हर साल भारत सरकार पंजाब और हरियाणा से लाखों टन चावल और गेहूँ ख़रीदने के लिए अरबों
रुपये ख़र्च करती है.
इसे दुनिया के सबसे महंगे ‘सरकारी खाद्य ख़रीद
कार्यक्रमों’ में से एक माना गया है. लेकिन यह कार्यक्रम अब किसानों के मौजूदा आंदोलन के
केंद्र में है, और इस आंदोलन को भी बीते कुछ दशकों में हुए सबसे बड़े किसान
आंदोलनों में से एक कहा जा रहा है.
खाद्य पदार्थों की सरकारी ख़रीद और बिक्री कैसे होती है?
खेती की लागत की गणना करने के बाद, राज्य सरकार द्वारा संचालित कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी)एक बेंचमार्क सेट करने के लिए 22 से अधिक फ़सलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की घोषणा करता है.
सीएसीपी हालांकि, हर साल अधिकांश फ़सलों के लिए एमएसपी की घोषणा करता है, मगर राज्यों द्वारा संचालित अनाज ख़रीद की एजेंसियाँ और भारतीय खाद्य निगम (एफ़सीआई) भंडारन और धन-राशि की कमी के कारण, उन क़ीमतों पर केवल चावल और गेहूँ ही ख़रीदते हैं.
एमएसपी पर किसानों से चावल और गेहूँ ख़रीदने के बाद, एफ़सीआई ग़रीबों को रियायती मूल्यों पर राशन बेच पाता है और सरकार एफ़सीआई के नुक़सान की भरपाई करती है.
एफ़सीआई से मिलने वाली ‘क़ीमत की गारंटी’ किसानों को बड़ी मात्रा में चावल और गेहूँ के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करती हैं. लेकिन यह अधिक उत्पादन एफ़सीआई पर किसानों से अतिरिक्त आपूर्ति ख़रीदने के लिए दबाव भी डालता है, जिसके परिणामस्वरूप राज्य के गोदामों में अक्सर अनाज की बहुतायत रहती है. साथ ही उस पर सब्सिडी का जो बिल बनता है, वो अक्सर बजट घाटे को बढ़ाता है.
चावल और गेहूँ का विशाल भंडार होने के बावजूद, एफ़सीआई के लिए इनका निर्यात करना एक बड़ी चुनौती रहा है. ऐसे में भंडारण की लागत और हर वर्ष बढ़ने वाली एमएसपी, एफ़सीआई के लिए गेहूँ और चावल की क़ीमतों को और अधिक महंगा बना देती है जिससे विदेशी बिक्री फ़ायदे का सौदा नहीं रह जाती.
कभी-कभार, भारत सरकार राजनयिक सौदों के माध्यम से दूसरे देशों को चावल और गेहूँ की थोड़ी मात्रा भेजती रहती है. फिर भी, एफ़सीआई के गोदाम भरे ही रहते हैं.
एफ़सीआई से किन्हें सबसे अधिक फ़ायदा?
एफ़सीआई मॉडल से किसानों को ‘कीमत की जो गारंटी’ मिलती है, उससे सबसे ज़्यादा फ़ायदा पंजाब और हरियाणा के बड़े किसानों को होता है, जबकि बिहार और अन्य राज्यों के छोटे किसानों को इसका ख़ास फ़ायदा नहीं मिल पाता.
हर साल, पंजाब और हरियाणा के किसान अच्छी तरह से विकसित मंडी व्यवस्था के ज़रिये न्यूनतम समर्थन मूल्य पर एफ़सीआई को अपनी लगभग पूरी उपज बेच पाते हैं जबकि बिहार और अन्य राज्यों के किसान ऐसा नहीं कर पाते क्योंकि वहाँ इस तरह की विकसित मंडी व्यवस्था नहीं है.
इसके अलावा, बिहार के ग़रीब किसानों के विपरीत – पंजाब और हरियाणा का समृद्ध और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली किसान समुदाय यह सुनिश्चित करता है कि एफ़सीआई उनके राज्यों से ही चावल और गेहूँ की सबसे बड़ी मात्रा में ख़रीद जारी रखे.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक ओर जहाँ पंजाब और हरियाणा एफ़सीआई को अपना लगभग पूरा उत्पादन (चावल और गेहूँ) बेच पाते हैं, वहीं बिहार में सरकारी एजेंसियों द्वारा की जाने वाली कुल ख़रीद दो प्रतिशत से भी कम है. इसी वजह से, बिहार के अधिकांश किसानों को मजबूरन अपना उत्पादन 20-30 प्रतिशत तक की छूट पर बेचने पड़ता है.
पहले से ही ‘सुनिश्चित आमदनी’ से वंचित, बिहार के किसानों ने नये क़ानूनों का स्पष्ट रूप से विरोध नहीं किया है. जबकि पंजाब और हरियाणा के किसानों को डर है कि उनकी स्थिति भी कहीं बिहार और अन्य राज्यों के किसानों जैसी ना हो जाये, इसलिए वो चाहते हैं कि एफ़सीआई मॉडल रहे और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उनका उत्पादन ख़रीदने की व्यवस्था भी बची रहे. वरना अगर यह व्यवस्था बदली, तो उन्हें भी प्राइवेट ख़रीदारों के सामने मजबूर होना पड़ेगा.