कोलकाता से,
बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री
ममता बनर्जी के चुनाव प्रचार पर 24 घंटे की पाबंदी के मुद्दे पर राज्य की राजनीति गरमा
गई है.
खुद ममता और उनकी
पार्टी टीएमसी ने आयोग के इस फ़ैसले को अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक बताया है. ममता
इसके ख़िलाफ़ मंगलवार दोपहर 12 बजे से कोलकाता में
गांधी प्रतिमा के पास धरने पर बैठेंगी.
दूसरी ओर,
सीपीएम और कांग्रेस ने इस फ़ैसले का समर्थन तो
किया है लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाया है कि आख़िर आयोग बीजेपी नेताओं के ख़िलाफ़
कोई कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है?
टीएमसी ने शीतलकुची
की घटना पर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष की टिप्पणी के लिए आयोग से उनके प्रचार
पर भी पाबंदी लगाने की मांग की है.
घोष ने कहा था कि
अगर हालात नहीं सुधरे तो जगह-जगह शीतलकुची जैसी घटना हो सकती है.
हाल ही में टीएमसी
में शामिल होने वाले यशवंत सिंह ने कहा, “चुनाव आयोग की निष्पक्षता के प्रति तो हमारे मन में शुरू से ही संदेह था. अब यह
दिन के उजाले की तरह साफ़ हो गया है.’’
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावआयोग मोदी-शाह के
निर्देश पर काम कर रहा है.
टीएमसी प्रवक्ता कुणाल
घोष कहते हैं, “आयोग के इस फ़ैसले से उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं.
लोग बैलट के जरिए इसका माकूल जवाब देंगे.”
बीजेपी ने चुनाव
आयोग के फैसले का स्वागत किया है.
प्रदेश बीजेपी
महासचिव सायंतन बसु कहते हैं, “चुनावों के समय आयोग ही सबसे ऊपर होता है.
लेकिन ममता यह बात नहीं समझती. आयोग के पास संवैधानिक अधिकार हैं.”
दूसरी ओर, लेफ़्ट और कांग्रेस ने आयोग के फैसले को
सही बताया है लेकिन साथ ही कहा है कि आयोग को बीजेपी नेताओं के खिलाफ भी ऐसी ही
पाबंदी लगानी चाहिए थी.
सीपीएम नेता सुजन
चक्रवर्ती कहते हैं, “ममता को दी गई शो कॉज नोटिस के संदर्भ में
ही शायद आयोग ने यह पाबंदी लगाई है. लेकिन क्या प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष
या सायंतन बसु और राहुल सिन्हा जैसे नेताओं के ख़िलाफ़ भी ऐसी कार्रवाई की जा सकती
है?’’
वो कहते हैंकि अगर ऐसी कार्रवाई
नहीं हुई तो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल जरूर खड़े होंगे.”
कांग्रेस के
वरिष्ठ नेता अब्दुल मन्नान कहते हैं, “चुनाव आयोग को अगर अपनी
निष्पक्षता साबित करनी है तो उसे प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करनी चाहिए.”