उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने गुरुवार को न्यायपालिका पर प्रतिक्रिया दी है.
उन्होंने कहा, "ऐसी स्थिति नहीं हो सकती जहां आप भारत के राष्ट्रपति को आदेश दें और वो भी किस आधार पर?"
कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ रखे गए विधेयकों पर राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए समयसीमा तय की थी.
उपराष्ट्रपति ने कहा, "संविधान के तहत आपके पास एकमात्र अधिकार अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करना है."
उन्होंने कहा, "जिन जजों ने राष्ट्रपति को आदेश दिया कि यही अब देश का क़ानून होगा, वे संविधान की ताक़त को भूल गए हैं."
"अगर अनुच्छेद 145(3) के तहत किसी चीज़ को संरक्षित किया जाता है तो जजों का वह समूह इससे कैसे निपट सकता है. हमें अब इसके लिए भी संशोधन करने की ज़रूरत है."
जगदीप धनखड़ ने कहा, "अनुच्छेद 142 लोकतांत्रिक शक्तियों के ख़िलाफ़ एक परमाणु मिसाइल बन गया है, जो न्यायपालिका को 24 x 7 उपलब्ध है."
संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को अपने समक्ष किसी भी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने हेतु आदेश जारी करने की शक्ति देता है. इस ताक़त को सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण शक्ति के रूप में भी जाना जाता है.
धनखड़ ने कहा, “हाल ही में एक फ़ैसले में राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है. हम किस दिशा में जा रहे हैं? देश में क्या हो रहा है? हमें बेहद संवेदनशील होना चाहिए. सवाल यह नहीं है कि कोई पुनर्विचार याचिका दायर करता है या नहीं. हमने इस दिन के लिए लोकतंत्र की कभी उम्मीद नहीं की थी. राष्ट्रपति को समयबद्ध तरीके से निर्णय लेने के लिए कहा जाता है और यदि ऐसा नहीं होता है, तो यह क़ानून बन जाता है.”