भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाक़ात की. यह बैठक चीन के तियानजिन में हुई, जहां शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का 25वां शिखर सम्मेलन चल रहा है.
इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ समेत एससीओ सदस्य देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं.
एससीओ की स्थापना वर्ष 2001 में चीन, रूस और सोवियत संघ का हिस्सा रहे चार मध्य एशियाई देशों कज़ाख़स्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान ने मिलकर की थी.
इसका उदय रूस, चीन और इन मध्य एशियाई देशों के बीच वर्ष 1996 में सीमा को लेकर हुए एक समझौते के साथ हुआ था. इसे ‘शंघाई फ़ाइव’ समझौता कहा गया.
1996 में जब इसकी शुरुआत हुई थी तब सिर्फ़ ये ही उद्देश्य था कि मध्य एशिया के नए आज़ाद हुए देशों के साथ लगती रूस और चीन की सीमाओं पर कैसे तनाव रोका जाए और धीरे-धीरे किस तरह से उन सीमाओं को सुधारा जाए और उनका निर्धारण किया जाए.
ये मक़सद सिर्फ़ तीन साल में ही हासिल कर लिया गया. इसकी वजह से ही इसे काफ़ी प्रभावी संगठन माना जाता है. अपने उद्देश्य पूरे करने के बाद उज़्बेकिस्तान को संगठन में जोड़ा गया और 2001 से एक नए संस्थान की तरह से शंघाई सहयोग संगठन का गठन हुआ.
भारत और पाकिस्तान 2017 में इस संगठन में शामिल हुए. ईरान 2023 में सदस्य बना और 2024 में बेलारूस के जुड़ने के बाद सदस्य देशों की संख्या बढ़कर 10 हो गई.
इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान और मंगोलिया एससीओ के पर्यवेक्षक राज्य हैं, जबकि 14 देश डायलॉग पार्टनर की भूमिका में हैं.
तियानजिन में हो रहे शिखर सम्मेलन में इन 10 सदस्य देशों के नेता मौजूद रहेंगे.
इनके अलावा पर्यवेक्षक के तौर पर मंगोलिया और संगठन के 14 डायलॉग पार्टनर्स में से 8 - अज़रबैजान, आर्मीनिया, कंबोडिया, मालदीव, नेपाल, तुर्की, मिस्र और म्यांमार भी इसमें शामिल होंगे.
अनुमान के मुताबिक़, एससीओ देशों में दुनिया की लगभग 40 फ़ीसदी आबादी रहती है. पूरी दुनिया की जीडीपी में इनकी हिस्सेदारी क़रीब 20 फ़ीसदी है. दुनिया भर के तेल भंडार का लगभग 20 फ़ीसदी हिस्सा भी इन्हीं देशों में है.