यूरोपीय यूनियन में भी चीन के निवेश को प्रतिबंधित करने की मांग उठने लगी है. इससे पहले भारत ने ऐसा ही क़दम उठाया था. भारत ने चीन से आने वाले निवेश के ऑटोमैटिक रूट को बंद कर दिया था. मतलब बिना भारत सरकार की मंज़ूरी के चीन से कोई निवेश नहीं आ सकता है.
भारत को डर था कि कोरोना वायरस के कारण देश में ठप पड़े कारोबार और मंदी का फ़ायदा उठा चीन कहीं सस्ते में भारतीय कंपनियों का अधिग्रहण करना न शुरू कर दे. अब इसी तरह की मांग यूरोपीय यूनियन के बीच उठने लगी है.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार सीनियन जर्मन कंजर्वेटिव और यूरोपीय संसद में सेंटर-राइट राजनीतिक समूह यूरोपीयन पीपल्स पार्टी के प्रमुख मैनफ्रेड वेबर ने कहा है कि चीन की ओर से होने वाले कंपनियों के टेकओवर पर अस्थायी पाबंदी लगनी चाहिए. वेबर ने कहा कि कोरोना वायरस के कारण कारोबार समस्याग्रस्त हैं और ऐसे में चीन मजबूरी का फ़ायदा उठा सकता है.
उन्होंने कहा कि वो चीनी निवेशकों पर 12 महीने की पाबंदी चाहते हैं ताकि वो मजबूरी का फ़ायदा उठा यूरोपीयन फर्म नहीं ख़रीद सके.
वेबर ने कहा, ''हमलोग देख रहे हैं कि चीन की सरकार के समर्थन से वहां की कंपनियां व्यापक पैमाने पर यूरोपीयन फर्म को ख़रीदने की कोशिश कर रही हैं. अगर ऐसा होता है तो बहुत ही सस्ता सौदा होगा और चीनी निवेशक मजबूरी का फ़ायदा उठा लेंगे. जब तक कोरोना वायरस का संकट ख़त्म नहीं हो जाता है तब तक चीन पर यह पाबंदी रहनी चाहिए. हमें अपना बचाव करना होगा.''
वेबर ने कहा, ''चीन भविष्य में हमारे लिए आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बहुत बड़ा प्रतिद्वंद्वी होगा. मैं चीन को यूरोप में रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखता हूं. चीन मनमानी नीतियों का प्रतिनिधित्व करता है. वो अपनी शक्ति का विस्तार कर अमरीका की जगह लेना चाहता है. यूरोप को चाहिए कि वो चीन को गंभीरता से ले.'' पिछले महीने जर्मनी ने कुछ ऐसा ही क़दम उठाया भी था. जर्मनी ने ग़ैर-यूरोपीय देशों के लिए अपनी कंपनी के टेकओवर करने के नियम कड़े कर दिए थे.