क्या कह रहे हैं दिल्ली-यूपी सीमा पर मौजूद किसान
बीबीसी हिंदी के सहयोगी पत्रकार समीरात्मज मिश्र गाज़ीपुर बॉर्डर पर मौजूद हैं और वहाँ उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों से बात कर रहे हैं.
कैमरे के पीछे हैं बीबीसी संवाददाता पीयूष नागपाल.
अधिकारियों का कहना है कि वैक्सीन के पहले तीस लाख डोज़ जल्द ही सारे राज्यों में पहुंचा दिए जाएंगे.
बीबीसी हिंदी के सहयोगी पत्रकार समीरात्मज मिश्र गाज़ीपुर बॉर्डर पर मौजूद हैं और वहाँ उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों से बात कर रहे हैं.
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दिल्ली सीमा का वो टोल नाका जिसे किसानों ने फ्री करने की बात कही है. वहां का हाल बता रही हैं बीबीसी संवाददाता देवीना गुप्ता.
वीडियो: गुलशन कुमार

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समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश सरकार दक्षिण कोरियाई कंपनी सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स को 48 अरब रुपए की फैक्ट्री लगाने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देगी.
उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि सैमसंग अपनी फैक्ट्री चीन से शिफ़्ट कर यूपी में लगाने जा रही है जिससे प्रधानमंत्री मोदी के भारत को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाने की मुहिम को मदद मिलेगी.
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्ट फ़ोन बाज़ार है. भारत ने इस साल की शुरुआत में 6.65 अरब डॉलर की केंद्रीय योजना के तहत घरेलू स्मार्ट फ़ोन उत्पादन के लिए 16 कपंनियों को आर्थिक प्रोत्साहन देने का फ़ैसला किया था. इन कंपनियों में सैमसंग और ऐपल सप्लायर फ़ॉक्सकोन, विस्ट्रोन भी शामिल हैं.
शुक्रवार को उत्तर प्रदेश सरकार ने बताया कि सैमसंग को 7 अरब रुपए का आर्थिक प्रोत्साहन मिलेगा और फैक्ट्री के लिए ज़मीन की रजिस्ट्री पर टैक्स भी नहीं देना होगा. सैमसंग की इस फैक्ट्री में 510 नौकरियां बनने की उम्मीद है. माना जा रहा है कि अगले साल तक फैक्ट्री शुरू हो जाएगी. उत्तर प्रदेश में सैमसंग का दुनिया का सबसे बड़ा मोबाइल फोन मेन्युफैक्चरिंग प्लांट पहले से ही मौजूद है.
योगी आदित्यानाथ ने 9 जुलाई 2018 को नोयडा में सैमसंग मोबाइल फैक्ट्री का उद्घाटन करते हुए कहा था, ''उत्तर प्रदेश का दक्षिण कोरिया से भावुक रिश्ता रहा है. 2000 साल पहले अयोध्या की राजकुमारी की शादी कोरिया के राजकुमार से हुई थी.''

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स्वराज इंडिया प्रमुख योगेंद्र यादव ने कहा है कि जयपुर दिल्ली हाइवे पर किसानों का "दिल्ली मार्च" आज नहीं, कल रविवार 13 दिसंबर को शाहजहांपुर बॉर्डर से शुरू होगा. आज राजस्थान और हरियाणा के किसान कोटपुतली और बहरोड़ में एकत्रित होंगे.'' इससे पहले कहा जा रहा था कि किसान दिल्ली-जयपुर हाइवे पर आज से चक्का जाम करेंगे.

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किसानों के विरोध प्रदर्शनों में ‘भारत विरोधी तत्वों’ के शामिल होने के आरोप को लेकर भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैट ने कहा, ‘‘केंद्रीय खुफिया एजेंसियों को उन्हें पकड़ना चाहिए. अगर प्रतिबंधित संगठन के लोग हमारे बीच घूम रहे हैं तो उन्हें जेल भेजना चाहिए. हमें यहां पर ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला है. अगर हमें मिलता है तो हमें उन्हें यहां से बाहर भेज देंगे.’’
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भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के एक धड़े ने कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है.
याचिका में तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने की मांग की गई है और चिंता जताई गई है कि इन क़ानूनों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को ग़रीब और अनपढ़ किसानों का शोषण करने की खुली छूट मिल जाएगी.
भानु प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली भारतीय किसान यूनियन (भानु) ने नौ दिसंबर को अलग से दायर की गई याचिका में कहा है कि ये क़ानून किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के जाल में फंसा देंगे.
याचिका में कहा गया है, ‘‘इन विवादित क़ानूनों के कारण एक ग़ैर-संगठित और शोषणकारी व्यवस्था शुरू हो जाएगी क्योंकि अधिकतर भारतीय किसान अशिक्षित हैं, उनके पास निजी कंपनियों से बेहतर शर्तों के साथ समझौता करने की जानकारी नहीं है.’’
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मौजूदा क़ानून कारोबारियों को नियंत्रित मंडी प्रणाली के बाहर कृषि उपज का स्वतंत्र रूप से व्यापार करने की अनुमति देता है. यह निजी कंपनियों को आवश्यक वस्तुओं का बड़ी मात्रा में भंडारण करने की अनुमति देता है और साथ ही इसमें अनुबंध खेती के लिए भी नियम बनाए गए हैं.
किसानों को चिंता है कि ये क़ानून बनने से सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अनाज की ख़रीद बंद कर देगी और उन्हें निजी कंपनियों के रहमो-करम पर छोड़ देगी.
हालांकि, कृषि मंत्री ने कहा है कि सरकार लिखित में आश्वासन देना चाहती है कि एमएसपी ख़त्म नहीं की जाएगी.
बीकेयू भानु की इस याचिक के अलावा सुप्रीम कोर्ट में कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ और भी याचिकाएं लंबित हैं. इनमें से एक याचिका द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम के सांसद तिरुचि शिवा और राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने दायर की थी.
भानु प्रताप सिंह का कहना है, ‘‘सरकार कह रही है कि बीच का रास्ता... बीच का रास्ता. क्या बीच का रास्ता? वो सरकार में हैं क्योंकि हमने वोट दिया है. हमने कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया. इसलिए उन्हें हमें सुनना चाहिए.’’
कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ हज़ारों की संख्या में किसान दिल्ली से सटी सीमाओं पर धरना दे रहे हैं. सरकार इसे उनकी कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं लेकिन कोई समाधान नहीं निकल पाया है.
मंगलवार को सरकार ने मौजूदा क़ानूनों में संशोधनों को लेकर किसानों को एक प्रस्ताव भेजा था जिसे किसान संगठनों ने ख़ारिज कर दिया.
कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि सरकार अपने प्रस्ताव पर किसान संगठनों की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रही है.
लेकिन, किसान संगठनों का कहना है कि वो पांचवें दौर की बैठक में ही इन संशोधनों को खारिज कर चुके हैं इसलिए वो कोई लिखित प्रतिक्रिया नहीं देंगे.

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कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों ने क़ानूनों में संशोधनों के सरकार के प्रस्ताव पर लिखित प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया है.
उनका कहना है कि वो पहले से ही इन संशोधनों को ख़ारिज कर चुके हैं.
किसान संगठनों ने एक प्रेस कॉन्फ्रे़स आयोजित करके कहा था कि इन्हीं संशोधनों की बात पाँच दिसंबर की बैठक में भी की गई थी लेकिन उन्हें ख़ारिज कर दिया गया था.
शुक्रवार को कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि सरकार को अपने प्रस्ताव पर किसानों की प्रतिक्रिया का इंतज़ार है. ये प्रस्ताव मंगलवार को भेजे गए थे.
उन्होंने उम्मीद जताई कि ये गतिरोध जल्दी ही ख़त्म हो जाएगा.
कृषि मंत्री ने न्यूज़ एजेंसी एएनआई से कहा, ‘’मुझे लगता है कि हम समाधान निकाल लेंगे. मुझे उम्मीद है. मैं किसानों यूनियनों से आग्रह करूंगा कि वो गतिरोध को ख़त्म करें. सरकार ने उन्हें प्रस्ताव भेजा है. अगर उन्हें क़ानून के किसी प्रावधान पर आपत्ति है तो उस पर चर्चा की जाएगी.’’
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किसान संगठनों का कहना है कि लिखित प्रतिक्रिया भेजने की कोई ज़रूरत नहीं है क्योंकि वो प्रस्ताव को पहले ही ख़ारिज कर चुके हैं.
क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शन पाल ने कहा, ‘’हमने कोई पत्र नहीं भेजा है. ये प्रस्ताव हमने पाँच दिसंबर की बैठक में ख़ारिज कर दिए थे. हमने कहा था कि हम संशोधनों पर कोई चर्चा नहीं करेंगे और कृषि क़ानूनों को रद्द करने के लिए हाँ या ना में जवाब देने की मांग की थी.’’
बातचीत सिर्फ़ एक शर्त पर शुरू हो सकती है जब सरकार क़ानून रद्द करने के प्रस्ताव पर बात करे.
लेफ़्ट पार्टियों से जुड़ी अखिल भारतीय किसान सभा ने कहा कि कृषि मंत्री को बातचीत में बाधा पैदा करने के लिए ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.
संगठन ने कहा, ‘’कृषि मंत्री को बताना चाहिए कि गृह मंत्री अमित शाह ने बातचीत की प्रक्रिया में बाधा क्यों डाली और संशोधनों का प्रस्ताव फिर से क्यों भेजा, जिसे पहले ही ख़ारिज किया जा चुका है.’’
गुरुवार को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक 106 पन्नों का दस्तावेज़ जारी किया था जिसमें कृषि क़ानूनों और किसानों के विरोध प्रदर्शनों को लेकर सरकार का रुख़ स्पष्ट किया गया था.
इसमें बताया गया था, ‘’एमएसपी ख़त्म नहीं की जाएगी; एपीएमसी मंडियों को बंद नहीं किया जाएगा, किसानों की ज़मीन वापस नहीं ली जाएगी और ख़रीदार ज़मीन में बदलाव नहीं कर पाएंगे.’’
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने कहा कि वो इन दस्तावेज़ों को खारिज करते हैं क्योंकि इनमें ‘काल्पिनक दावे’ किए गए हैं.

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कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ किसानों का विरोध प्रदर्शनों और तेज़ होने जा रहा है. अलग-अलग जगहों से बड़ी संख्या में किसान शुक्रवार को राजधानी दिल्ली के लिए निकल चुके हैं.
केंद्र सरकार के प्रस्ताव को ठुकराने के बाद किसान संगठनों ने आंदोलन को और तेज़ करते हुए दिल्ली-जयपुर हाइवे को बंद करने और सभी टोल नाकों को टोल फ्री करने का ऐलान किया है.
स्थितियां संभालने और आने-जाने वालों को वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराने के लिए पुलिस तैनात की गई है.
पिछले क़रीब दो हफ़्तों से कृषि क़ानूनों के विरोध में हज़ारों किसान दिल्ली के हरियाणा और उत्तर प्रदेश से सटी सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
उनकी मांग है कि सरकार तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करे.
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने एक बयान जारी कर कहा, ‘’सिंघु, टिकरी, गाज़ीपुर और पलवल में और किसान धरने में शामिल होंगे. तमिलनाडु के किसान पहुँच चुके हैं और पूरे भारत से किसान विरोध प्रदर्शन के लिए दिल्ली पहुंच रहे हैं.’’
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