कोविड-19 महामारीः तो सबसे ज़्यादा मौतों की वजह वायरस नहीं होगा
दो बरस का एमिल ओउआमोउनो को पेड़ के नीचे खेलना कूदना बहुत पसंद था. एमिल, अफ्रीकी देश गिनी के मेलियान्डू गांव का रहने वाला था. एमिल का गांव जंगलों के बीच स्थित था. और इस जंगल में बहुत सारे चमगादड़ भी रहते थे. कई बार बच्चे उन्हें पकड़ लेते थे और भून कर खाया करते थे.
सितंबर 2013 में एक दिन एमिल अचानक बीमार पड़ गया. 28 दिसंबर 2013 को उसकी मौत हो गई. एमिल को जो बीमारी हुई थी, उसके बारे में उस समय तक दुनिया में किसी को कुछ नहीं पता था. जल्द ही एमिल की मां, बहन और दादी भी इस रहस्यमयी बीमारी की शिकार हो गईं. इन सबके अंतिम संस्कार के बाद तो मानो इस रहस्यमयी बीमारी ने महामारी का रूप ले लिया और ये तेज़ी से पूरे गिनी में फैल गई.
23 मार्च 2014 को इस नई बीमारी से 49 लोग बीमार पड़ चुके थे, जबकि 29 लोगों की जान जा चुकी थी. तब जाकर वैज्ञानिकों ने इस बीमारी की पहचान की. ये इबोला वायरस के संक्रमण का नतीजा थी. अगले क़रीब साढ़े तीन बरस के अंदर ये वायरस 11,325 से ज़्यादा लोगों की जान ले चुका था. जिस वक़्त इबोला वायरस अफ्रीका में क़हर बरपा रहा था, ठीक उसी दौरान एक और त्रासदी की भूमिका तैयार हो रही थी.
इबोला का असर
इबोला वायरस की महामारी के चलते, स्थानीय स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई थीं. कई स्वास्थ्य कर्मियों की मौत के बाद अस्पतालों को बंद करना पड़ा था. और जो अस्पताल खुले थे, वहां महामारी के शिकार लोगों की भारी भीड़ जुट रही थी. इबोला से सबसे ज़्यादा प्रभावित तीन अफ्रीकी देशों सिएरा लियोन, लाइबेरिया और गिनी में लोग डॉक्टर के पास या अस्पताल जाने से बचने लगे. उन्हें इस रहस्यमयी बीमारी से ज़्यादा डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों से डर लगने लगा था. उनके पीपीई सूट पहनने और उनके कारण संक्रमित होने की वजह से इन देशों में स्वास्थ्य कर्मी बहुत बदनाम हो चुके थे.