शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का नेतृत्व कर रही कांग्रेस कमज़ोर स्थिति में है. लेख में कहा गया है कि शिवसेना समेत विपक्ष की सभी पार्टियों को यूपीए के तहत एकजुट होकर मज़बूत विपक्ष पेश करना चाहिए.
लेख में कहा गया है कि केंद्र सरकार किसानों के आंदोलन को नज़रअंदाज़ कर रही है और इसकी एक बड़ी वजह कमज़ोर विपक्ष है. 'सामना' ने कहा है कि केंद्र सरकार पर आरोप लगाए के बजाए मुख्य विपक्षी पार्टी को अपने अंदरूनी मुद्दों की समीक्षा करनी चाहिए.
लेख में कहा गया है, "दिल्ली की सरहदों पर किसान प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन दिल्ली की सत्ता में बैठे लोग उन्हें पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. सरकार की इस उदासीनता की वजह विघटित और कमज़ोर विपक्षी पार्टी है. प्रभावहीन विपक्ष की वजह से लोकतंत्र कमज़ोर हो रहा है."
मराठी अख़बार सामना के इस लेख में कहा गया है, "राहुल गांधी व्यक्तिगत तौर पर मज़बूत लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन कुछ तो कमी है, कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूपीए मौजूदा स्थिति में किसी एनजीओ की तरह काम कर रहा है. यहां तक की यूपीए के घटक दलों ने भी किसानों के प्रदर्शनों को गंभीरता से नहीं लिया है. ये समझ में नहीं आ रहा है कि यूपीए की ये सदस्य पार्टियां आखिर करती क्या हैं."
"राष्ट्रीय स्तर पर एनसीपी नेता शरद पवार एक स्वतंत्र व्यक्तित्व हैं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी अकेले लड़ाई लड़ रही हैं. देश की विपक्षी पार्टी को इस वक्त उनके साथ खड़ा होना चाहिए. ममता बनर्जी ने सिर्फ पवार से संपर्क किया है और वो बंगाल जा रहे हैं. लेकिन यह कांग्रेस के नेतृत्व में होना चाहिए था."
"तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, अकाली दल, बहुजन समाज पार्टी, अखिलेश यादव, जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस, तेलंगाना के के चंद्रशेखर राव, ओडीशा के नवीन पटनायक, कर्नाटक के एचडी कुमारास्वामी, ये सब बीजेपी के खिलाफ़ हैं लेकिन ये सब कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए का हिस्सा नहीं है. जब तक ये सब यूपीए में शामिल नहीं होंगे, विपक्ष एक मज़बूत विकल्प नहीं दे पाएगा."
लेख में कहा गया है कि कि आगे हालात और भी खराब ना हों, इसकी ज़िम्मेदारी कांग्रेस पार्टी की है.
लेख में ये भी कहा गया है कि बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी और अमित शाह जैसे मज़बूत नेता हैं जबकि कांग्रेस का नेतृत्व स्पष्ट नहीं है. मोतीलाल वोरा और अहमद पटेल जैसे नेताओं की मौत के बाद कांग्रेस और भी कमज़ोर हुई है.