कोरोनाः अमरीका में संक्रमण के रिकॉर्ड मामलों की असली कहानी - दुनिया जहान

    • Author, संदीप सोनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

दुनियाभर के मीडिया में इन दिनों जो ख़बरें छप रही हैं, उनमें दो शब्द ज़रूर होते हैं. पहला कोरोना और दूसरा अमरीका.

इसकी वजह ये है कि अमरीका में कोरोना इंफेक्शन का ग्राफ मई-जून में थोड़ा नीचे जाने के बाद, जुलाई आने से पहले दोबारा तेज़ी से चढ़ने लगा.

और फिर वो दिन भी आया जब 24 घंटे के भीतर कोरोना इंफेक्शन के 55 हज़ार से ज्यादा नए मामले हर दिन सामने आने लगे.

अब तस्वीर ये है कि पूरी दुनिया में कोरोना संक्रमण के जितने मामले हैं, उनमें से एक चौथाई अमरीका में हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, अमरीका में अभी तक 40 लाख से ज्यादा लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं.

इतना ही नहीं, अमरीका में अब तक एक लाख 43 हज़ार से ज्यादा लोग, दम तोड़ चुके हैं.

अमरीका में कोरोना इंफेक्शन के तेज़ी से बढ़ते मामलों ने कई सवालों को जन्म दिया है. उनमें ये सवाल भी शामिल है कि अमरीका में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों की वजह आख़िर क्या है?

क्या ज्यादा टेस्ट होने की वजह से ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं, या कहीं ऐसा तो नहीं कि अमरीका में कोरोना वायरस, इंफेक्शन के दूसरे दौर में पहुंच गया है?

तालमेल की कमी और भ्रम की स्थिति

जॉन्स हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट जोशॉफ्टीन का मानना है, "ये सही है कि टेस्टिंग के ज़रिए हम ज्यादा केस पकड़ पा रहे हैं, लेकिन इस बात के प्रमाण हैं कि ये सिर्फ टेस्टिंग की बात नहीं है. इतने टेस्ट जब हमने कुछ हफ्ते पहले किए थे, तब रिज़ल्ट पॉजिटिव मिलने का प्रतिशत इससे भी अधिक था."

जोशॉफ्टीन कहते हैं, "पिछले कुछ हफ्तों में हमने देखा, कोरोना संक्रमण के मामले में नीचे की ओर जा रहा ग्राफ बहुत तेज़ी से ऊपर जाने लगा. ख़ासतौर पर फ्लोरिडा, टेक्सस, एरिज़ोना और कैलीफोर्निया के कुछ हिस्सों में. शुरुआती दिनों में कोरोना की चुनौती न्यूयॉर्क तक सीमित थी और बाकी जगहों पर पहले उतना ख़तरा नहीं था लेकिन बाद में यहां तेज़ी से मामले बढ़ने लगे."

एक अनुमान के मुताबिक, अमरीका में 3 करोड़ से भी अधिक लोगों का कोरोना टेस्ट हो चुका है.

यहां तर्क ये दिया जाता है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर टेस्ट हो रहे हैं और वायरस के फैलने का दायरा कम हो गया है, तो पॉजिटिव केस निकलने का प्रतिशत भी कम हो जाना चाहिए.

लेकिन यदि पॉजिटिव केस निकलने का प्रतिशत बढ़ रहा है तो इसका मतलब ये हुआ कि वायरस का फैलना जारी है.

जोशॉफ्टीन कहते हैं, "दूसरी बात ये है कि हमें अस्पतालों और इंटेन्सिव केयर यूनिट्स में अधिक मरीज़ नज़र आ रहे हैं. ये कहना सही नहीं होगा कि ज़्यादा टेस्टिंग इसकी असल वजह है. अस्पतालों से मिलने वाली रिपोर्ट्स बता रही हैं कि वहां आईसीयू बेड्स नहीं बचे हैं. अमरीका के ज़्यादातर हिस्सों में हालात बहुत गंभीर हैं."

आंकड़े बताते हैं कि अमरीका में नौजवान और नस्ली तौर पर अल्पसंख्यक, कोरोना वायरस के लिए आसान शिकार साबित हो रहे हैं.

जोशॉफ्टीन बताते हैं, "शुरुआत में नौजवान ज्यादा प्रभावित हुए. फिर जब लॉकडाउन होने के बाद बार जैसी जगहें दोबारा खुलीं, युवाओं में संक्रमण तेज़ी से बढ़ा. इसी तरह नस्ली तौर पर अल्पसंख्यकों में कोरोना वारयस तेज़ी से फैला. जहां आमदनी कम है, वर्क फ्रॉम होम का विकल्प नहीं है, आने-जाने के लिए भीड़ का हिस्सा बनना मजबूरी है, वहां किसी व्यक्ति के लिए कोरोना जैसे वायरस से ख़ुद को बचाए रखना संभव नहीं है."

लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानता की वजह से बीमारियों का ख़तरा बढ़ने का ये तर्क सिर्फ़ अमरीका पर ही नहीं बल्कि सारी दुनिया पर लागू होता है.

तो फिर अमरीका में कोरोना वायरस के मामले बढ़ने की वजह और क्या हो सकती हैं?

जोशॉफ्टीन का मानना है, "अमरीका में जो फेडरल और स्टेट गवर्मेंट्स हैं, उनमें तालमेल की कमी रही. कोराना वायरस से निपटने के लिए उनकी रणनीतियों ने भ्रम की स्थिति पैदा की. इससे कोरोना वायरस को फैलने का भरपूर मौका मिला."

पहले किसे बचाएं

मयामी-फ्लोरिडा में संक्रामक रोगों की जानकार डॉक्टर आयलीन मार्टी के मुताबिक, "पॉजिटिविटी रेट, बहुत नाटकीय तरीके से बढ़ा. हर दिन 17 प्रतिशत से 21 प्रतिशत तक केस पॉजिटिव निकल रहे हैं. इसका सीधा संबंध लोगों के व्यवहार से है, जिसकी वजह से कॉन्टैक्ट ट्रेंसिग बहुत मुश्किल हो जाती है. लोगों ने मास्क लगाए होते, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया होता तो अमरीका की आज ये हालत नहीं होती."

डॉक्टर आयलीन मार्टी का मानना है कि कुछ न्यूज़ टीवी चैनलों ने कोरोना वायरस में राजनीति का तड़का लगाने का काम किया, जिससे बात और बिगड़ गई.

उदाहरण देते हुए वो कहती हैं, "मीडिया ने इस तरह से दिखाने की कोशिश की, मानो फेस मास्क लगाना किसी एक राजनीतिक पार्टी के ख़िलाफ़ है. इस तरह की मूर्खता समाज के लिए हानिकारक साबित हुई. क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसे लेकर लोगों में भ्रम फैला."

डॉक्टर आयलीन मार्टी के मुताबिक, कुछ मामलों में ये भी देखा गया कि कॉलेज जाने वाले युवाओं ने जान-बूझकर कोरोना वायरस फैलाया.

वो कहती हैं, "हमें कॉलेज जाने वाले कुछ नौजवानों के बारे में पता चला जिन्होंने बाकायदा कोरोना पार्टी की, एक-दूसरे को चैलेंज दिया कि कौन पहले कोरोना पॉजिटिव होता है. ये पार्टी उन लोगों के साथ होती थी जो पहले से कोरोना पॉजिटिव थे. इस तरह उन्होंने जान-बूझकर एक-दूसरे में कोरोना वायरस फैलाया."

लेकिन अमरीका के इन नौजवानों ने कोरोना वायरस को गंभीरता से क्यों नहीं लिया. उन्हें भले ही ये लगा हो कि हम आसानी से ठीक हो जाएंगे, लेकिन उनकी ये धारणा ग़लत साबित हुई.

डॉक्टर आयलीन मार्टी कहती हैं, "जब वो पहली बार कोरोना वायरस के संपर्क में आए, उन्हें पता ही नहीं चला, उनमें कोई लक्षण ही नज़र नहीं आए. उन्हें भले ही अहसास नहीं हुआ, लेकिन हकीकत ये है कि ऐसे 67 प्रतिशत मामलों में कोरोना वायरस उन्हें काफी नुकसान पहुंचा चुका था."

डॉक्टर मार्टी का मानना है कि अमरीका में कोरोना वायरस के मामले इसी तरह बढ़ते रहे तो मरने वालों की संख्या बढ़ना भी तय है.

तब अमरीका में डॉक्टरों के सामने वही चुनौती होगी जो इटली और स्पेन में थी- पहले किसे बचाएं?

बेहद लापरवाही

अमरीका में कोरोना वायरस का ग्राफ जिस तरह नीचे जाने के बाद दोबारा तेज़ी से चढ़ा, उसे देखकर यह आशंका जताई गई कि ये कोरोना वायरस की 'सेकेंड वेव' हो सकती है.

'सेकेंड वेव' की आशंका पर वॉशिंगटन में मौजूद बीबीसी संवाददाता विनीत खरे कहते हैं, ''जानकारों का मानना है कि कोरोना वायरस की अभी तो पहली वेव ही चल रही है, जिस तरह से 60 हज़ार प्रतिदिन या उससे अधिक की रफ्तार से मामले सामने आ रहे हैं, दूसरी वेव के बारे में बाद में सोचें, फिलहाल इस पहली वेव से ही निपट लें.''

राष्ट्रपति ट्रंप और उनका प्रशासन ये दावा करते हैं कि अमरीका में जिस हिसाब से टेस्टिंग हो रही है, उसकी वजह से कोरोना के ज़्यादा से ज़्यादा मरीज सामने आ रहे हैं. वो इस मामले में अमरीका की तुलना भारत से भी करते हैं.

विनीत खरे के मुताबिक, ''राष्ट्रपति ट्रंप ये कहते रहे हैं कि अमरीका में जिस हिसाब से टेस्टिंग हो रही है, वैसी टेस्टिंग दुनिया में कहीं नहीं हो रही. इसलिए अमरीका में कोरोना संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ते नज़र आ रहे हैं. हर दिन पांच-छह लाख लोगों की टेस्टिंग हो ही है. इसके बाद भारत का नंबर आता है जहां बड़ी संख्या में टेस्टिंग की गई है. जानकार कहते हैं कि अमरीका में इतने बड़े पैमाने पर टेस्टिंग से कोरोना वायरस की ट्रेसिंग में मदद मिलनी चाहिए. लेकिन इससे टेस्टिंग करने वाली लैब्स पर दबाव बढ़ गया है और रिपोर्ट मिलने में देरी हो रही है.''

विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइडलाइंस में ये साफ़-साफ़ लिखा है कि कोरोना वायरस से बचने के लिए चेहरे पर मास्क लगाना बेहद ज़रूरी है. उसके बाद कुछ और बुनियादी नियम है जिनका पालन करना ज़रूरी है. लेकिन अमरीका में ये देखने में आया है कि बुनियादी बातों की सबसे ज़्यादा अनदेखी हुई.

विनीत खरे के मुताबिक, "मार्च-अप्रैल में अमरीका में जब कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे थे, तब अर्थव्यवस्था को एक तरह से बंद कर दिया गया. बाद में मामले कुछ कम होने पर जब अर्थव्यवस्था को दोबारा खोला गया, तब एहतियातन कुछ गाइडलाइंस जारी की गईं. लेकिन जानकार कहते हैं कि इस दौरान बेहद लापरवाही की गई, गाइडलाइंस की धज्जियां उड़ाई गईं. इससे संक्रमण के मामले तेज़ी से बढ़ने लगे."

दूसरी बड़ी वजह बताते हुए विनीत कहते हैं, ''राष्ट्रपति ट्रंप, प्रेस से मुख़ातिब होते समय और पब्लिक के बीच बिना मास्क के नज़र आते थे. इससे ट्रंप समर्थकों में ये संदेश गया कि फेस-मास्क लगाना उतना भी ज़रूरी नहीं है. कुछ लोग ये भी कहने लगे कि मास्क लगाने से शरीर में कार्बन-डाय-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है जो सेहत के लिए ख़तरनाक है. इन सब वजहों से कोरोना संक्रमण का ग्राफ अमरीका में तेज़ी से ऊपर गया.''

दिक्कतें और भी हैं

अमरीका में नेशनल स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के डीन डॉक्टर पीटर होटेज़ का मानना है कि कोरोना वायरस से लाखों लोगों का संक्रमित होना, सिर्फ़ इसलिए चिंता की बात नहीं है कि इससे उनकी जान जा सकती है, बल्कि इसलिए भी चिंता की बात है कि जान बच जाने पर भी कुछ परेशानियां ऐसी हो सकती हैं, जो ज़िंदगी भर आपका साथ नहीं छोड़ेंगी.

डॉक्टर पीटर होटेज़ कहते हैं, "हम देख रहे हैं कि सिलसिलेवार तरीके से लंबे समय तक रहने वाली बीमारियां आपके शरीर को अपना घर बना सकती हैं. इसकी वजह से फेफड़ों में और हृदय में भी तक़लीफ़ हो सकती है, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर असर पड़ सकता है, साथ ही मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं. फिलहाल हम लोगों की जान तो बचा रहे हैं, लेकिन उन्हें लंबे समय तक रहने वाली बीमारियां भी दे रहे हैं, जो अपनेआप में चिंता का विषय है."

अमरीका में उपराष्ट्रपति माइक पेंस जैसे कुछ नेता और उनके समर्थक इस बात पर संतुष्ट नज़र आते हैं कि कोरोना वायरस से संक्रमित नौजवान आमतौर पर जल्दी स्वस्थ भी हो जाते हैं.

लेकिन डॉक्टर पीटर होटेज़ इस धारणा का खंडन करते हुए कहते हैं, "ये तर्क दो वजहों से ख़ारिज हो चुके हैं. पहली वजह ये कि हमने नौजवानों को गंभीर रूप से बीमार होते, यहां तक कि मरते हुए भी देखा है. ये वो नौजवान थे जिन्हें डायबिटीज़, हार्ट-प्रॉब्लम और मोटापे जैसी बीमारियां पहले से थीं. दूसरी वजह ये है कि वायरस जिस हिसाब से फैल रहा है, देर-सबेर हर व्यक्ति वायरस का निशाना बन सकता है."

इसी वजह से ये कहा जा रहा है कि अमरीका अब उस मोड़ पर आ गया है, जहां से आगे का रास्ता बहुत ख़तरनाक हो सकता है. हालांकि, ख़तरे को अभी भी कम किया जा सकता है.

डॉक्टर पीटर होटेज़ कहते हैं, "हमें दोबारा लॉकडाउन के रास्ते पर जाना होगा और बहुत कड़ाई से इसका पालन करना होगा. हो सकता है कि छह हफ़्ते का लॉकडाउन करना पड़े और उसके बाद कंटेनमेंट ज़ोन बनाकर लोगों को बाहर आने से रोकना पड़े, जो हम पहले नहीं कर पाए थे. लोग इसे पसंद नहीं करेंगे और इकॉनमी पर भी इसका बुरा असर होगा, लेकिन जान बचाने के लिए ऐसा करना ही होगा."

दुनिया भर के वैज्ञानिक कोरोना वैक्सीन बनाने में दिन-रात जुटे हुए हैं. ये वैक्सीन जब बनेगी तब बनेगी, लेकिन डॉक्टर पीटर होटेज़ का मानना है कि वैक्सीन से किसी चमत्कार की उम्मीद ना करें तो बेहतर है.

कोरोना वायरस को लेकर जो सवाल अमरीका के संदर्भ में उठे हैं, वही सवाल दुनिया के बाकी देशों के लिए भी उतने ही प्रासंगिक हैं.

हो सकता है कि अमरीका में कोरोना इंफेक्शन का ग्राफ आने वाले दिनों में नीचे की तरफ़ जाने लगे. लेकिन जो हाल अमरीका का हुआ, वही हालत किसी और देश की भी हो सकती है, इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता.

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