रूस अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान शासन को औपचारिक रूप से मान्यता देने वाला पहला देश बन गया है. अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर ख़ान मुत्ताक़ी ने इसे एक "साहसिक" निर्णय बताया है.
मुत्ताक़ी ने कहा कि यह "सकारात्मक संबंधों, पारस्परिक सम्मान और रचनात्मक भागीदारी का एक नया चरण" है और यह बदलाव अन्य देशों के लिए "एक उदाहरण" बनेगा.
अगस्त 2021 में सत्ता में लौटने के बाद से तालिबान ने मानवाधिकारों के बढ़ते उल्लंघन की रिपोर्टों के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय मान्यता और निवेश की मांग की है.
रूस के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, "हमारा मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान के इस्लामी अमीरात की सरकार को आधिकारिक मान्यता देने से हमारे देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग के विकास को बढ़ावा मिलेगा."
इसमें कहा गया है कि रूस "ऊर्जा, परिवहन, कृषि और बुनियादी ढांचे" में "व्यावसायिक और आर्थिक" सहयोग की संभावना देखता है, और वह आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी के खतरों से लड़ने में काबुल की मदद करना जारी रखेगा.
रूस उन बहुत कम देशों में से एक था, जिसने 2021 में अफ़ग़ानिस्तान में अपना दूतावास बंद नहीं किया.
साल 2022 में तालिबान के साथ अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला भी पहला देश रूस ही था. इस समझौते के तहत वह अफ़ग़ानिस्तान को तेल, गैस और गेहूं की आपूर्ति करने पर सहमत हुआ था.
रूसी विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस साल अप्रैल में तालिबान को रूस की आतंकवादी संगठनों की सूची से हटा दिया गया था.
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी पिछले वर्ष जुलाई में आतंकवाद से लड़ने में तालिबान को एक "सहयोगी" बताया था.
तालिबान के प्रतिनिधि 2018 की शुरुआत में वार्ता के लिए रूस की राजधानी मास्को गए थे.
हालांकि दोनों देशों का इतिहास बहुत ही जटिल है. साल 1979 में सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया और नौ साल तक युद्ध लड़ा.
इस युद्ध में सोवियत संघ के 15 हज़ार सैनिक मारे गए और अंत में फरवरी 1989 में वह अफ़ग़ानिस्तान से वापस चले गए.