लखनऊ से बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश में पिछले महीने आए ग़ैर-क़ानूनी धर्मांतरण क़ानून के
समर्थन में 224 पूर्व नौकरशाहों, जजों और अकादमिक लोगों ने पत्र लिख कर इसके लिए यूपी के
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सराहना की है.
फ़ोरम
ऑफ़ कंसर्न्ड सिटिज़ंस नाम के बैनर तले यह पत्र यूपी के पूर्व मुख्य सचिव और राज्य
सभा के पूर्व महासचिव योगेंद्र नारायण के नेतृत्व में लिखा गया है.
यह पत्र उन 104 पूर्व नौकरशाहों के पिछले हफ़्ते
लिखे गए पत्र के जवाब में आया है जिसमें इस क़ानून पर सवाल उठाए गए थे, इसे वापस
लेने की माँग की गई थी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संविधान को समझने
की सीख दी गई थी. इन पूर्व नौकरशाहों ने कहा था कि यूपी ‘नफ़रत की राजनीति का केंद्र’
बनता जा रहा है.
उनके जवाब में फ़ोरम ऑफ़ कन्सर्न्ड सिटिजंस से जुड़े इन लोगों ने पत्र में ग़ैर-क़ानूनी धर्मांतरण और कथित लव जिहाद को रोकने के लिए यूपी सरकार के इस क़ानून का
समर्थन किया है.
पत्र में लिखा गया है, “ब्रिटिश राज में भी कई रजवाड़ों ने इसी तरह के क़ानून लागू किए थे.
इससे उत्तर प्रदेश की गंगा-जमुनी तहज़ीब को कोई ख़तरा नहीं है. यह अध्यादेश धर्म
और जाति छिपाकर धोखाधड़ी करने वालों के ख़िलाफ़ कारगर है.”
पत्र में इस क़ानून का विरोध कर रहे पूर्व नौकरशाहों को राजनीति से
प्रेरित बताते हुए कहा गया है कि ये लोग हज़ारों पूर्व अधिकारियों का प्रतिनिधित्व
नहीं करते हैं. इन अधिकारियों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संविधान के बारे
में फिर से पढ़ने की नसीहत देने को भी ग़ैर-ज़िम्मेदाराना बयान बताया है.
पिछले हफ़्ते इस अध्यादेश को रद्द करने की माँग को लेकर 104
पूर्व नौकरशाहों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखा था.
इनमें पूर्व
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन, पूर्व विदेश सचिव निरूपमा राव, हर्ष मंदर, अरुणा रॉय, अशोक वाजपयी और
प्रधानमंत्री के सलाहकार रह चुके टीकेए नायर जैसे लोग शामिल थे.