चीन के एक बड़े उद्योगपति रहे लाई
शिओमिन को सुनाई गई मौत की सज़ा पर कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने चिंता ज़ाहिर की
है. इनका कहना है कि ‘शिओमिन के जुर्म के लिए यह बहुत ही ज़्यादा कड़ी सज़ा
है.’
लाई शिओमिन को साल 2018 में
गिरफ़्तार किया गया था. उन पर आरोप है कि उन्होंने लगभग दस साल के अंतराल में 280
मिलियन अमेरिकी डॉलर की रिश्वत ली. चीनी करेंसी युआन में यह रक़म और भी ज़्यादा
होती है.
कहा जा रहा है कि लाई शिओमिन को
सुनाई गई सज़ा, राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ‘भ्रष्टाचार विरोधी अभियान’ का हिस्सा है और इस अभियान के तहत
किसी को सुनाई गई ‘अब तक की सबसे कठोर सज़ा’ भी है.
चीनी अधिकारियों के अनुसार, लाई शिओमिन
ने ह्युआरोंग एसेट मैनेजमेंट कंपनी का चेयरमैन रहते हुए अपराध किया. उन्होंने 1999
में इस वित्तीय कंपनी की स्थापना की थी.
मंगलवार को, चीनी शहर तियानजिन की
एक अदालत ने लाई को सज़ा सुनाते हुए कहा कि ‘उनके अपराध से देश के हितों को भारी क्षति पहुँची है.’
लेकिन मानवाधिकार संगठनों का कहना
है कि लाई को सुनाई गई सज़ा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का सम्मान नहीं करती.
ह्यूमन राइट्स वॉच में एशिया के
डिप्टी डायरेक्टर फ़िल रॉबर्टसन ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “रिश्वत लेने जैसे आर्थिक अपराध के लिए लाई को मौत की सज़ा साफ़तौर पर चीन
द्वारा किये गए अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के वायदे की अवहेलना है. उनकी मौत की सज़ा को कारावास में
बदला जाना चाहिए.”
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि चीनी सरकार इस सज़ा के ज़रिये व्यापारी समुदाय में भय पैदा करना चाहती है ताकि सभी एक ख़ास तरीक़े से अनुशासित रहें.
ह्यूमन राइट्स वॉच, एक संगठन के तौर पर सज़ा-ए-मौत के ख़िलाफ़ रहा है और उसका विश्वास है कि मौत की सज़ा जीवन के अधिकार के ख़िलाफ़ होती है.
लाई शिओमिन चीनी सेंट्रल बैंक के लिए काम कर चुके हैं. वे चीन के बैंकिंग नियामक से भी जुड़े रहे. लाई के नेतृत्व में उनकी कंपनी ह्युआरोंग एसेट मैनेजमेंट ने बहुत तेज़ी से प्रगति की थी. कंपनी में तेज़ी से निवेश हुआ था.
चीन एक फ़ाइनेंस मैग्ज़ीन ने लाई के बारे में लिखा था कि उन्होंने सौ से ज़्यादा संपत्तियाँ बनाईं और अपनी पत्नी समेत अपनी प्रेमिकाओं में बाँट दीं.
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार को लेकर सरकारी अधिकारियों और कंपनी के बड़े अधिकारियों के ख़िलाफ़ कड़ा रुख़ अपनाया है और स्थानीय मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, अब तक दस लाख से ज़्यादा लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो चुकी है.