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उत्तराखंड: सीएम रावत ने बताया- 125 लोग लापता, 7 शव बरामद

उत्तराखंड के चमोली ज़िले में आज सुबह ग्लेशियर टूटने से धौलीगंगा नदी में बाढ़ आ गई. ऋषिगंगा और तपोवन पावर प्रोजेक्ट बाढ़ में बह गए.

लाइव कवरेज

  1. वर्तमान हालात की तुलना आपातकाल से नहीं करनी चाहिएः एन राम

    द हिंदू ग्रुप के निदेशक एन राम ने कहा है कि वर्तमान समय की तुलना आपातकाल से नहीं की जानी चाहिए.

    उन्होंने कहा कि "अभी ऐसी जगहें हैं जहाँ कोई भी कड़ी राय दे सकता है और दमनकारी शक्तियों से लड़ सकता है."

  2. कोरोनाः 12,059 के नए मामले, 78 की मौत

  3. सचिन और लता को ट्वीट करने के लिए कहना ग़लत: राज ठाकरे

    महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने किसान आंदोलन को लेकर भारत रत्न सचिन तेंदुलकर और लता मंगेशकर के ट्वीट पर कहा है कि सरकार की ओर से इन्हें ट्वीट करने के लिए नहीं कहना चाहिए.

    राज ठाकरे ने कहा कि इन दोनों हस्तियों को अपने महान काम के लिए जाना जाता है और इन्हें इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

    राज ठाकरे शनिवार को प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा, ''लता मंगेशकर और सचिन एक बार जन्म लेते हैं और सभी सरकारों को चाहिए कि उनकी पवित्रता कायम रखें. ये सभी सरल हृदय हैं लेकिन इनके योगदान की कोई बराबरी नहीं कर सकता. इन्हें राजनीति में नहीं घसीटना चाहिए.''

    राज ठाकरे ने अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ये भी कहा कि ये सब काम अक्षय कुमार को करने दो पर भारत रत्न से ऐसा नहीं करवाना चाहिए.

    राज ठाकरे ने कहा, ''रिहाना के एक ट्वीट से सरकार हिल गई. रिहाना कौन है? वो हमारे देश के काम में हस्तक्षेप नहीं कर रही है. अगर ऐसा है तो 'अगली बार ट्रंप सरकार' वाला भाषण भी उचित नहीं है.'' प्रधानमंत्री को चाहिए कि किसानों के मुद्दों को सुलझाएं

    किसान आंदोलन के समर्थन में कुछ विदेशी हस्तियों के आने की मोदी सरकार ने आलोचना की थी और सरकार ने #IndiaTogether और #IndiaAgainstPropaganda से ट्वीट करना शुरू किया था.

    इसी हैशटैग का इस्तेमाल करते हुए सचिन और लता मंगेशकर ने भी ट्वीट किए थे. सचिन ने अपने ट्वीट में कहा था कि भारत अपने आंतरिक मुद्दों को सुलझाने में सक्षम है.

    लता मंगेशकर ने भी ऐसा ही ट्वीट किया था और कहा था कि भारत के लोग अपनी चीज़ें ख़ुद से ही सुलझा लेंगे. इन दोनों के ट्वीट को लेकर आलोचना होने लगी थी कि मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्य कोई भारत की बहस नहीं है बल्कि ये अंतरराष्ट्रीय मूल्य हैं.

  4. यूपी, उत्तराखंड में चक्का जाम नहीं करने पर किसान नेताओं में मतभेद

    तीन नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ 26 नवंबर से दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों ने शनिवार को देशव्यापी चक्का जाम किया लेकिन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को इससे दूर रखा गया था.

    भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने इन दोनों राज्यों में चक्का जाम नहीं करने की घोषणा की थी.

    अब टिकैत के उस फ़ैसले को लेकर किसान नेताओं के बीच मतभेद हो गया है. वरिष्ठ किसान नेता दर्शनपाल सिंह ने इसे जल्दबाज़ी में बिना सलाह-मशविरा लिया गया फ़ैसला बताया है.

    शनिवार को देशव्यापी चक्का जाम के बाद जब पत्रकारों ने इन दो राज्यों में चक्का जाम नहीं करने के बारे में वरिष्ठ किसान नेता दर्शनपाल सिंह से सवाल किया तो उन्होंने कहा, "यह जल्दबाज़ी में लिया गया फ़ैसला है, अच्छा होता कि वो मीडिया में इसकी घोषणा करने से पहले संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के साथ इस बारे में पहले बातचीत कर लेते."

    उन्होंने कहा, “टिकैत जी को लगा कि उत्तराखंड और यूपी में दंगे हो सकते हैं, इसके बाद तुरंत उन्होंने प्रेस में बयान दिया. अगर और लोगों से बात करके कोई बयान देते तो अच्छा होता. हालाँकि बाद में उन्होंने हमसे बात की और फिर यह संयुक्त फ़ैसला था. लेकिन मैं मानता हूं कि उन्हें जल्दबाज़ी में ऐसा नहीं करना चाहिए था.”

    साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एसकेएम के साथ सब कुछ ठीक चल रहा है और लोगों को यह नहीं मान लेना चाहिए कि नेताओं के बीच मतभेद चल रहे हैं.

    शुक्रवार को जब राकेश टिकैत ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चक्का जाम नहीं करने का फ़ैसला किया था तब उनसे वजह पूछी गई थी तो उन्होंने कहा था कि, उनको कभी भी दिल्ली बुलाया जा सकता है और इन दोनों राज्यों के लोगों को भविष्य के लिए स्टैंडबाई पर रखा गया है."

    इसके बाद उन्होंने यह भी कहा था, "इन जगहों पर हिंसा फ़ैलाने का प्रयास किया जा सकता है, इसलिए हमने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चक्का जाम नहीं करने का फ़ैसला किया है."

    शनिवार को चक्का जाम के बाद गाज़ीपुर में अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार को जब ठीक लगे हमसे बात कर ले. हमारा मंच भी वही है और पंच भी वही.

    उन्होंने यह भी कहा कि किसान सरकार से किसी दबाव में बातचीत नहीं करेंगे, जब प्लेटफॉर्म बराबरी का होगा तभी बातचीत होगी.

    इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरकार तीनों क़ानूनों को निरस्त नहीं करती तो वे दो अक्तूबर तक दिल्ली की सीमा पर बैठे रहेंगे.

    उधर सिंघू बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ नेता दर्शनपाल सिंह ने भी कहा कि किसान संगठन सरकार के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन उन्हें नया प्रस्ताव लेकर आना चाहिए क्योंकि नए कृषि क़ानूनों को एक से डेढ़ साल तक के लिए निलंबित रखने का उनका मौजूदा प्रस्ताव उन्हें स्वीकार नहीं है.

    उन्होंने कहा कि "हम बातचीत के लिए तैयार हैं. गेंद सरकार के पाले में है. हमने उन्हें स्पष्ट रूप से बताया कि पिछला प्रस्ताव हमें स्वीकार्य नहीं है. अब उन्हें नए प्रस्ताव के साथ आना चाहिए."

  5. सचिन अपने क्षेत्र से अलग विषय पर बोलने में सावधानी बरतेंः शरद पवार

    एनसीपी नेता शरद पवार ने मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को नसीहत दी है कि वो किसी दूसरे क्षेत्र के बारे में बोलते वक़्त सावधानी बरतें.

    हाल में जब रिहाना और ग्रेटा थनबर्ग जैसी अंतरराष्ट्रीय हस्तियों ने किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट किए थे तो कुछ भारतीय हस्तियों की तरह सचिन तेंदुलकर ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी थी और लिखा था कि "भारत की संप्रभुता से समझौता नहीं किया जा सकता. भारत में जो भी हो रहा है बाहरी ताकतें उसकी दर्शक हो सकती हैं लेकिन प्रतिभागी नहीं. भारतीय भारत को जानते हैं और फ़ैसला उन्हें ही लेना है. आइए एक राष्ट्र के रूप में एकजुट रहें."

    समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़, शरद पवार ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “उन्होंने (भारतीय हस्तियों ने) जो स्टैंड लिया उस पर कई लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. सचिन तेंदुलकर को मेरी सलाह है कि वो अपने क्षेत्र के बाहर के किसी विषय पर बोलते हुए सावधानी बरतें.”

    पवार ने केंद्र सरकार पर किसानों के आंदोलन को बदनाम करने का आरोप लगाया.

    उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार उन्हें खालिस्तानी और आतंकवादी कहकर किसान आंदोलन को बदनाम करने की कोशिश कर रही है. देश के अन्नदाता का अपमान करने का ये अच्छा तरीक़ा नहीं है.”

    पवार ने कहा कि अगर प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और नितिन गडकरी जैसे वरिष्ठ नेता आगे आकर आंदोलनकारी किसानों से बात करते हैं तो समाधान निकला जा सकता है.

    उन्होंने कहा, “अगर वरिष्ठ नेता पहल करते हैं, तो किसान नेताओं को भी उनके साथ बैठना चाहिए.”

    साथ ही उन्होंने कहा, “आज़ादी के बाद से ऐसा कभी नहीं हुआ कि प्रदर्शनकारियों को सड़कों पर कीलें लगाकर रोका गया हो. पहले, पूरे देशभर से लोग प्रदर्शनकारी किसानों का समर्थन कर रहे थे. अब भारत के बाहर के लोग भी प्रदर्शनकारी किसानों को अपना समर्थन दे रहे हैं. सरकार को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए.”

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