ने कहा कि दोनों पार्टियां किसानों और मज़दूरों के हक़ों की लड़ाई लड़ती रही हैं.
उन्होंने कहा कि इस गठबंधन का उद्देश्य पंजाब की अर्थव्यवस्था का विकास करना है.
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दोनों पार्टियों में ये भी तय हुआ है कि बसपा 20 सीटों पर और बाकी की 97 सीटों पर अकाली दल चुनाव लड़ेगी.
वहीं बसपा नेता सतीश मिश्रा ने दावा किया कि सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व में गठबंधन पंजाब में सरकार बनाएगा.

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द पुलित्ज़र प्राइज़ बोर्ड ने उस युवती को ‘स्पेशल जर्नलिज़्म अवॉर्ड’ से सम्मानित किया है जिन्होंने एक गोरे पुलिस अफ़सर द्वारा काले अमेरिकी, जॉर्ज फ़्लॉयड की हत्या का वीडियो बनाया था.
पुलित्ज़र कमेटी ने कहा है कि वो 18 वर्षीय डारनेला फ़्रेज़ियर को उनके साहस के लिए यह विशेष पुरस्कार दे रही है.
उनके द्वारा बनाई गई वीडियो क्लिप ने ना सिर्फ़ जॉर्ड फ़्लॉयड को न्याय दिलवाया, बल्कि पूरे अमेरिका में नस्लीय भेदभाव के ख़िलाफ़ एक बड़े आंदोलन को जन्म दिया.
डारनेला के वीडियो क्लिप की वजह से ही एक अमेरिकी अदालत जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत के मामले में पूर्व पुलिस अधिकारी डेरेक शॉविन को हत्या का दोषी क़रार कर पायी थी. यह क्लिप जॉर्ज फ़्लॉयड के केस का सबसे अहम सबूत थी.
द पुलित्ज़र अवॉर्ड, पत्रकारिता के क्षेत्र में अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है.
डारनेला ने पिछले साल, 25 मई को यह वीडियो शूट किया था. तब वे अपने एक रिश्तेदार के साथ घटनास्थल के पास से पैदल गुज़र रही थीं.

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इसी साल डारनेला ने अदालत में कहा था कि “मैंने उस घटना का वीडियो इसलिए बनाना शुरू किया था क्योंकि वहाँ एक आदमी अपनी जान की भीख माँग रहा था और पुलिस अफ़सर फिर भी उसे टॉर्चर किये जा रहा था.”
डारनेला ने ही अपनी गवाही में कहा था कि “वे जॉर्ज फ़्लॉयड को ये कहते सुन पा रही थीं कि उन्हें साँस नहीं आ रही और वो लगातार अपनी माँ को बुला रहे थे.”
डारनेला के एक वीडियो ने ना सिर्फ़ अमेरिका में, बल्कि तमाम देशों में लोगों को गुस्से से भर दिया था, जिसके बाद वहाँ नस्लीय भेदभाव के ख़िलाफ़ विशाल प्रदर्शन हुए और लोगों के लिए पुलिस की हिरासत में जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत, पुलिसिया दमन के ख़िलाफ़ एक प्रतीक बन गई.
जॉर्ज फ़्लॉयड मर्डर केस की सुनवाई के दौरान डारनेला ने अदालत से कहा था कि “फ्लॉयड की मौत ने उनकी ज़िन्दगी को बिल्कुल बदलकर रख दिया है.”
वे सुनवाई के दौरान ये कहते हुए रो पड़ी थीं कि “जब मैं जॉर्ज फ़्लॉयड को देखते हूँ, तो मैं अपने पिता को भी देखती हूँ. अपने भाई को देखती हूँ, अपने अंकल को देखती हूँ क्योंकि ये सब ही तो काले हैं. और हमेशा इस डर में रहती हूँ कि उस दिन जॉर्ज की जगह इनमें से कोई भी हो सकता था.”

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अब यह स्पष्ट हो चुका है कि मौजूदा वक्त में हमारा सामना एक ऐसे वायरस से है जो एक से किसी दूसरे व्यक्ति में बहुत ही आसानी से, और शायद दोगुनी तेज़ी से फैलता है- और यह वुहान (चीन) में साल 2019 के अंत में पाये गए वायरस का नया रूप है.
हम यह जान चुके हैं कि यूके के केंट में सबसे पहले पाया गया कोरोना का 'एल्फ़ा वेरिएंट' पहले से ज़्यादा संक्रामक था. लेकिन 'डेल्टा वेरिएंट' जिसकी पहचान सबसे पहले भारत में हुई, वो उससे भी ज़्यादा संक्रामक और ख़तरनाक है.
और वायरस के 'इवॉल्व' होने यानी लगातार बदलने की ये प्रक्रिया अब भी जारी है.
तो क्या हम कोरोना के नये और ज़्यादा ख़तरनाक वेरिएंट्स की ना ख़त्म होने वाली परेड के बीच फंस गये हैं? या इसकी कोई सीमा भी है कि कोरोना वायरस आख़िर और कितना ख़तरनाक रूप अख़्तियार कर सकता है?
माजिद जहाँगीर
श्रीनगर से, बीबीसी हिन्दी के लिए

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भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा है कि केंद्र शासित प्रदेश के विभाजन की किसी तरह की कोई योजना नहीं है.
मनोज सिन्हा ने एक टीवी चैनल को दिये इंटरव्यू में कहा कि इस तरह की अफ़वाहें उन लोगों द्वारा फैलाई जा रही हैं जिनके अपने निजी स्वार्थ हैं.
दो साल पहले भारत सरकार ने इस सूबे को दो हिस्सों में बाँट दिया था और इसका दर्जा पूर्ण-राज्य से घटाकर केंद्र शासित प्रदेश कर दिया गया था.
पिछले कुछ दिनों से जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में बढ़ी सैन्य मूवमेंट को देखते हुए कई जगहों पर ये कयास लगाये जा रहे थे कि फिर से इस क्षेत्र का बँटवारा किया जा सकता है.
लेकिन उप-राज्यपाल ने इसे अफ़वाह बताते हुए, इन चर्चाओं का खंडन किया है.
दरअसल, बीते दिनों कश्मीर और जम्मू के कुछ हिस्सों में सुरक्षाबलों की संख्या अचानक बढ़ा दी गई थी जिससे कई अफ़वाहों और अटकलों का बाज़ार गर्म हो उठा. इनमें सबसे बड़ी अफ़वाह जम्मू-कश्मीर के विभाजन की थी.
पुलिस के अधिकारियों ने बताया है कि सुरक्षाबलों की तैनाती में बदलाव एक रुटीन मामला है. हालांकि, जो सुरक्षाबल इधर-उधर जाते दिखाई दिये, वो चुनावी ड्यूटी पर गये थे जिन्हें वापस बुलाया गया है. मनोज सिन्हा ने भी अपने इंटरव्यू में इसी बात को दोहराया.
5 अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया गया था, तो उससे पहले भी जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों की भारी तैनाती की गई थी. साथ ही कश्मीर में मौजूद पर्यटकों और अमरनाथ यात्रियों को कश्मीर छोड़ने के लिए कह दिया गया था.
हालांकि, उस समय प्रदेश के राज्यपाल रहे सत्यपाल मलिक ने भी यही कहा था कि “जो कुछ भी जम्मू-कश्मीर में कहा जा रहा है, वो सब अफ़वाहें हैं.” लेकिन बाद में ये अफ़वाहें, सच साबित हुईं.
जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा ख़त्म करने के बाद कश्मीर में लंबे समय तक तालाबंदी रही थी और सैकड़ों राजनैतिक कार्यकर्ताओं समेत कुछ मुख्य विपक्षी नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया था.

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अमेरिका के शीर्ष स्वास्थ्य विशेषज्ञ और राष्ट्रपति के शीर्ष सलाहकार डॉक्टर एंथनी फ़ाउची ने कहा है कि अगर कोविड वैक्सीन की दो डोज़ के बीच फ़र्क ज़्यादा रखा गया तो इससे कोरोना के किसी वैरिएंट से संक्रमण का ख़तरा बढ़ सकता है.
भारतीय टीवी चैनल एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में डॉक्टर फ़ाउची ने कहा, "आदर्श तौर पर फ़ाइज़र की एमआरएनए कोरोना वैक्सीन की दो डोज़ के बीच तीन सप्ताह और मॉडर्ना की एमआरएनए वैक्सीन की दो डोज़ के बीच में फ़र्क चार सप्ताह का होना चाहिए."
उन्होंने कहा, "अगर आप वैक्सीन की डोज़ के बीच के अंतराल को बढ़ाते हैं तो इससे आपके किसी कोरोना वायरस वैरिएंट से संक्रमित होने का ख़तरा बढ़ जाता है. हमने यूके में यही देखा है, वहां वैक्सीन की डोज़ के बीच के अंतराल को बढ़ाया गया था, वहां नए वैरिएंट का ख़तरा बढ़ा गया. हमारी यही राय है कि आप तय वक्त पर ही वैक्सीन लगवाएं."
हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि "अगर वैक्सीन की सप्लाई कम है तो" वैक्सीन की डोज़ के बीच के अंतराल को बढ़ाना ज़रूरी हो सकता है.
बीते महीने भारत सरकार ने भारत में कोविशील्ड के नाम से दी जा रही एस्ट्राज़ेनेका-ऑक्सफ़र्ड की वैक्सीन की दो डोज़ के बीच के अंतराल को बढ़ा कर 12 से 16 सप्ताह कर दिया था.
इससे पहले कोविशील्ड की दो डोज़ के बीच छह से आठ हफ़्ते का अंतर रहता था. उससे पहले ये अंतराल चार से छह हफ़्ते था.
सरकार के इस फ़ैसले की तीखी आलोचना हुई थी. कइयों ने कहा कि वैक्सीन की भारी कमी के कारण सरकार ने दो डोज़ के बीच के अंतराल को बढ़ा दिया है. हालांकि इस पर नीति आयोग के सदस्य डॉक्टर विनोद पॉल ने कहा कि ये फ़ैसला विज्ञान पर आधारित है.

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उससे पहले मार्च में मेडिकल जर्नल द लैंसट में छपे एक रिसर्च में भी इस बात की पुष्टि की गई थी कि दो डोज़ के बीच 12 हफ़्तों का अंतराल हो तो वैक्सीन का असर बढ़ता है.
डॉक्टर फ़ाउची ने कहा कि कोरोना वायरस ने नए वेरिएंट को हराने के लिए ज़रूरी है कि लोगों को जल्द से जल्द टीका लगाया जाए.
उन्होंने भारत में सबसे पहले पाए गए वायरस के डेल्टा वेरिएंट को लेकर चिंता जताई और कहा कि "जिन लोगों को टीका नहीं लगा है अगर उनमें डेल्टा वेरिएंट फैलना शुरू होता है तो ये बड़ी तेज़ी से अपने पैर पसार लेता है."
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार देश में बीते 24 घंटों में कोरोना संक्रमण के 84,332 के नए मामले दर्ज किए गए हैं जो बीते 70 दिनों में सबसे कम है.
वहीं मंत्रालय के अनुसार बीते 24 घंटों में कोरोना के कारण देश में 4,002 लोगों की मौत हुई है.
63 दिनों में पहली बाद देश में एक्टिव केस की संख्या 11 लाख से कम हुई है. बीते 24 घंटों के आंकड़ों के अनुसार देश में एक्टिव केस की संख्या घट कर 10,80,690 हो गई है.
मंत्रालय के अनुसार देश में कोविड-19 रिकवरी रेट अब 95.07 फीसदी हो गई है जबकि साप्ताहिक पॉज़िटिविटी दर अब पांच फ़ीसदी से कम हो कर 4.94 फीसदी तक हो गई है.


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भारतीय कोरोना वैक्सीन कोवैक्सीन को अमेरिका में आपातकालीन इस्तेमाल की अनुमति न मिलने पर नीति आयोग के स्वास्थ्य सदस्य डॉक्टर वीके पॉल ने कहा है कि इस फ़ैसले का सम्मान किया जाना चाहिए.
उन्होंने कहा कि हर देश का अपना विनियामक सिस्टम होता है जहां पर कुछ चीज़ें दूसरों से मिलती-जुलती हैं जबकि कुछ चीज़ें अलग होती हैं.
अमेरिका के फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के अनुमति न देने के फ़ैसले पर डॉक्टर पॉल ने कहा, “वैज्ञानिक ढांचा एक ही है लेकिन इसके सूक्ष्म अंतर संदर्भ के अनुसार हैं.”
उन्होंने कहा, “ये सभी वैज्ञानिक विचार हैं और इन्हें ध्यान में रखते हुएकुछ-कुछ बारीकी अंतर हो सकते हैं, ख़ासकर के वहां पर जिन देशों में विज्ञान बहुत मज़बूत है. हमाराउत्पादन मज़बूत है. उन्होंने यह फ़ैसला लिया है, हम सम्मान करते हैं.”

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FDA ने ऑक्यूजन की कोवैक्सीन के आपातकालीन इस्तेमाल की अपील को ख़ारिज कर दिया था. ऑक्यूजन भारत बायोटेक का अमेरिका में साझेदार है और उसने 10 जून को इसके लिए अनुमति मांगी थी.
वहीं, कोविशील्ड वैक्सीन की दूसरी डोज़ के अंतर पर भी डॉक्टर पॉल ने बयान दिया है.
उनका कहना है कि कोविशील्ड वैक्सीन की दो डोज़ के बीच अंतर को लेकर घबराने की ज़रूरत नहीं है.
उन्होंने कहा, “ये सभी फ़ैसले बेहद सावधानी से लेने की ज़रूरत है. हमें याद रखने की ज़रूरत है कि हम कब अंतर को बढ़ाएंगे, हमें उन लोगों के ख़तरे की भी चिंता करने की ज़रूरत थी जिन्होंने सिर्फ़ एक डोज़ लिया है.”

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कोविड-19 की वैक्सीन की सुरक्षा को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बयान जारी किया है. उसका कहना है कि यह मौतों और अस्पताल में भर्ती होने से रोकने में अहम भूमिका अदा करती है.
WHO से एक सवाल यह भी पूछा गया है कि यह वैक्सीन कितने समय तक लोगों को सुरक्षा प्रदान करती है तो इस पर उसका कहना है कि उसके पास इस बारे में अब तक पूरी जानकारी मौजूद नहीं है.
उसने कहा है कि अब तक जितनी भी वैक्सीन मौजूद हैं, उसके बारे में अभी तक इसको लेकर कोई जानकारी नहीं है कि वे कब तक सुरक्षा प्रदान करती हैं लेकिन अगले 12 महीनों में इसके बारे में ठीक जानकारी मिल पाएगी.
WHO ने कहा है, “कई वैक्सीन की सुरक्षा अलग-अलग हो सकती है. उदाहरण के तौर पर सीज़नल इंफ़लुएंज़ा वैक्सीन हर साल दी जाती है क्योंकि वायरस अपना रूप बदलता रहता है और कई महीनों बाद वैक्सीन की सुरक्षा कम होती चली जाती है.”
“वहीं खसरा या चेचक की वैक्सीन कई सालों तक या ज़िंदगी भर सुरक्षा देती है. सार्स-सीओवी-2-कोरोनावायरस में तब्दीली होती है और यह कई वैरिएंट बनाती है, दुनिया के कई देशों में यह स्थापित हो चुका है. वैज्ञानिक समुदाय और नियामक तेज़ी से यह जांच कर रहे हैं कि क्या वर्तमान वैक्सीन नए वैरिएंट से लंबी सुरक्षा दे पाएगी.”
“कई वैक्सीन निर्माता अभी कई तरह के वैरिएंट को लेकर वैक्सीन बना रहे हैं और ऐसी उम्मीद है कि इन वैक्सीन के साथ बूस्टर शॉट्स भी होंगे जो कि कई वैरिएंट के ख़िलाफ़ सुरक्षा बढ़ाएंगे.”
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