अरविंद पनगढ़िया मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में नीति आयोग के उपाध्यक्ष थे. वो अभी कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और एशियान डिवेपलमेंट बैंक के चीफ़ इकनॉमिस्ट भी रहे हैं. अरविंद पनगढ़िया ने मोदी सरकार के कृषि क़ानूनों का समर्थन किया है. उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख लिखकर कृषि क़ानूनों के समर्थन में कई तर्क दिए हैं.
अरविंद ने लिखा है, ''कृषि बाज़ार को लेकर जो सुधार किए हैं उसके विरोध में किसानों आंदोलन को भारत की सभी विपक्षी पार्टियों ने समर्थन किया है. हालाँकि यह हैरान करने वाला नहीं है. लोकतंत्र में विपक्षी पार्टियां तब भी विरोध करती हैं जब वो सत्ता रहते हुए ऐसे बदलावों की वकालत करती हैं. लेकिन हैरान करने वाली कुछ चीज़ें हैं. यहाँ तक कि हाल के घटनाक्रम में शीर्ष के अर्थशास्त्री भी इस विरोध-प्रदर्शन में शामिल हैं. यूपीए सरकार में आख़िर के दो प्रमुख आर्थिक सलाहकार भी किसानों के आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं जबकि ये दोनों भारतीय कृषि में इस तरह बदलावों का समर्थन करते थे.''
अरविंद पनगढ़िया ने लिखा है, ''2011-12 के आर्थिक सर्वे को तब के आर्थिक सलाहकार कौशिक बासु ने तैयार किया था. उसमें साफ़ लिखा है कि जिन किसानों को अपनी उपज की एग्रिक्लचरल प्रोड्यूस मार्केटिंग कमिटी यानी एपीएमसी से बाहर अच्छी क़ीमत मिलती है उन्हें बेचने की अनुमति मिलनी चाहिए. 2011-12 के आर्थिक सर्वे में साफ़ लिखा है कि फसल तैयार होने के बाद बाज़ार और उसके रख-रखाव को लेकर कृषि में ब़ड़े निवेश की ज़रूरत है. कृषि में संगठित कारोबार और मल्टि ब्रैंड रीटेल में एफडीआई को लागू करना चाहिए. सर्वे में यहाँ तक लिखा है कि कृषि उत्पादों के सीमित आयात के लिए भी अनुमति दी जानी चाहिए.''
योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ने लिखा है, ''रघुराम राजन ने भी 2012-13 के आर्थिक सर्वे में ऐसे ही बदलावों की सिफ़ारिश की थी. इसमें साफ़ लिखा था कि प्राइवेट सेक्टर को कृषि बाज़ार को विकसित करने में आगे करना चाहिए. यूपीए सरकार के दोनों मुख्य आर्थिक सलाहकारों ने केवल कृषि में प्राइवेट सेक्टर की एंट्री का ही समर्थन नहीं किया था बल्कि कृषि में विदेशी मल्टि ब्रैंड रीटेलर्स को भी आने देने का सुझाव दिया था. अब दोनों कह रहे हैं कि मोदी सरकार के नए कृषि क़ानून के कारण निजी कंपनियाँ किसानों का शोषण करेंगी. यह संभव है कि आर्थिक सर्वे में सरकार की नीति या निर्देश के कारण इस तरह की सिफ़ारिशें इन्होंने की होंगी जबकि इनकी अपनी सोच कुछ और रही होगी. लेकिन मुझे जहाँ तक जानकारी है कि इन्होंने अब तक ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है.''
पनगाढ़िया ने लिखा है, ''जो कह रहे हैं कि इस क़ानून से निजी कंपनियों को किसानों का शोषण करने की छूट मिल जाएगी उन्हें बताना चाहिए ये कैसे होगा? शोषण निजी कंपनियाँ करेंगी या एपीएमसी के भारी-भरकम एजेंट कर रहे हैं जो थोक होलसेलर्स मिले होते हैं और बिना कोई परामर्श के क़ीमत तय करते हैं. इसके साथ ही वो भारी कमिशन भी खाते हैं. ये तर्क दे रहे हैं कि कॉर्पोरेट घराना एपीएमसी मंडियों को ख़त्म कर देगा और फिर किसानों से वे औने-पौने दाम पर अनाजों की ख़रीदारी करेंगे. अर्थशास्त्री रमेश चाँद और अशोक गुलाटी जैसे अर्थशास्त्रियों ने बताया कि नेस्ले जैसी कंपनियाँ सालों से सरकारी सहकारी संगठनों के साथ मिलकर छोटे दूध उत्पादकों से दूध ख़रीद रही हैं. इन्होंने दूध उत्पादकों का शोषण करने के बजाय उनके दूध की माँग बढ़ाने और मार्केट को बड़ा बनाने में मदद की.''
अरविंद पनगाढ़िया लिखते हैं कि कृषि सुधार कोई नई बात नहीं है और न ही उसकी आलोचना. प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी ने पहली बार इसकी शुरुआत मोडल-एपीएमसी एक्ट, 2003 से की थी. इसके बाद की सभी केंद्र सरकारों ने इन सुधारों को प्रोत्साहित किया. 20 राज्यों ने एपीएमसी एक्ट में संशोधन किया. इनमें से 16 राज्यों ने एक क़ानून लागू किया जिसमें कई और चीज़ें जोड़ी गईं. बिहार ने तो 2006 में एपीएमसी से ख़ुद को अलग कर लिया. आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात और मध्य प्रदेश ने मोडल एक्ट को अपनाया और इसका नतीजा कृषि वृद्धि दर में भी देखने को मिला. 2006-07 और 2018-19 के बीच इन राज्यों में औसत कृषि वृद्धि दर क्रमशः 7.1%, 5.3%, 3.9% और 6.8% रही जबकि पंजाब में वृद्धि दर महज़ 1.8% रही. कृषि क़ानून की आलोचना करने वाले बिहारी किसानों की ग़रीबी और पंजाबी किसानों की अमीरी के लिए एपीएमसी एक्ट को ज़िम्मेदार बता रहे है. इनका कहना है कि बिहारी किसान इसलिए ग़रीब हुए क्योंकि वहाँ की सरकार ने एपीएमसी एक्ट से ख़ुद को अलग कर लिया.''
पनगढ़िया कहते हैं, ''कृषि में उच्च वृद्धि दर के बावजूद बिहारी किसान पंजाबी किसानों की तुलना में इसलिए ग़रीब हैं क्योंकि बिहारी किसान पहले से ही बहुत ग़रीब थे और उन्होंने अपनी शुरुआत बहुत निचले स्तर से की है. 1992-93 तक पंजाब सकल घरेलू उत्पाद में भारत के सभी राज्यों में दूसरे नंबर था जो 2018-19 में दसवें नंबर पर आ गया.
अरविंद पनगाढ़िया के जवाब में कौशिक बासु ने लिखा है कि हाँ, उन्होंने आर्थिक सर्वे में ऐसे बदलावों की वकालत की थी लेकिन मोदी सरकार के नए कृषि क़ानून में छोटे किसानों को शोषण से बचाने के लिए पर्याप्त उपाय नहीं किए गए हैं. कौशिक बासु का कहना है कि नए क़ानून से छोटे किसानों का शोषण हो सकता है और सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए.