भारतीय सेना ने नौशेरा के शेर कहे जाने वाले ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान की टूटी क़ब्र की मरम्मत करवा दी है.
दरअसल कुछ दिनों पहले जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के एक छात्र और दे हेरिटेज टाइम्स नाम की वेबसाइट चलाने वाले मोहम्मद उमर अशरफ़ ने ब्रिगेडियर उस्मान की क़ब्र में हुई टूट-फूट का एक वीडियो जारी किया था. उसके बाद से यह ख़बर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई.
कई अख़बारों और न्यज़ चैनलों ने भी इस ख़बर को दिखाया.
उसके बाद सेना के हवाले से ख़बर आई कि सेना के कई वरिष्ठ अधिकारी राष्ट्रीय हीरो रहे ब्रिगेडियर उस्मान की क़ब्र की ऐसी हालत को देखकर काफ़ी दुखी हैं.
कई मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार सेना ने जामिया यूनिवर्सिटी प्रशासन को भी इस बारे में लिखा था.
ब्रिगेडियर उस्मान की क़ब्र दिल्ली के जिस क़ब्रिस्तान में है उसके रख-रखाव की ज़िम्मेदारी जामिया विश्वविद्यालय के पास है.
बीजेपी के एक सांसद सैय्यद ज़फ़र इस्लाम ने भी क़ब्र की मरम्मत कराने की पेशकश की थी.
आख़िरकार सेना ने गुरुवार को उनकी क़ब्र की मरम्मत करवा दी.
1947-48 में क़बाइलियों ने पाकिस्तानी सेना की मदद से कश्मीर पर हमला बोल दिया और 26 अक्तूबर तक वो श्रीनगर के बाहरी इलाक़ों तक बढ़ते चले आए. अगले दिन भारत ने उनको रोकने के लिए अपने सैनिक भेजने का फ़ैसला किया.
50 पैरा ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर उस्मान नौशेरा में डटे हुए थे तमाम कोशिशों के बावजूद पाकिस्तानी सेना नौशेरा पर क़ब्ज़ा नहीं कर सकी.
वो शायद अकेले भारतीय सैनिक थे जिनको जिन्ना ने पाकिस्तान सेनाध्यक्ष बनाने का ऑफ़र दिया था लेकिन उन्होंने भारत में रहने का फ़ैसला किया था.
बाद में उनके सिर पर पाकिस्तान ने 50,000 रुपए का ईनाम रखा था जो उस ज़माने में बहुत बड़ी रक़म हुआ करती थी. 1948 में नौशेरा का लड़ाई के बाद उन्हें 'नौशेरा का शेर' कहा जाने लगा था.
नौशेरा की लड़ाई के बाद ब्रिगेडियर उस्मान का हर जगह नाम हो गया और रातों रात वो देश के हीरो बन गए थे.
ब्रिगेडियर उस्मान 3 जुलाई 1948 को पाकिस्तानी घुसपैठियों से लड़ते हुए मारे गए. उस समय किसी जंग में मारे जाने वाले वो सबसे बड़े रैंक के सैन्य अधिकारी थे.
उस समय उनकी उम्र महज़ 36 साल थी और कहा जाता है कि अगर वो जीवित होते तो देश के पहले मुसलमान सेनाध्यक्ष होते.
उनके जनाज़े को जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया था जिसमें भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ मौजूद थे. इसके तुरंत बाद ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को मरणोपराँत महावीर चक्र देने की घोषणा कर दी गई.